पश्चिम एशिया में शांति वार्ता अभी दूर की कौड़ी: बिना शर्त ईरान के रुकने के आसार कम, खाड़ी देशों की अपनी चिंता
अमेरिका-ईरान-इजरायल तनाव बढ़ा, शांति मुश्किल। खाड़ी देश चिंतित, ईरान झुकने को तैयार नहीं। प्रॉक्सी हमले तेज होने के आसार, युद्ध विस्तार का खतरा, चीन-रूस मध्यस्थता से समाधान संभव।
विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति पश्चिम एशिया में अब अपने हाथ नहीं जलाना चाहते, लेकिन इससे बाहर आने का सम्मानजनक रास्ता बहुत आसान नहीं है। अमेरिका के सहयोगी देश संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत भी चिंता से ग्रसित हैं। अमेरिका में मजबूत इस्राइली लॉबी है और इस्राइल अपने सवालों से समझौता नहीं चाहता। पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ बताते हैं कि बिना शर्त ईरान के भी कदम पीछे खीचने के आसार नहीं हैं।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन अपनी मुख्य शर्तों को आगे रख रहे हैं। ईरान की चिंता केवल ईरान के ईर्द गिर्द नहीं है। आईआरजीसी हिज्बुल्ला, हमास, हूती और फिलिस्तीन के हक को लेकर भी बात करना चाहता है। पश्चिम एशिया के जानकार कहते हैं कि पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई का दौर कुछ और था। इस समय के ईरान का दौर कुछ और है। ईरान ने अमेरिका के प्रभाव और इस्राइल की रहस्य भरी क्षमता को देख लिया है। इसलिए ईरान अब झुककर समझौते के मूड में नहीं है। इतना ही इजरायल को भी बिना कड़ी शर्तों के शांति समझौता होने का अर्थ पता है।
किस आशंका में हैं खाड़ी के देश?
सऊदी अरब जैसे सुन्नी बाहुल देश की ईरान से नहीं पटी है। हालांकि तुर्किए के राष्ट्रपति ने ईरान पर अमेरिका इस्राइल की कार्रवाई के दौरान एक बड़ा कूटनीतिक बयान दिया था। उन्होंने भविष्य को ध्यान में रखकर कहा था कि सवाल शिया और सुन्नी का नहीं है। सवाल मुसलमान का है। एकजुटता का है। माना जाता है कि ईरान ने भी इसका पालन करने की कोशिश भी की। उसने इस दौरान केवल अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। कतर समेत अन्य पर हमले को लेकर सफाई भी दी। इस पूरे दौर में सऊदी अरब की स्थिति थोड़ा अलग है। सऊदी चाहता है कि खाड़ी देश में अमेरिका का कवच रहना चाहिए। ताकि ईरान एक स्तर तक सीमित रहे। दुबई से लौटे एक पूर्व राजनयिक बताते हैं कि दुबई में आम लोगों में एक खास तरह की आशंका देखी जा रही है। मुझे लगता है कि ईरान से किसी भी शांति वार्ता में इसे जरूर ध्यान में रखा जाएगा।
शांति को लेकर कौन क्या कह रहा?
पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने राष्ट्रपति ट्रंप के 15 सूत्रीय प्रस्ताव को ईरान के पास पहुंचा दिया है। ट्रंप ईरान के साथ अच्छी वार्ता और शांति प्रयास के आगे बढ़ने का दावा कर रहे हैं, लेकिन ईरान इसे अमेरिका की कूटनीतिक चालबाजी और रणनीतिक तैयारी के लिए समय लेने की कोशिश बता रहा है। दूसरी ओर इस्राइल ईरान की तरह हमले जारी रखने का संदेश दे रहा है। ईरान के समर्थन में हिज्बुल्ला लगातार इस्राइल को निशाना बना रहा है। इस बीच ईरान ने स्टेट ऑफ हार्मुज में कुछ देशों के जहाज को उससे गुजरने से मना किया। माना जा रहा है कि आने वाले समय में ईरान की प्रक्सियां हमले तेज कर सकती हैं। इराक में भी अमेरिका की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
युद्ध का दायरा बढ़ने का खतरा
ईरान के रुख को देखने पर युद्ध का दायरा बढ़ने, अस्थिरता और आर्थिक खतरा बढ़ने के ही संकेत हैं। ईरान ने वैसे भी इस युद्ध में अमेरिका को डराना सीख लिया है। उसके रणनीतिकारों को पता है कि बिना अमेरिका के सहयोग के इस्राइल नहीं चल सकता, इसलिए अभी उनका फोकस इस्राइल पर हमला करने की तरफ अधिक है। ईरान का दूसरा फोकस अमेरिका के खाड़ी के सहयोगी देशों में स्थिति अमेरिकी अड्डों पर हमला है। ताकि अमेरिका की चिंता बढ़ सके।
कैसे आ सकती है शांति?
पश्चिम एशिया में अमेरिका के साथ-साथ चीन और रूस की भूमिका काफी बढ़ी है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सधे अंदाज में अपने वक्तव्य दिए हैं, लेकिन राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने बयानों में भी खुलकर ईरान का साथ दिया है। शी जिनपिंग पश्चिम एशिया में हमले रुकने और यथाशीघ्र शांति प्रयास की बात कर रहे हैं। राष्ट्रपति पुतिन अभी अंतरराष्ट्रीय हालात पर नजर टिकाए हैं। माना जा रहा है कि रूस और चीन की मंशा को ईरान अहमियत देगा। तुर्किए, कतर, मिस्र,ब्रिटेन जैसे देश इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पाकिस्तान अभी दावा जरूर कर रहा है, लेकिन उसकी स्थिति एक डाकिया देश से अधिक नहीं है। दरअसल ईरान एक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय भरोसा चाहता है। ईरान के राष्ट्रपति अमेरिका पर विश्वास नहीं करते। पेजेश्कियन कई बार कह चुके हैं कि अमेरिका के साथ शांति वार्ता के प्रयास चल रहे थे, लेकिन 28 फरवरी को इस्राइल के साथ हमला करके उसने भरोसा तोड़ दिया। एक बड़ा सवाल यह भी है कि ईरान की शीर्ष लीडरशिप खत्म हो चुकी है। उसके सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई अभी गुप्त स्थान पर भूमिगत हैं। ऐसे में ईरान में निर्णय कौन लेगा?