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ब्रिटेन के पहले बजट पर दुनिया की नजर: ईरान युद्ध से अर्थव्यवस्था पर दबाव, महंगाई और सरकारी कर्ज की चुनौती

Wed, 28 Oct 2026 11:44 AM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, लंदन
पीटीआई, लंदन Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Wed, 28 Oct 2026 11:44 AM IST
सार

ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉन हीली बुधवार को नई सरकार का पहला बजट पेश करेंगे। ईरान युद्ध के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से महंगाई बढ़ी है। देश में महंगाई दर 3.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जबकि सरकारी कर्ज तीन ट्रिलियन पाउंड से अधिक हो चुका है।

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ब्रिटेन के वित्त मंत्री के सामने कई चुनौतियां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉन हीली बुधवार को नई सरकार का पहला बजट पेश करेंगे। ईरान युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई और ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं ने उनके सामने चुनौती बढ़ा दी है। उन्हें एक ओर आम लोगों को महंगाई से राहत देनी है, तो दूसरी ओर सरकारी कर्ज और खर्च पर नियंत्रण भी बनाए रखना है।
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जुलाई में एंडी बर्नहम के प्रधानमंत्री बनने के बाद हीली को वित्त मंत्री नियुक्त किया गया था। संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में बजट पेश करते समय उनके सामने सरकार की प्राथमिकताओं और सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
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ईरान युद्ध से बढ़ी महंगाई की चिंता
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इस साल उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर रही है और इसमें अच्छी वृद्धि भी हुई है। हालांकि, सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए लेबर सरकार की योजनाओं पर खर्च करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई बाधाओं ने वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित किया है। इससे ब्रिटेन समेत कई देशों में महंगाई बढ़ी है।
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ब्रिटेन में महंगाई दर बढ़कर 3.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो करीब एक साल का उच्च स्तर है। ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण आने वाले महीनों में इसके और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में बैंक ऑफ इंग्लैंड की ओर से ब्याज दरें बढ़ाए जाने की उम्मीद है। इससे सरकार के लिए कर्ज चुकाने की लागत भी बढ़ सकती है।

कम बदलावों वाला हो सकता है बजट
आर्थिक दबाव और दुनिया भर में सरकारी कर्ज को लेकर वित्तीय बाजारों की चिंता के बीच इस बजट में बड़े बदलावों की उम्मीद कम है। हाल के दिनों में फ्रांस की खराब वित्तीय स्थिति और वहां हुए विरोध प्रदर्शनों ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है।

एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स के निवेश निदेशक मैथ्यू एमिस ने कहा कि अपेक्षाकृत साधारण बजट से वित्तीय बाजारों में सरकार की उधारी लागत कम हो सकती है। इससे भविष्य में स्कूलों, अस्पतालों और सेना पर खर्च के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक कमजोर वित्तीय प्रबंधन वाले देशों को लेकर तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं। फ्रांस इसका उदाहरण है।

महंगाई से राहत देने पर रहेगा जोर
बजट से पहले हीली ने कहा है कि वह कारोबारियों और परिवारों को बढ़ती जीवनयापन लागत से कुछ राहत देना चाहते हैं। इसके लिए ऊर्जा की ऊंची कीमतों के असर को कम करने वाले उपाय किए जा सकते हैं। प्रधानमंत्री बर्नहम ने बेघर लोगों की संख्या घटाने और इस समस्या को खत्म करने, बुजुर्गों की देखभाल बेहतर बनाने तथा नाटो के रक्षा खर्च संबंधी लक्ष्यों को पूरा करने का वादा किया है।

बैंकों और जुआ कारोबार पर बढ़ सकता है टैक्स
सरकार के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के संभावित उपायों में बैंकों पर अधिक टैक्स लगाना शामिल है। ऊंची ब्याज दरों से बैंकों को फायदा हुआ है और उनके मुनाफे पर लगने वाले अतिरिक्त कर को बढ़ाए जाने की उम्मीद है। जुआ कारोबार पर भी अधिक टैक्स लगाया जा सकता है।

तीन ट्रिलियन पाउंड से ज्यादा हुआ सरकारी कर्ज
हीली के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकारी कर्ज है। यही समस्या उनकी पूर्ववर्ती और पूर्व वित्त मंत्री रेचल रीव्स के सामने भी थी। लेबर पार्टी की चुनावी जीत के बाद रीव्स ने वित्त मंत्रालय संभाला था।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हाल में ब्रिटेन की सार्वजनिक वित्त व्यवस्था की दिशा पर संतोष जताया था। इसके बावजूद देश का सरकारी कर्ज पहली बार तीन ट्रिलियन पाउंड यानी करीब चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। सरकार के कुल खर्च का लगभग आठ प्रतिशत हिस्सा कर्ज पर ब्याज चुकाने में जा रहा है।

रक्षा खर्च पर भी रहेगी नजर
बजट में रक्षा खर्च को लेकर हीली के बयान पर खास नजर रहेगी। उन्होंने इसी साल रक्षा मंत्री का पद छोड़ दिया था। उस समय उन्होंने रक्षा क्षेत्र के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं कराने पर नाराजगी जताई थी। उनके इस कदम से तत्कालीन प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर दबाव बढ़ा था।


रक्षा और दूसरी सरकारी योजनाओं के लिए अतिरिक्त धन जुटाने के लिए सरकार को कहीं न कहीं से संसाधन निकालने होंगे। इसके लिए कर बढ़ाने या सरकारी खर्च में कटौती जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। साथ ही सरकार को सरकारी बॉन्ड बाजार के निवेशकों का भरोसा बनाए रखने की चुनौती भी होगी।
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