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Explainer: ईरान से डील के लिए अमेरिका में ही क्यों घिरे ट्रंप, विपक्ष से लेकर MAGA समर्थक तक किस बात पर खफा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 18 Jun 2026 05:57 AM IST
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सार

पश्चिम एशिया में शांति की ओर एक और कदम आगे बढ़ चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका-ईरान समझौते के मसौदे पर सहमति जताते हुए हस्ताक्षर कर दिए हैं। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, ट्रंप ने बुधवार शाम (भारतीय समयानुसार गुरुवार) को अमेरिका-ईरान समझौते के मसौदे पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर किए।  

US Iran Deal Peace Agreement 14 Points MoU Donald Trump Republican and MAGA anger Hormuz Nuclear Israel Issue
ईरान डील को लेकर अमेरिका में ही घिरे ट्रंप। - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में जब ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए समझौते का एलान किया तो पूरी दुनिया की नजर इस बात पर लगी थीं कि आखिर इस समझौते की जो शर्तें तय हुई हैं, उनमें किसको फायदा हो सकता है। शुरुआत में इस समझौते की शर्तों का जो ड्राफ्ट तैयार हुआ, उसे सार्वजनिक नहीं किया गया और कुछ रिपोर्ट्स के हवाले से ही डील को लेकर दावे किए जा रहे थे। हालांकि, जैसे-जैसे इस समझौते की शर्तें साफ हुई हैं, वैसे-वैसे इसे लेकर अमेरिका में ही ट्रंप के विरोध में स्वर उठने लगे। सिर्फ डेमोक्रेटिक पार्टी ही नहीं, बल्कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी में भी ईरान समझौते को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी है। 


दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की जो शर्तें तय हुई हैं, उनमें से अधिकतर शर्तें ऐसी हैं, जिन्हें अमेरिकी नेताओं ने ईरान को ट्रंप की तरफ से दिया गया तोहफा करार दिया है। फिर चाहे ईरान को पुनर्निर्माण के लिए एक बड़ी राशि मुहैया कराने की शर्त हो या होर्मुज जलडमरूमध्य में लगने वाले नए सेवा शुल्क की बात हो या ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौते में कोई भी स्पष्टता न होने की बात। इन सभी मुद्दों पर ट्रंप अमेरिका में ही घिरे हैं। इसके बावजूद अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि गुरुवार को ट्रंप की तरफ से ईरान के साथ तय 14 बिंदु वाले इस अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। 
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ये भी पढ़ें: Peace Deal: होर्मुज खोलने से 300 अरब डॉलर देने तक, अमेरिका-ईरान समझौते के मसौदे में क्या हैं 14 शर्तें?
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ट्रंप ने ईरान के साथ जो समझौता किया है, उसे लेकर अमेरिका में किस तरह विरोध भड़का है? खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और उनके समर्थन मेक अमेरिका ग्रेट अगेन वोटर बेस कैसे इस डील को लेकर बंटे हुए नजर आ रहे हैं? समझौते की किन शर्तों को लेकर विवाद की स्थिति बन रही है? इसके अलावा उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की इस डील में भूमिका और इसके जोखिम को लेकर क्या सामने आया है? आइये जानते हैं...
 

ईरान समझौते के वह मुद्दे, जिन पर संशय-मतभेद की स्थिति

300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड और आर्थिक रियायतें
समझौते की सबसे विवादास्पद शर्तों में से एक ईरान के लिए 300 बिलियन डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण फंड का प्रावधान है। आलोचक ईरान की ओर जाने वाले किसी भी आर्थिक लाभ से बेहद खफा हैं। इसके अलावा ईरान को तुरंत अपना तेल बेचने की अनुमति और भविष्य की परमाणु वार्ता के दौरान ईरान के फ्रीज किए गए फंडको जारी करने और प्रतिबंधों में ढील देने के रास्ते पर विवाद की स्थिति बन चुकी है। 

होर्मुज जलडमरूमध्य और 60 दिन का युद्ध विराम
समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य से नौसैनिक नाकेबांदी हटाने और परमाणु वार्ता के लिए 60 दिनों के युद्धविराम की बात कही गई है। इसे लेकर अमेरिका में यह बहस छिड़ गई है कि ईरान पर हमले से पहले जो स्थिति थी, युद्ध के बाद फिर वही स्थिति हो गई है। इस बात पर भी संशय है कि क्या ईरान भविष्य में भी इस जलमार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल या कोई सर्विस फीस वसूलना जारी रखेगा।

परमाणु कार्यक्रम पर ठोस प्रतिबद्धताओं की कमी
अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह बात सामने आई है कि समझौते की भाषा बेहद अस्पष्ट है। आलोचकों का आरोप है कि इस समझौते में ईरान द्वारा अपने परमाणु हथियारों के विकास को छोड़ने को लेकर कोई दृढ़ प्रतिबद्धता, तय मानदंड या पुख्ता क्रम मौजूद नहीं है।

हिज्बुल्ला, हमास और हूतियों जैसे प्रॉक्सी गुटों पर चुप्पी
इस्राइल समर्थक रिपब्लिकन नेताओं को इस बात की गहरी चिंता है कि यह समझौता पूरे क्षेत्र में लड़ाई तो रोक सकता है, लेकिन यह ईरान समर्थित हिज्बुल्ला (लेबनान), हमास (गाजा) और हूतियों (यमन) के मिसाइल कार्यक्रमों और खतरों को खत्म करने पर केंद्रित नहीं है। इज़राइल का मानना है कि इन प्रॉक्सी गुटों से निपटे बिना युद्धविराम उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।

डेमोक्रेटिक पार्टी किन मुद्दों पर कर रही विरोध?

ट्रंप के इस ईरान समझौते को लेकर उनके राजनीतिक विरोधियों- डेमोक्रेट्स और उनकी ही पार्टी के आलोचकों ने कड़ी आपत्तियां जताई हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी का मुख्य फोकस प्रशासन की पारदर्शिता की कमी, कांग्रेस को दरकिनार करने की कोशिश और इस युद्ध से हासिल हुए वास्तविक परिणामों पर है। 

1. पारदर्शिता की मांग और जानकारी छिपाने का आरोप
डेमोक्रेटिक नेताओं का सबसे बड़ा आरोप यह है कि ट्रंप प्रशासन इस समझौते के विवरण को गुप्त रख रहा है। अमेरिकी संसद के उच्च सदन- सीनेट के नेता चक शुमर ने कहा कि राष्ट्रपति को समझौते पर पहुंचे दो दिन हो चुके हैं और उन्होंने अभी तक कोई विवरण जारी नहीं किया गया। अमेरिकी जनता पूरी पारदर्शिता और विवरण जानने की हकदार है। उन्होंने प्रशासन से अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के आठ नेताओं के गुट (गैंग ऑफ एठ) के साथ-साथ पूरी संसद के लिए एक खुफिया ब्रीफिंग आयोजित करने की भी मांग की है। 

ये भी पढ़ें: US: ईरान समझौते को ट्रंप बता रहे जीत, लेकिन विशेषज्ञ बोले- अमेरिका की रणनीतिक हार हुई, ये आत्मसमर्पण जैसा



2. सीनेट में मतदान और संसद की भागीदारी पर जोर
डेमोक्रेट्स इस बात पर एकजुट हैं कि ईरान के साथ होने वाले किसी भी अंतिम समझौते पर अमेरिकी संसद में बहस और मतदान होना चाहिए। डेमोक्रेट्स के इस तर्क का कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी समर्थन किया है। सीनेटर ब्रायन शेट्ज ने कहा कि संघीय कानून के तहत सीनेट को इस पर विचार करने का स्पष्ट अधिकार है, लेकिन उन्हें लगता है कि ट्रंप प्रशासन इसे दरकिनार करने की पूरी कोशिश करेगा क्योंकि वे नहीं चाहते कि यह मुद्दा सीनेट के सामने चर्चा के लिए आए।

3. व्हाइट हाउस की मंशा पर भारी अविश्वास
डेमोक्रेट्स को शक है कि व्हाइट हाउस कानूनी प्रक्रियाओं से बचने की कोशिश करेगा। सीनेटर डिक डर्बिन ने चेतावनी दी कि प्रशासन यह बहाना बनाकर कानून से बचने की कोशिश करेगा कि कुछ चीजें गोपनीय हैं जिन्हें उजागर नहीं किया जा सकता। वहीं, ओबामा प्रशासन में काम कर चुकीं पूर्व उप विदेश मंत्री वेंडी शर्मन ने टिप्पणी की कि प्रशासन समझौते के विवरण को इसलिए छिपा रहा है क्योंकि वे इस बात को लेकर बहुत घबराए हुए हैं कि इसमें क्या है और इसे किस तरह देखा जाएगा।

4. युद्ध की उपलब्धियों पर सीधे सवाल
डेमोक्रेट्स इस बात पर भी सवाल उठा रहे हैं कि इतने विनाशकारी युद्ध के बाद अमेरिका को क्या फायदा हुआ। चक शुंमर ने ट्रंप के वादों पर तंज कसते हुए कहा, "हमें दर्जनों बार बताया गया है कि युद्ध खत्म हो गया है और दर्जनों बार हमें निराशा हाथ लगी है... हमने वास्तव में ट्रंप के इस युद्ध से क्या हासिल किया है?"



ट्रंप का MAGA समर्थक बेस, रिपब्लिकन पार्टी क्यों नाराज? ट्रंप के ईरान शांति समझौते ने उनके मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) समर्थक बेस के अंदर गृहयुद्ध और भारी वैचारिक मतभेद पैदा कर दिया है। जो कट्टरपंथी रिपब्लिकन पहले ईरान पर ट्रंप के सैन्य हमलों का जश्न मना रहे थे, वे अब इस शांति समझौते को लेकर सीधे तौर पर विद्रोह कर रहे हैं। 

1. ईरानी वार्ताकारों की तारीफ से गुस्सा
ट्रंप ने हाल ही में ईरानी वार्ताकारों की तारीफ करते हुए उन्हें बहुत तर्कसंगत, बातचीत के लिए अच्छे लोग बताया, जबकि ट्रंप के समर्थक ईरान को एक ऐसा आतंकवादी शासन मानते हैं जिसे सुधारा नहीं जा सकता। ट्रंप के इन शब्दों ने उनके डर को गहरा कर दिया है कि यह समझौता तेहरान को युद्ध में बच निकलने के लिए इनाम दे रहा है। 

2. ईरान को आर्थिक लाभ पहुंचाने पर
समझौते के तहत ईरान को तुरंत अपना तेल बेचने की अनुमति और भविष्य की परमाणु वार्ता के दौरान 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड तक पहुंच मिलने की बात सामने आई है। भले ही अमेरिकी अधिकारी कह रहे हैं कि यह पैसा अमेरिकी करदाताओं का नहीं होगा, लेकिन कट्टरपंथी समर्थक इस बात से आगबबूला हैं कि ईरान की तरफ किसी भी तरह का पैसा प्रवाहित होगा। फॉक्स न्यूज के टिप्पणीकार मार्क थिसेन ने इसकी तुलना नाजियों के सत्ता में रहते हुए जर्मनी को मार्शल प्लान देने से की है। 

3. ऐतिहासिक सैन्य बढ़त को गंवाना
ट्रंप के समर्थकों ने युद्ध-समर्थकों का तर्क है कि कई महीनों के भारी सैन्य हमलों ने ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को अपंग कर दिया था। उनका मानना है कि अब ईरान के पास से अपनी नाकेबंदी हटाकर और 60 दिनों की बातचीत का मौका देकर ट्रंप अपनी यह अभूतपूर्व सैन्य बढ़त गंवा रहे हैं। कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि चूंकि ईरान का शासन इस युद्ध से बच निकला है, इसलिए ईरान के खिलाफ अमेरिका का खौफ पहले से कमजोर हो गया है।

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4. इस्राइल के साथ विश्वासघात
अमेरिकी राष्ट्रपति के कई समर्थक ईरान को दी जाने वाली किसी भी अमेरिकी रियायत को इस्राइल के साथ एक विश्वासघात के रूप में देख रहे हैं। अमेरिका के अहम सहयोगियों में शुमार इस्राइल को इस युद्ध विराम और समझौते के आधिकारिक दस्तावेजों से दूर रखा गया है, जो इस नाराजगी को और भी भड़का रहा है।

5. समझौते की भारी गोपनीयता
शांति समझौते के असल कागजात गुप्त रखने को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ-साथ ट्रंप के समर्थकों और नेताओं में भारी अविश्वास पनप रहा है। बेन शपिरो और मार्क लेविन जैसे दिग्गज कंजर्वेटिव टिप्पणीकारों ने ट्रंप और प्रशासन को चेतावनी दी है कि अगर यह एक खराब समझौता साबित होता है, तो जिन लोगों ने इस युद्ध को वीरता मानकर जश्न मनाया था, वे बहुत ज्यादा निराश होंगे।

रिपब्लिकन पार्टी में कैसे इस डील को लेकर दो फाड़?

1. उपराष्ट्रपति वेंस समझौते के बचाव में उतरे
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस शांति समझौते के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं। वे उन रिपब्लिकन मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो अमेरिका को मध्य पूर्व के अंतहीन युद्धों से बाहर निकालना चाहते हैं। वेंस ने अपने आलोचकों पर तीखा पलटवार करते हुए कहा है कि कुछ कट्टर नेता एक अंतहीन युद्ध चाहते हैं, जो तब तक चले जब तक हर ईरानी मारा न जाए। 

पार्टी के कुछ नेता वेंस के तर्कों से सहमत भी हैं। सीनेटर रोजर मार्शल ने वेंस से बात करने के बाद समझौते का समर्थन करते हुए कहा कि इससे अहम व्यापारिक जलमार्ग खुलेगा और ईरान अपने परमाणु हथियार छोड़ देगा।

2. गुप्त समझौते को लेकर भड़के ट्रंप के करीबी भी
पार्टी में असंतोष का एक बड़ा कारण व्हाइट हाउस द्वारा समझौते की शर्तों को गुप्त रखना है। 

4. ट्रंप नहीं, वेंस को निशाना बना रहे कुछ सांसद
दिलचस्प बात यह है कि कई युद्ध-समर्थक आलोचक अपना गुस्सा सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के बजाय उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पर निकाल रहे हैं। सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने वेंस को इस समझौते का निर्माता बताते हुए उनसे मांग की है कि वे संसद के सामने आकर इसका बचाव करें। वेंस के सामने अब 2028 के चुनाव से पहले अपनी पार्टी के इन दोनों नाराज गुटों को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती है।

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