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Explainer: अमेरिका-ईरान के समझौते की शर्तें तय, ट्रंप-मोजतबा में कौन झुक रहा, भारत को कितना फायदा-क्या नुकसान?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sun, 14 Jun 2026 06:51 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि युद्ध को रोकने के लिए एक सहमति बनी है और जल्द ही इससे जुड़े एक समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। इस बीच समझौते के ड्राफ्ट की सामग्री और इसकी शर्तों में झुकाव का पक्ष अब भी अस्पष्ट रहा है। आइये जानते हैं इस समझौते के बारे में...

US Iran Deal to End War know the plan for agreement Hormuz Strait Iranian Oil Nuclear Enrichment effect India
अमेरिका-ईरान के बीच जल्द हो सकते हैं समझौते पर हस्ताक्षर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच 28 फरवरी को शुरू हुई जंग को आज 107 दिन पूरे हो चुके हैं। माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने 80वें जन्मदिन यानी 14 जून (भारतीय समयानुसार (14 जून की शाम से 15 जून के बीच) को ही ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। इसके लिए एक अंतरिम समझौते का ड्राफ्ट भी तैयार किया जा चुका है। हालांकि, अभी इसकी शर्तों और इनकी स्वीकार्यता को लेकर काफी संशय का माहौल है। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच जिस समझौते पर ट्रंप जल्द हस्ताक्षर होने की बात कह रहे हैं, उसमें कौन-कौन सी शर्तें होने की बात सामने आई है? भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने और क्षेत्र से तेल निर्यात को लेकर इसमें क्या कहा गया है? अगर समझौते की शर्तें स्पष्ट हैं तो इसे लेकर फिलहाल तनाव किस बात पर है? वह क्या मुद्दे हैं जो इस संघर्ष का आगे का रुख तय कर सकते हैं? आइये जानते हैं...
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अमेरिका-ईरान समझौते के ड्राफ्ट में क्या शर्तें, कौन-किस शर्त पर झुका?


1. तत्काल युद्धविराम: लेबनान सहित सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर सैन्य शत्रुता का तत्काल और स्थायी रूप से खात्मा किया जाएगा। ईरान ने किसी भी शांति समझौते को लेबनान के युद्धविराम से मजबूती से जोड़ा था। इस्राइल की लगातार सैन्य कार्रवाइयों और विरोध के बावजूद अमेरिका ने ड्राफ्ट में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर संघर्ष विराम की ईरानी शर्त को मानने की बात कही है।

2. नौसैनिक नाकेबंदी हटाना: अमेरिका की ओर से 30 दिनों के अंदर नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह से हटा ली जाएगी। गौरतलब है कि अमेरिका ने यह नाकेबंदी होर्मुज से ईरानी तेल-गैस लेकर निकल रहे जहाजों पर रोक लगाने के इरादे से की थी। हालांकि, दबाव की रणनीति के बावजूद अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को 30 दिनों में हटाने के लिए झुकता नजर आ रहा है।

3. होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना: 30 दिनों के अंदर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दिया जाएगा। यह जलडमरूमध्य ईरानी नियामक व्यवस्था के तहत संचालित होगा और ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल के बजाय सेवा शुल्क वसूल सकेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज ऐसा मुद्दा है, जिस पर दोनों ही देश झुकते नजर आए हैं। दरअसल, अमेरिका लगातार इस क्षेत्र में टोल या किसी भी शुल्क के खिलाफ था, जबकि ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने पर अड़ गया था। ऐसे में जहां अमेरिका ने उसे एक शुल्क वसूलने की छूट दी है, तो वहीं ईरान ने ज्यादा दर वाला टोल वसूलने के बजाय एक कम दर वाला सेवा शुल्क लेने पर सहमति जताई है, ताकि उसे अमेरिका-इस्राइल के हमलों से हुई तबाही का मुआवजा और पुनर्निर्माण में मदद मिल पाए। 

4. जब्त संपत्तियों की वापसी: 60 दिनों की वार्ता अवधि के दौरान विदेशों में जमा ईरान की 24 बिलियन डॉलर की जब्त संपत्ति जारी की जाएगी। इसमें से आधी राशि (12 अरब डॉलर) अंतिम बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को सौंपी जा सकती है। हालांकि, इस पक्ष पर दोनों के बीच कुछ मतभेद है।
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5. प्रतिबंधों का निलंबन: ईरान के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और पेट्रोलियम डेरिवेटिव्स की बिक्री पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को निलंबित कर दिया जाएगा, और उसे अपने विदेशी वित्तीय राजस्व तक पूरी पहुंच प्राप्त होगी।

6. परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं और वार्ता: अंतिम संधि तक पहुंचने के लिए 60 दिन की बातचीत होगी। ईरान अप्रसार संधि (एनपीटी) के तहत परमाणु हथियार न बनाने या हासिल न करने का अपना संकल्प दोहराएगा। ईरान को शांतिपूर्ण नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम जारी रखने की इजाजत होगी। इसके अलावा, ईरान के मौजूदा संवर्धित यूरेनियम को कम-संवर्धित करके देश से बाहर निकाला जाएगा या नष्ट किया जाएगा।

ईरान की यह एक प्रमुख मांग थी कि उसे अपने नागरिक उपयोग के लिए परमाणु कार्यक्रम जारी रखने दिया जाए। अमेरिका इसके लिए सहमत हो गया है, जबकि अमेरिका और इस्राइल के कट्टरपंथी लंबे समय से इसका पुरजोर विरोध करते रहे हैं। 

7. संप्रभुता और सैन्य वापसी: अमेरिका को ईरान के आसपास के क्षेत्रों से अपने सैन्य बलों को वापस बुलाना होगा और ईरान के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप की बाध्यकारी गारंटी देनी होगी। 

8. पुनर्निर्माण सहायता: अमेरिका और उसके सहयोगियों को ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर मूल्य की व्यापक पुनर्निर्माण योजनाएं पेश करनी होंगी।

9. एजेंडे और चर्चा की सीमाएं: ड्राफ्ट के मुताबिक, अंतिम समझौते का दायरा मुख्य रूप से परमाणु मामलों, प्रतिबंधों को हटाने और ईरान के आर्थिक पुनर्निर्माण तक सीमित रहेगा। ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या क्षेत्रीय प्रतिरोध समूहों (प्रॉक्सी) के समर्थन को आधिकारिक एजेंडे से बाहर रखा गया है। हालांकि, कुछ अमेरिकी पक्ष के अनुसार प्रॉक्सी समूहों के समर्थन को कम करने की अपेक्षा इस ढांचे में शामिल है।

युद्ध की शुरुआत में अमेरिका का एक प्रमुख लक्ष्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करना था। हालांकि, अब समझौते मसौदे को लेकर रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि मिसाइल प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका अपनी पुरानी मांगों पर नरम पड़ा है।

10. संयुक्त निगरानी और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से मान्यता: समझौते के प्रावधानों को लागू करने और इनके पालन की निगरानी के लिए एक समर्पित तंत्र स्थापित किया जाएगा और अंतिम समझौते को आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए लागू किया जाएगा।

भारत को प्रभावित करने वाले होर्मुज और तेल के मुद्दे पर क्या शर्त?

1. होर्मुज पर क्या समझौता

अमेरिका की शर्त: अमेरिका चाहता था कि यह अहम जलमार्ग सभी के लिए बिना किसी टोल के खोला जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद यह मार्ग सभी के लिए खोल दिया जाएगा।

ईरान की शर्त और नियंत्रण: ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही इस जलमार्ग को बंद कर रखा था। ईरान की स्पष्ट शर्त थी कि वह इस जलडमरूमध्य का प्रबंधन या नियंत्रण किसी भी हाल में नहीं छोड़ेगा। 

क्या हुआ समझौता: दोनों पक्षों में यह सहमति बनी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को 30 दिनों के अंदर फिर से खोला जाएगा। ईरान इस क्षेत्र में बिछाई गई खदानों को साफ करेगा। साथ ही यह मार्ग पूरी तरह से ईरान की नियामक व्यवस्था और प्रोटोकॉल के तहत ही संचालित होगा। 

भारत पर कैसे पड़ेगा असर: होर्मुज के फिर खुलने से भारत को काफी राहत मिल सकती है। दरअसल, दुनिया की लगभग 20% (पांचवां हिस्सा) तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। इस मार्ग के खुलने और ईरान को 60 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेचने की छूट मिलने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में काफी स्थिरता आने की उम्मीद है।

होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से वैश्विक स्तर पर न सिर्फ ईंधन, बल्कि भोजन और उर्वरकों (फर्टिलाइजर) जैसी बुनियादी चीजें भी काफी महंगी हो गई थीं। तेल प्रतिबंधों में छूट और आपूर्ति सामान्य होने से इन सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में विश्व स्तर पर कमी आएगी।

हालांकि, युद्ध के दौरान ईरान ने जहाजों पर जो टोल लगाया था, उसे अमेरिका और अन्य देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया था। इस मुद्दे पर बीच का रास्ता निकाला गया है। ईरान अब जहाजों से टोल नहीं वसूलेगा, लेकिन उसे जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से सेवा शुल्क लेने की पूरी इजाजत होगी। गौरतलब है कि अमेरिका और इस्राइल के हमले से पहले तक ईरान इस क्षेत्र से तेल की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं वसूलता था। हालांकि, अब खाड़ी देशों से तेल ले जाने वाले देशों को एक सेवा शुल्क देना होगा। भारत अपनी करीब 80 फीसदी तेल जरूरतों के लिए इस होर्मुज पर ही निर्भर रहा है। ऐसे में तेल के आयात के दाम शिपिंग की कीमत बढ़ने की वजह से और बढ़ सकते हैं। यानी भारत के लिए इस समझौते से कोई खास राहत नहीं होगी। 

2. ईरान के तेल निर्यात पर क्या समझौता


ईरान की मांग: ईरान का जोर इस बात पर था कि समझौते के पहले कदम के तहत अमेरिका को अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटानी चाहिए। 

अमेरिका की सहमति: अमेरिका 30 दिनों के भीतर ईरान के बंदरगाहों से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह से हटाने पर सहमत हो गया है।

तेल प्रतिबंधों का निलंबन: अमेरिका ईरान के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और पेट्रोलियम डेरिवेटिव्स की बिक्री पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को निलंबित करने पर राजी हो गया है। इस बात पर सहमति बनी है कि अमेरिका अस्थायी तौर पर प्रतिबंधों में छूट देगा, जिसके तहत ईरान 60 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेच सकेगा। इन 60 दिनों की अवधि के दौरान दोनों देश अंतिम और विस्तृत परमाणु समझौते पर बातचीत करेंगे।

भारत पर क्या असर पड़ेगा?: ईरान को तेल निर्यात की छूट मिलने से भारत उसके तेल को कम दरों पर खरीद सकता है। दरअसल, होर्मुज खुलने और ईरान के तेल बाजार में उतरने के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आएगी। इससे वैश्विक बाजारों में स्थिरता दिखना तय है। युद्ध और नौसैनिक नाकेबंदी के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह बाधित हुई थी, जिससे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था और कुछ देशों की बिजली उत्पादन क्षमता घट गई थी। लेकिन, जैसे ही इस समझौते और तेल की बिक्री पर छूट की खबर सामने आई, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आनी शुरू भी हो चुकी है। 

दूसरी तरफ ईरान ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत को अनुकूल शर्तों और बेहतर क्रेडिट पीरियड पर तेल बेचता रहा है। प्रतिबंध हटने से भारतीय रिफाइनरियों को पश्चिम एशिया से तेल खरीदने का एक और मजबूत विकल्प वापस मिल जाएगा और देश में तेल-गैस का एक नया और सस्ता स्रोत पैदा हो सकता है। 

समझौते की शर्तें स्पष्ट तो दोनों देशों में तनाव की वजह क्या?

भले ही अमेरिका और ईरान एक शांति समझौते के मसौदे पर सहमत होते दिख रहे हैं, लेकिन अभी भी कई ऐसे पेंच और विवादित मुद्दे हैं जिन पर दोनों देशों के बीच गहरा तनाव बना हुआ है। 

1. हस्ताक्षर के समय पर विवाद 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि समझौते पर जल्द ही (रविवार तक) हस्ताक्षर हो जाएंगे। वहीं, ईरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है और हस्ताक्षर रविवार को नहीं होंगे। ईरान का आरोप है कि मसौदे का अधिकांश हिस्सा तय हो गया था, लेकिन अमेरिका बार-बार अपना रुख बदल रहा है।

2. परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम नष्ट करना
ट्रंप चाहते हैं कि ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम, जिसे वे न्यूक्लियर डस्ट कहते हैं, को देश से बाहर निकाला जाए या नष्ट कर दिया जाए। दूसरी ओर ईरान शून्य संवर्धन को अपनी रेड लाइन मानता है और इसे अपने अधिकारों का हनन बताता है। ईरान यूरेनियम को बाहर भेजने के बजाय अंतरराष्ट्रीय निगरानी में उसे देश के भीतर ही कम-संवर्धित करने के पक्ष में है।

3. बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम 
अमेरिका और इस्राइल चाहते हैं कि अंतिम समझौते में ईरान के मिसाइल उत्पादन पर लगाम लगाई जाए, लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम उसकी रक्षा का हिस्सा है, यह कभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं होगा, और इसे आधिकारिक एजेंडे से बाहर रखा गया है। 

4. जब्त संपत्ति (फंड) जारी करने का समय 
संपत्तियों की वापसी की प्रक्रिया पर बड़ा मतभेद है। ईरान की मांग है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने पर या बातचीत शुरू होने से पहले ही उसकी 24 अरब डॉलर की जब्त संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा उसे तुरंत सौंप दिया जाए। इसके उलट अमेरिका इन संपत्तियों को शर्तों के अनुपालन के आधार पर धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से जारी करना चाहता है।

5. लेबनान और इस्राइल की भूमिका 
समझौते के मसौदे में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम की बात कही गई है। हालांकि, इस्राइल इस अमेरिका-ईरान समझौते का हिस्सा नहीं है। इस्राइल लेबनान में हिजबुल्ला पर लगातार हमले कर रहा है और उसने स्पष्ट किया है कि वह वहां अपनी सैन्य कार्रवाई स्वतंत्र रूप से जारी रखेगा। यह ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का एक बड़ा कारण है, क्योंकि ईरान ने किसी भी शांति समझौते को लेबनान के युद्धविराम से जोड़ा है।

6. क्षेत्रीय प्रॉक्सी गुटों का मुद्दा 
अमेरिका और इस्राइल चाहते हैं कि ईरान मध्य-पूर्व में सक्रिय अपने प्रॉक्सी गुटों, जैसे हिजबुल्ला और हूती को फंडिंग देना बंद करे। लेकिन ईरान ने प्रॉक्सी समूहों के समर्थन वाले विषय को आधिकारिक बातचीत के एजेंडे से पूरी तरह बाहर रखा है। 

7. होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण 
दोनों देश इसे खोलने पर सहमत तो हैं, लेकिन ईरान इसका नियंत्रण किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता और उसने स्पष्ट किया है कि वह वहां से गुजरने वाले जहाजों से सेवा शुल्क लेगा। इसके विपरीत, अमेरिका इसे बिना किसी शर्त के सभी के लिए पूरी तरह से खोलने की बात कर रहा है। इस मुद्दे पर अमेरिका झुकता नजर आया है, लेकिन अब तक इस शर्त पर रुख स्पष्ट करने से बचता रहा है।
 
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