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पश्चिम एशिया में युद्ध का भारत पर क्या असर: तेल-गैस के लिए क्या कदम उठाए गए, संघर्ष में अब तक क्या रही भूमिका?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Sun, 08 Mar 2026 12:47 PM IST
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सार
पश्चिम एशिया में संघर्ष से भारत के कौन-कौन से क्षेत्र प्रभावित हुए हैं? भारत ने इन प्रभावों को देखते हुए अब तक समस्याओं से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं? अमेरिका-इस्राइल के ईरान से युद्ध में अब तक उसकी क्या भूमिका रही है? आइये जानते हैं...
पश्चिम एशिया में युद्ध का भारत पर असर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इस्राइल-अमेरिका की तरफ से ईरान पर हमला बोले जाने के बाद से ही पश्चिम एशिया में स्थितियां नाजुक बनी हुई हैं। इस पूरे घटनाक्रम में 4 मार्च (बुधवार) को एक बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिकी सबमरीन ने हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत पर टॉरपीडो से हमला कर दिया और उसे डुबा दिया। इस घटना के चलते संघर्ष का दायरा दक्षिण एशिया तक पहुंच गया, जो कि आमतौर पर पश्चिम एशिया में हुए पिछले सभी संघर्षों से अछूता रहा था। इस घटना ने भारत को भी प्रभावित किया है और भारतीय नौसेना को मामले में बयान जारी करना पड़ा।
ऐसे में यह जानना अहम है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष से भारत के कौन-कौन से क्षेत्र प्रभावित हुए हैं? भारत ने इन प्रभावों को देखते हुए अब तक समस्याओं से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं? अमेरिका-इस्राइल के ईरान से युद्ध में अब तक उसकी क्या भूमिका रही है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष से भारत के कौन-कौन से क्षेत्र प्रभावित हुए हैं? भारत ने इन प्रभावों को देखते हुए अब तक समस्याओं से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं? अमेरिका-इस्राइल के ईरान से युद्ध में अब तक उसकी क्या भूमिका रही है? आइये जानते हैं...
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पश्चिम एशिया में युद्ध से भारत पर असर क्यों?
इस्राइल और अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद तेहरान की तरफ से भी पलटवार किया गया। ईरान ने इस्राइल के साथ-साथ पश्चिम एशिया में उन सभी देशों को निशाना बनाया, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन, सऊदी समेत कई देश शामिल हैं।इस संघर्ष के दौरान ईरान ने न सिर्फ सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, बल्कि ड्रोन्स के जरिए इन देशों में मौजूद तेल रिफाइनरियों, गैस उत्पादन प्लांट्स और समुद्र में आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाले तेल टैंकरों को भी तबाह किया गया। नतीजतन यूरोप से लेकर भारत-चीन समेत एशिया के बड़े देशों में ऊर्जा संकट पैदा हुआ है। कतर, सऊदी समेत कई देशों ने अपने तेल-गैस के भंडारों पर हमला होने की वजह से इनका संचालन ठीक ढंग से न हो पाने का हवाला दिया है। इसी एवज में भारत को भी फोर्स मैज्योर का नोटिस दिया गया है, जिसके तहत भारत से गैस खरीद के समझौते को अस्थायी रूप से रोकने की बात कही गई है।
इसके अलावा ईरान ने हाल ही में दुनियाभर की 20 फीसदी तेल की आवाजाही के लिए जिम्मेदार होर्मुज जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया, जिसका असर यह हुआ कि यहां से ईंधन के टैंकरों को निकलने से रोक दिया गया। नतीजतन भारत के लिए तेल-गैस का एक स्रोत प्रभावित हुआ है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% (करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन) कच्चा तेल इसी जलमार्ग के जरिए आयात करता है।
भारतीयों के लौटने का संकट
पश्चिम एशिया के अधिकतर देशों में भारतीय या तो पढ़ाई, रोजगार, व्यापार या फिर पर्यटन के मकसद से जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इस पूरे क्षेत्र में करीब 97 लाख भारतीय बसे हैं। इनमें करीब 40 फीसदी तो अकेले संयुक्त अरब अमीरात में ही रह रहे हैं। वहीं, सबसे कम यमन में बसे हैं।युद्ध के कारण इस क्षेत्र में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा खतरे में आई है। संघर्ष के चलते अधिकतर एयरलाइन कंपनियों ने अपनी सेवाओं को कुछ समय के लिए रोक दिया है। इसके अलावा कुछ देशों में लगातार होते हमलों की वजह से लोगों को सुरक्षित क्षेत्र में जाने के लिए कहा गया है। इसके चलते लाखों भारतीय वहां फंस गए हैं।
भारत के कौन से क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर और क्यों?
1. ऊर्जा क्षेत्र (तेल-गैस)
क्या असर और क्यों: भारत अपनी खपत का 90% तेल आयात करता है, और इसके आयातित कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। इसके अलावा, भारत अपनी रसोई गैस (एलपीजी) की 80-85% जरूरत और बिजली व उद्योगों के लिए जरूरी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों (कतर, सऊदी अरब, यूएई, आदि) से आयात करता है। संघर्ष के कारण इस समुद्री मार्ग से आपूर्ति बाधित होने का गंभीर खतरा है।ये भी पढ़ें: ईरान ने बंद किया होर्मुज, भारत पर क्या असर?: तेल-गैस का इंतजाम कैसे होगा, आएंगी मुश्किलें या प्लान बी तैयार
2. निर्माण और सीमेंट उद्योग
क्या असर और क्यों: सीमेंट उत्पादन और निर्माण सामग्री के लिए भारत बड़े पैमाने पर पश्चिम एशिया पर निर्भर है। भारत अपने कुल आयात का 68.5% चूना पत्थर और 62.1% जिप्सम इसी क्षेत्र से मंगाता है। आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा से सीमेंट की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर पड़ सकता है, जो कि बढ़ी हुई दरों के साथ-साथ, परियोजनाओं में देरी से जूझ सकते हैं। इसके अलावा आम लोगों को भी महंगाई का दंश झेलना पड़ सकता है।3. स्टील उद्योग
क्या असर और क्यों: स्टील बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण इनपुट डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (डीआरआई) का 59.1% आयात पश्चिम एशिया से होता है। साथ ही, भारतीय स्टील प्लांट अपनी ऊर्जा जरूरतों और डीकार्बोनाइजेशन के लिए एलपीजी और एलएनजी पर निर्भर हैं। ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और गैस की उपलब्धता में कमी इस सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।4. उर्वरक उद्योग
क्या असर और क्यों: भारत अपने आयातित सल्फर का 65.8% पश्चिम एशिया से मंगाता है, जो सल्फ्यूरिक एसिड और उर्वरकों के उत्पादन के लिए बेहद जरूरी है। इसके अलावा यूरिया बनाने के लिए एलएनजी का इस्तेमाल होता है। अगर एलएनजी और सल्फर की आपूर्ति में लंबे समय (एक महीने से अधिक) तक बाधा आती है, तो भारत का घरेलू यूरिया उत्पादन प्रभावित हो सकता है।5. ऊर्जा ग्रिड और अक्षय ऊर्जा
क्या असर और क्यों: पावर ग्रिड, इलेक्ट्रिकल उपकरणों और अक्षय ऊर्जा से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर में लगने वाले तांबे के तार का 50.7% हिस्सा भारत पश्चिम एशिया से ही आयात करता है।6. रत्न और आभूषण
क्या असर और क्यों: भारत अपने कच्चे हीरे का 40% से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। इन्हें सूरत जैसे हब में कटिंग और पॉलिश करके दुनिया भर में निर्यात किया जाता है। संघर्ष लंबा चलने पर यह पूरी एक्सपोर्ट इंडस्ट्री प्रभावित हो सकती है।भारत बड़ी मात्रा में सोना और चांदी भी पश्चिम एशिया से आयात करता है, भारत की करीब 16 फीसदी सोना और बड़ी मात्रा में चांदी की आपूर्ति संयुक्त अरब अमीरात से तय होती है। ऐसे में सोना-चांदी का आयात भी प्रभावित हो सकता है, जिसका असर रत्न और आभूषण सेक्टर पर पड़ता है।
ये भी पढ़ें: West Asia Crisis: पश्चिम एशिया में जारी तनाव से आभूषण सेक्टर पर पड़ रहा असर, क्या कहते हैं विशेषज्ञ? जानें
7. अर्थव्यवस्था और रेमिटेंस
क्या असर और क्यों: खाड़ी देशों के संगठन (जीसीसी) में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, जो किसी भी क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी है। वर्ष 2024-25 में भारत को इन देशों से 135 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड रेमिटेंस प्राप्त हुआ, जो भारत के बाहरी व्यापार घाटे को कम करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। युद्ध के कारण इन प्रवासियों की सुरक्षा, नौकरियां और भारत आने वाले पैसों (रेमिटेंस) के प्रवाह पर खतरा मंडरा रहा है।पश्चिम एशिया संघर्ष के असर को कम करने के लिए भारत के क्या कदम?
1. एलपीजी की आपूर्ति के लिए आपात कदम
- सरकार ने आपात शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सभी ऑयल रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन का पूरा उपयोग करके एलीपीजी का उत्पादन अधिकतम करें।
- पेट्रोकेमिकल उत्पादों (जैसे पॉलीप्रोपाइलीन) को बनाने के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है, ताकि घरेलू उपयोग के लिए गैस की कोई कमी न हो।
- उत्पादकों को सरकारी रिफाइनरियों (आईओसीएल, एचपीसीएल, बीपीसीएल) को एलपीजी की निर्बाध आपूर्ति करने का निर्देश दिया गया है।
2. कच्चे तेल और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत
रूसी तेल की खरीद: भारत ने ऊर्जा की कीमतों को नियंत्रित रखने और कच्चे तेल की कमी से बचने के लिए डिस्काउंट वाले रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है।अमेरिका और अन्य देशों से आयात: भारत ने अमेरिका से कच्चे तेल और एलपीजी का आयात बढ़ा दिया है। इसके अलावा, सरकार सोनाट्रैक (Sonatrach), ADNOC (अबू धाबी की कंपनी) और कई ग्लोबल ट्रेडिंग कंपनियों (टोटल एनर्जीज, विटॉल, आदि) के साथ अतिरिक्त तेल और गैस के लिए बातचीत कर रही है।
3. जहाजों के लिए समुद्री बीमा कवर
चूंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर हमले का खतरा है, इसलिए भारत ने अमेरिका से संपर्क किया है। भारत चाहता है कि अमेरिका के इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईडीएफसी) द्वारा तेल ले जाने वाले जहाजों को समुद्री बीमा सुरक्षा प्रदान की जाए।
4. उद्योगों के लिए नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश
स्टील उद्योग: कच्चे माल की कमी से बचने के लिए स्टील उद्योग चूना पत्थर के लिए थाईलैंड और वियतनाम का रुख कर रहा है, जबकि डीआरआई के लिए लीबिया और मलेशिया जैसे वैकल्पिक स्रोतों को तलाशा जा रहा है।उर्वरक उद्योग: खाद और यूरिया बनाने के लिए जरूरी सल्फर की आपूर्ति के लिए भारतीय कंपनियां दक्षिण-पूर्व एशिया के सप्लायर्स के साथ बातचीत कर रही हैं।
5. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा
- भारत के विदेश मंत्रालय ने खाड़ी देशों की स्थिति पर नजर रखने और भारतीयों की मदद के लिए एक स्पेशल कंट्रोल रूम स्थापित किया है।
- कतर, बहरीन और कुवैत स्थित भारतीय दूतावास लगातार यहां रहने वाले नागरिकों के लिए एडवायजरी जारी कर रहे हैं।
- नागरिकों से सतर्क रहने, सैन्य ठिकानों के वीडियो शेयर न करने, अफवाहों से बचने और आपातकालीन स्थिति में दूतावास से संपर्क करने की अपील की गई है।
- इसके अलावा कतर में फंसे पर्यटकों और कम वक्त के लिए गए भारतीयों का विवरण भी जुटाया जा रहा है।
संघर्ष में भारत का झुकाव किस ओर, अब तक क्या भूमिका रही?
- भारत क्षेत्र में शांति, बातचीत और तनाव कम करने का लगातार समर्थन कर रहा है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के अपने समकक्ष अराघची से फोन पर बात की।
- दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन समेत पश्चिम एशिया में ईरान के हमलों से प्रभावित सभी देशों के राष्ट्रप्रमुखों से चर्चा की और भारतीयों की सुरक्षा को लेकर उनका आभार जताया।
- इस बीच पीएम मोदी ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी बात की। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री गुरुवार को ही भारत स्थित ईरान दूतावास पहुंचे थे। उन्होंने यहां भारत की तरफ से ईरान के सुप्रीम लीडर के निधन पर संवेदना जताया और शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए।
- वहीं, मानवीय और समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने तकनीकी खराबी का सामना कर रहे ईरानी जहाज आईआरआईएस लावन को सुरक्षित रूप से कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति दी।
- जब अमेरिका द्वारा ईरानी युद्धपोत- आईआरआईएस देना को अमेरिकी हमले में डुबाया गया, तो भारतीय नौसेना ने बचाव कार्य के लिए अपने पी8आई विमान और आईएनएस तरंगिणी व आईएनएस ईक्षक (जहाजों) को सर्च और रेस्क्यू अभियान में तैनात किया।
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