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Falgun Amavasya 2026: फाल्गुन अमावस्या कल, पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए करें इस स्तोत्र और कवच का पाठ

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Mon, 16 Feb 2026 06:24 PM IST
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सार

Falgun Amavasya 2026: अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Falgun Amavasya 2026 pitru stotra and kavach path on amavasya day pitra dosh remedies
पितृ स्तोत्र और पितृ कवच - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

Falgun Amavasya 2026: इस वर्ष फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन मास की अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा में स्नान करना अत्यंत पुण्यदायी समझा जाता है। साथ ही दान, जप और पूजा-पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

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अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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इसके अतिरिक्त, अमावस्या के अवसर पर पितृ निवारण स्तोत्र और पितृ कवच का श्रद्धापूर्वक पाठ करना भी लाभकारी माना गया है। कहा जाता है कि इससे कुंडली में उपस्थित पितृ दोष के प्रभाव कम होते हैं और जीवन में आ रही बाधाएं दूर होने लगती हैं। पूर्वजों की कृपा से परिवार में शांति, उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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पितृ निवारण स्तोत्र
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा ।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा ।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।।

प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।।

पितृ कवच
कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥

तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥

प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥

उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥

ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।

 


 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

 

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