E20 के बाद अब बायो-CNG का मास्टरप्लान: जानें ₹23,731 करोड़ की गोबरधन योजना का आपकी CNG गाड़ी पर क्या होगा असर
ई20 ईंधन के बाद अब सरकार ने सीएनजी के क्षेत्र में भी बड़ा कदम उठाया है। सरकार घरेलू स्तर पर बनने वाली संपीड़ित जैव गैस (बायो-सीएनजी) को धीरे-धीरे देश की प्राकृतिक गैस आपूर्ति में मिलाने की योजना पर काम कर रही है। जानें इसका वाहन उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?
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पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल (E20) के सफल मिश्रण के बाद अब केंद्र सरकार ने सीएनजी (CNG) क्षेत्र के लिए भी एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश की प्राकृतिक गैस आपूर्ति में बायो-सीएनजी (Compressed Biogas - CBG) को मिलाने के लिए 23,731 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ 'गोबरधन' (GOBARdhan) राष्ट्रीय सर्कुलर बायोनर्जी योजना को मंजूरी दे दी है।
यह योजना वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक (अगले 10 वर्षों के लिए) लागू की जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में स्वदेशी बायो-सीएनजी के उत्पादन को कई गुना बढ़ाना, स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।
बायो-सीएनजी क्या है और 'गोबरधन' योजना के तहत क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी?
बायो-सीएनजी (CBG) को मवेशियों के गोबर, फसल अवशेषों (पराली), नगरपालिका के ठोस कचरे, खाद्य अपशिष्ट और चीनी मिलों के उप-उत्पाद जैसे जैविक कचरे से तैयार किया जाता है। शोधन के बाद यह रासायनिक रूप से प्राकृतिक गैस जैसी ही होती है।
पहले की योजनाओं के विपरीत, नई गोबरधन योजना एक ही राष्ट्रीय ढांचे के तहत बायो-सीएनजी इकोसिस्टम की सभी जरूरतों को पूरा करती है:
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सुनिश्चित मांग:
बायो-सीएनजी निर्माताओं को बिक्री की चिंता नहीं होगी, क्योंकि सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियां अनिवार्य रूप से उनसे सीबीजी खरीदेंगी। -
फिक्स्ड एडमिनिस्टर्ड प्राइस:
सरकार ने बायो-सीएनजी के लिए 2,110 रुपये प्रति MMBTU की एक स्थिर कीमत तय की है, जिससे कंपनियों को लंबे समय तक स्थिर राजस्व मिलेगा। -
कैपिटल असिस्टेंस:
नए (ग्रीनफील्ड) सीबीजी प्रोजेक्ट्स को प्रति टन प्रतिदिन (TPD) स्थापित क्षमता पर 2 करोड़ रुपये तक की पूंजीगत सहायता मिलेगी। पुराने (ब्राउनफील्ड) प्रोजेक्ट्स के विस्तार को भी यह मदद मिलेगी। -
पाइपलाइन और क्रेडिट सपोर्ट:
योजना में सीधे पाइपलाइन कनेक्टिविटी, एमएसएमई के लिए क्रेडिट गारंटी सपोर्ट और कचरा/कच्चा माल जुटाने के लिए एक विशेष 'चैलेंज फंड' की व्यवस्था की गई है।
सरकार ने बायो-सीएनजी ब्लेंडिंग के लिए क्या लक्ष्य तय किए हैं?
देश में बायो-सीएनजी के उत्पादन को अगले एक दशक में करीब 10 गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए चरणबद्ध ब्लेंडिंग टारगेट अधिसूचित किए गए हैं:
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FY2026-27: सीएनजी आपूर्ति में 3% बायो-सीएनजी का मिश्रण।
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FY2027-28: मिश्रण की सीमा बढ़ाकर 4% की जाएगी।
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FY2028-29 और आगे: 5% या उससे अधिक बायो-सीएनजी का अनिवार्य मिश्रण।
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और सीएनजी गाड़ी मालिकों पर इस योजना का क्या असर पड़ेगा?
यह फैसला भारत के तेजी से बढ़ते सीएनजी वाहन बाजार के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित होने वाला है:
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वाहनों में बदलाव की जरूरत नहीं:
इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल में इंजन कम्पैटिबिलिटी की आवश्यकता होती है। लेकिन इसके उलट बायो-सीएनजी रासायनिक रूप से प्राकृतिक गैस जैसी ही होती है। इसलिए, मौजूदा सीएनजी गाड़ियों में बिना किसी हार्डवेयर परिवर्तन के इस ब्लेंडेड गैस का इस्तेमाल किया जा सकेगा। -
कार निर्माताओं को प्रोत्साहन:
मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, ह्यूंदै, टोयोटा और कमर्शियल वाहन निर्माता लगातार अपने सीएनजी पोर्टफोलियो का विस्तार कर रहे हैं। मारुति अपनी अधिकांश कारों में और टाटा अपने टर्बोचार्ज्ड iCNG रेंज में सीएनजी दे रही है। बायो-सीएनजी की उपलब्धता से ऑटो कंपनियां नए सीएनजी मॉडल लॉन्च करने के लिए और प्रोत्साहित होंगी। -
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को लाभ:
यह योजना कृषि कचरे और गोबर का सही इस्तेमाल करेगी, पराली जलाने की समस्या कम करेगी और भारत की महंगे कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता घटाएगी।
इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने में कौन-सी चुनौतियां आ सकती हैं?
योजना की सफलता पूरी तरह से इसके जमीनी कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी:
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अतीत का अनुभव:
भारत ने 'सतत' (SATAT) और राष्ट्रीय बायोनर्जी कार्यक्रम के तहत पहले ही 200 से अधिक सीबीजी प्लांट चालू किए हैं। लेकिन कच्चे माल की लॉजिस्टिक्स, फंडिंग और पाइपलाइन कनेक्टिविटी की कमी के कारण रफ्तार धीमी रही है। -
भविष्य की कुंजी:
गोबरधन योजना ने इन सभी पुरानी ढांचागत बाधाओं को दूर करने की कोशिश की है। अब इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नए सीबीजी प्लांट कितनी जल्दी स्थापित होते हैं, उन्हें गैस नेटवर्क से कितनी तेजी से जोड़ा जाता है और उन्हें लगातार कच्चे माल की आपूर्ति कैसे सुनिश्चित की जाती है।