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Ethanol Row: ईवी बनाम पेट्रोल बनाम फ्लेक्स-फ्यूल, पांच साल के खर्च और माइलेज के गणित में कौन मारेगा बाजी?
Wed, 22 Jul 2026 03:08 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
ऑटो डेस्क, अमर उजाला
ऑटो डेस्क, अमर उजाला
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Wed, 22 Jul 2026 03:08 PM IST
सार
इथेनॉल विवाद के बीच गाड़ी खरीदार असमंजस में हैं। जानिए मारुति वैगनआर पेट्रोल, फ्लेक्स-फ्यूल और टाटा टियागो ईवी के 5 साल के खर्च का असली गणित और तय करें आपके लिए कौन सी कार है बेस्ट!
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फ्लेक्स-फ्यूल कार
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विस्तार
भारत सरकार ने अप्रैल 2026 से देश भर में 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) को मानक ईंधन बना दिया है। इसके साथ ही भविष्य में 100 फीसदी इथेनॉल नीति को लागू करने के उद्देश्य से 85 फीसदी इथेनॉल मिश्रण वाले E85 ईंधन और उससे चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (एफएफवी) को भी पेश किया जा रहा है। लेकिन, इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के इंजन पर पड़ने वाले असर और नियमों में लगातार हो रहे बदलावों ने नए खरीदारों के मन में भारी असमंजस पैदा कर दिया है।
क्या ऐसे में पारंपरिक पेट्रोल गाड़ियां खरीदना बेहतर है, फ्लेक्स-फ्यूल का विकल्प चुनना चाहिए, या इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) ही लंबी रेस का असली घोड़ा साबित होगा? बीटूके एनालिटिक्स के एक हालिया अध्ययन ने इस पूरे गणित को साफ कर दिया है।
इथेनॉल संकट और नियमों के इस दौर में खरीदार क्यों हैं असमंजस में?
वर्तमान में, नए वाहन खरीदारों के बीच इस बात को लेकर गहरा डर और भ्रम है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उनके वाहनों को किस तरह प्रभावित करेगा। वे नियमों में स्थिरता और इंजन पर इसके प्रभाव को बेहतर ढंग से समझने के लिए थोड़ा और समय चाहते हैं। खरीदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे पारंपरिक पेट्रोल मॉडल खरीदें या सीधे इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) की तरफ रुख करें। सरकार का दावा है कि इथेनॉल नीति से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। लेकिन उपभोक्ताओं के लिए जेब का गणित और गाड़ी की कार्यकुशलता सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है।
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पेट्रोल, फ्लेक्स-फ्यूल और ईवी के पांच साल के खर्च का असली गणित क्या है?
अध्ययन में मारुति सुजुकी वैगनआर (पेट्रोल), वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल (E85) और टाटा टियागो ईवी (24 kWh) का पांच साल (सालाना 15,000 किमी रनिंग) के आधार पर खर्च का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है:
पेट्रोल कार: इसकी शोरूम कीमत ₹5,95,900 है। इसका प्रति किलोमीटर ईंधन खर्च ₹4.49 (पेट्रोल दर ₹112.24/लीटर, माइलेज 25 किमी) है। पांच साल का कुल ईंधन खर्च ₹3,36,720 और मेंटेनेंस ₹75,000 है। इसका कुल ओनरशिप कॉस्ट (टीसीओ) सबसे कम ₹10,07,620 आता है। कम शुरुआती कीमत के कारण यह वर्तमान में सबसे किफायती विकल्प है।
इलेक्ट्रिक कार: इसकी शोरूम कीमत सबसे ज्यादा ₹9,49,000 है। लेकिन इसका रनिंग कॉस्ट केवल ₹1.12 प्रति किमी (चार्जिंग दर ₹240/चार्ज, रेंज 215 किमी) है। इसका 5 साल का कुल एनर्जी खर्च केवल ₹94,500 आता है, जो पेट्रोल कार से करीब 72% कम है। मेंटेनेंस ₹77,500 के साथ इसका कुल TCO ₹11,21,000 है।
फ्लेक्स-फ्यूल कार: इसकी शोरूम कीमत ₹7,23,900 है। सस्ते E85 ईंधन (₹91.18/लीटर) के बावजूद इथेनॉल की कम कार्यकुशलता के कारण इसका माइलेज घटकर 18.75 किमी रह जाता है। इस वजह से प्रति किमी खर्च ₹4.86 आता है। 5 साल का कुल ईंधन खर्च ₹3,64,720 और रखरखाव ₹93,000 के साथ इसका कुल टीसीओ सबसे अधिक ₹11,81,620 बैठता है।
फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां तकनीकी और आर्थिक रूप से क्यों पिछड़ रही हैं?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (एफएफवी) के साथ सबसे बड़ी चुनौती उनकी कम ईंधन दक्षता (लोअर फ्यूल एफिशिएंसी) है। इथेनॉल आधारित ईंधन सस्ता होने के बावजूद कम माइलेज के कारण वाहनों को बार-बार रीफ्यूलिंग की आवश्यकता होती है, जिससे रनिंग कॉस्ट बढ़ जाती है। इसके अलावा, भारत में E85 इकोसिस्टम अभी बिल्कुल शुरुआती चरण में है और बाजार में इसके अनुकूल मॉडल्स की भारी कमी है। अध्ययन के अनुसार, देश में फ्लेक्स-फ्यूल इकोसिस्टम को पूरी तरह विकसित होने और बाजार में सार्थक पकड़ बनाने में कम से कम 10 से 15 साल का लंबा समय लग सकता है।
लंबी अवधि के टिकाऊ समाधान के रूप में ईवी क्यों सबसे बेहतर विकल्प है?
दीर्घकालिक स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) के मामले में ईवी सबसे आगे है। शून्य टेलपाइप उत्सर्जन के कारण ईवी पर्यावरण के अनुकूल हैं। जैसे-जैसे देश भर में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है और बैटरी तकनीक उन्नत हो रही है, बैटरी और कलपुर्जों की लागत धीरे-धीरे नीचे आने की संभावना है। यह इसे बड़े उपभोक्ता वर्ग के लिए व्यावहारिक और अधिक किफायती बनाएगा।
आगे की राह क्या है?
अगर आप तुरंत कम बजट में गाड़ी खरीदना चाहते हैं, तो स्थापित रीफ्यूलिंग नेटवर्क के कारण पेट्रोल कार अभी भी व्यावहारिक है। लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की तुलना में ईवी एक बेहद भरोसेमंद, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल भविष्य-तैयार विकल्प बनकर उभर रही है जो लंबे समय में आपकी जेब और पर्यावरण दोनों का ख्याल रखेगी।
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क्या ऐसे में पारंपरिक पेट्रोल गाड़ियां खरीदना बेहतर है, फ्लेक्स-फ्यूल का विकल्प चुनना चाहिए, या इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) ही लंबी रेस का असली घोड़ा साबित होगा? बीटूके एनालिटिक्स के एक हालिया अध्ययन ने इस पूरे गणित को साफ कर दिया है।
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इथेनॉल संकट और नियमों के इस दौर में खरीदार क्यों हैं असमंजस में?
वर्तमान में, नए वाहन खरीदारों के बीच इस बात को लेकर गहरा डर और भ्रम है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उनके वाहनों को किस तरह प्रभावित करेगा। वे नियमों में स्थिरता और इंजन पर इसके प्रभाव को बेहतर ढंग से समझने के लिए थोड़ा और समय चाहते हैं। खरीदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे पारंपरिक पेट्रोल मॉडल खरीदें या सीधे इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) की तरफ रुख करें। सरकार का दावा है कि इथेनॉल नीति से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। लेकिन उपभोक्ताओं के लिए जेब का गणित और गाड़ी की कार्यकुशलता सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है।
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पेट्रोल, फ्लेक्स-फ्यूल और ईवी के पांच साल के खर्च का असली गणित क्या है?
अध्ययन में मारुति सुजुकी वैगनआर (पेट्रोल), वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल (E85) और टाटा टियागो ईवी (24 kWh) का पांच साल (सालाना 15,000 किमी रनिंग) के आधार पर खर्च का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है:
पेट्रोल कार: इसकी शोरूम कीमत ₹5,95,900 है। इसका प्रति किलोमीटर ईंधन खर्च ₹4.49 (पेट्रोल दर ₹112.24/लीटर, माइलेज 25 किमी) है। पांच साल का कुल ईंधन खर्च ₹3,36,720 और मेंटेनेंस ₹75,000 है। इसका कुल ओनरशिप कॉस्ट (टीसीओ) सबसे कम ₹10,07,620 आता है। कम शुरुआती कीमत के कारण यह वर्तमान में सबसे किफायती विकल्प है।
इलेक्ट्रिक कार: इसकी शोरूम कीमत सबसे ज्यादा ₹9,49,000 है। लेकिन इसका रनिंग कॉस्ट केवल ₹1.12 प्रति किमी (चार्जिंग दर ₹240/चार्ज, रेंज 215 किमी) है। इसका 5 साल का कुल एनर्जी खर्च केवल ₹94,500 आता है, जो पेट्रोल कार से करीब 72% कम है। मेंटेनेंस ₹77,500 के साथ इसका कुल TCO ₹11,21,000 है।
फ्लेक्स-फ्यूल कार: इसकी शोरूम कीमत ₹7,23,900 है। सस्ते E85 ईंधन (₹91.18/लीटर) के बावजूद इथेनॉल की कम कार्यकुशलता के कारण इसका माइलेज घटकर 18.75 किमी रह जाता है। इस वजह से प्रति किमी खर्च ₹4.86 आता है। 5 साल का कुल ईंधन खर्च ₹3,64,720 और रखरखाव ₹93,000 के साथ इसका कुल टीसीओ सबसे अधिक ₹11,81,620 बैठता है।
फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां तकनीकी और आर्थिक रूप से क्यों पिछड़ रही हैं?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (एफएफवी) के साथ सबसे बड़ी चुनौती उनकी कम ईंधन दक्षता (लोअर फ्यूल एफिशिएंसी) है। इथेनॉल आधारित ईंधन सस्ता होने के बावजूद कम माइलेज के कारण वाहनों को बार-बार रीफ्यूलिंग की आवश्यकता होती है, जिससे रनिंग कॉस्ट बढ़ जाती है। इसके अलावा, भारत में E85 इकोसिस्टम अभी बिल्कुल शुरुआती चरण में है और बाजार में इसके अनुकूल मॉडल्स की भारी कमी है। अध्ययन के अनुसार, देश में फ्लेक्स-फ्यूल इकोसिस्टम को पूरी तरह विकसित होने और बाजार में सार्थक पकड़ बनाने में कम से कम 10 से 15 साल का लंबा समय लग सकता है।
लंबी अवधि के टिकाऊ समाधान के रूप में ईवी क्यों सबसे बेहतर विकल्प है?
दीर्घकालिक स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) के मामले में ईवी सबसे आगे है। शून्य टेलपाइप उत्सर्जन के कारण ईवी पर्यावरण के अनुकूल हैं। जैसे-जैसे देश भर में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है और बैटरी तकनीक उन्नत हो रही है, बैटरी और कलपुर्जों की लागत धीरे-धीरे नीचे आने की संभावना है। यह इसे बड़े उपभोक्ता वर्ग के लिए व्यावहारिक और अधिक किफायती बनाएगा।
आगे की राह क्या है?
अगर आप तुरंत कम बजट में गाड़ी खरीदना चाहते हैं, तो स्थापित रीफ्यूलिंग नेटवर्क के कारण पेट्रोल कार अभी भी व्यावहारिक है। लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की तुलना में ईवी एक बेहद भरोसेमंद, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल भविष्य-तैयार विकल्प बनकर उभर रही है जो लंबे समय में आपकी जेब और पर्यावरण दोनों का ख्याल रखेगी।