Court: 2013 में भुगतान करने पर भी नहीं मिली कार, उपभोक्ता आयोग का महिंद्रा को ब्याज सहित रकम लौटाने का आदेश
करीब एक दशक पुराने मामले में पुडुचेरी राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Mahindra & Mahindra और उसके डीलर को कार की डिलीवरी नहीं देने के मामले में जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने कंपनी को खरीदार की जमा राशि ब्याज सहित लौटाने और मुआवजा देने का आदेश दिया है।
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विस्तार
एक आम इंसान जब अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से एक नई गाड़ी खरीदने का सपना देखता है, तो वह पूरे पैसे चुकाने के बाद हफ्ते-दो हफ्ते में गाड़ी घर आने की उम्मीद करता है। लेकिन सोचिए, अगर किसी शख्स ने साल 2013 में ही कार की पूरी कीमत चुका दी हो और आज 2026 तक उसे अपनी गाड़ी का दीदार भी न हुआ हो? तो उसके दिल पर क्या बीत रही होगी?
ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला मामला पुडुचेरी से सामने आया है। पुडुचेरी राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश की दिग्गज वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra and Mahindra) और उसके डीलर को इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने 24 जून को दिए अपने आदेश में महिंद्रा को पूरी रकम ब्याज सहित वापस करने और पीड़ित को भारी मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
क्या था पूरा विवाद और बैंक के पैसे देने पर भी क्यों नहीं मिली कार?
यह पूरा कानूनी मामला उपभोक्ता सी. उन्नीकृष्णन, महिंद्रा कंपनी और उसके स्थानीय डीलर के बीच का है। इस पूरे घटनाक्रम और विवाद को विस्तार से समझाते हैं:
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अक्तूबर 2013 में बुकिंग और पूरा भुगतान:
पीड़ित सी. उन्नीकृष्णन ने अक्तूबर 2013 में महिंद्रा के डीलर 'राजाराम एंड संस' के पास Mahindra XUV500 W6 मॉडल बुक किया था। इसके लिए उन्होंने 40,000 रुपये का एडवांस दिया था। इसके तुरंत बाद, 28 अक्तूबर 2013 को उनके बैंक ने लोन की बची हुई 8,96,200 रुपये की भारी-भरकम राशि सीधे डीलर के खाते में ट्रांसफर कर दी थी। -
हफ्ते भर का वादा, जो कभी पूरा नहीं हुआ:
डीलर ने स्टॉक की कमी का हवाला देते हुए एक सप्ताह के भीतर गाड़ी सौंपने का वादा किया था। लेकिन हफ्ते महीनों में बदले और महीने वर्षों में, गाड़ी कभी ग्राहक के पास नहीं पहुंची। -
2015 का जिला फोरम का अधूरा आदेश:
गाड़ी न मिलने पर उन्नीकृष्णन ने 2015 में जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। तब जिला फोरम ने केवल डीलर को कसूरवार माना और महिंद्रा कंपनी को क्लीन चिट दे दी थी।क्योंकि कंपनी और ग्राहक के बीच कोई सीधा एग्रीमेंट नहीं था। फोरम ने डीलर को 6 प्रतिशत ब्याज के साथ 8,71,200 रुपये लौटाने, 50,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये अदालती खर्च देने को कहा था। -
राज्य आयोग में बड़ी अपील:
जिला फोरम के इस फैसले से असंतुष्ट होकर उन्नीकृष्णन राज्य आयोग पहुंचे। उन्होंने अपनी पूरी चुकाई गई राशि (9,36,200 रुपये), 24 प्रतिशत ब्याज और 2 लाख रुपये मुआवजे की मांग की। उन्होंने दलील दी कि पिछला आदेश बिना किसी ठोस तर्क के था और इसमें उस 2 लाख रुपये के खर्च को भी नजरअंदाज कर दिया गया जो उन्होंने उस लोन को लेकर अपने ही बैंक द्वारा किए गए केस को लड़ने में गंवा दिए थे। -
डीलर और कंपनी की अपनी-अपनी दलीलें:
डीलर ने अजीब तर्क देते हुए कहा कि ग्राहक ने कार बिजनेस के लिए ली थी, इसलिए वह 'उपभोक्ता' ही नहीं है। साथ ही पूरी गलती महिंद्रा की है क्योंकि डीलर ने पैसा आगे भेज दिया था। दूसरी तरफ, महिंद्रा कंपनी के वकील ने कहा कि निर्माता होने के नाते वे सीधे ग्राहकों से डील नहीं करते। और उनकी सेवा में कोई कमी या मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (बनावट की खराबी) साबित नहीं हुई है।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने डीलर और महिंद्रा की दलीलों पर क्या कहा?
एस सुंदरवदीवेलु (पीठासीन सदस्य) और एस औमासांगुअरी (सदस्य) की पीठ ने दोनों विपक्षियों के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया और सख्त टिप्पणी की:
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1. ग्राहक पूरी तरह 'कंज्यूमर' है:
आयोग ने कहा कि असली पैमाना यह है कि क्या गाड़ी का इस्तेमाल मुनाफा कमाने के इरादे से किया गया? चूंकि कार की डिलीवरी ही नहीं हुई, तो उससे पैसे कमाने का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए शिकायतकर्ता कानूनन एक उपभोक्ता है। -
2. डीलर कंपनी का चेहरा होता है:
आयोग ने स्पष्ट किया कि जब लोग कार खरीदते हैं, तो वे निर्माता और मॉडल देखकर फैसला लेते हैं। डीलर केवल खरीदार और कंपनी के बीच एक पुल (माध्यम) का काम करता है। लोग सीधे मैन्युफैक्चरर से कार नहीं खरीद सकते, इसलिए डीलर ही कंपनी का चेहरा होता है। -
3. महिंद्रा को पूरी जानकारी थी:
रिकॉर्ड के मुताबिक, बैंक मैनेजर ने पुष्टि की थी कि डीलर अपने खाते से पैसा वापस नहीं ले सकता था। लोन एग्रीमेंट में भी साफ था कि पैसा सीधे निर्माता के पास जाएगा। इसके अलावा, डीलर द्वारा महिंद्रा को भेजे गए एक ईमेल और 16 जून 2014 के परचेज ऑर्डर से साबित हुआ कि महिंद्रा को पता था कि गाड़ी भेजी जानी है, फिर भी कंपनी ने गाड़ी नहीं भेजी। -
4. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला:
सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि एक बार जब मूल कंपनी का नाम साफ तौर पर सामने आ जाए, तो उसके कार्यों के लिए केवल एजेंट (डीलर) को दोष नहीं दिया जा सकता। इस आधार पर मुख्य रूप से महिंद्रा कंपनी को कार डिलीवर न करने का दोषी माना गया। हालांकि, डीलर को भी नहीं बख्शा गया क्योंकि उसने कार का परचेज ऑर्डर करीब 8 महीने की देरी से कंपनी को भेजा था।
पीड़ित ग्राहक को अब कितना रिफंड और मुआवजा मिलेगा?
अंतिम कानूनी आदेश: राज्य आयोग ने पीड़ित ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिंद्रा और डीलर दोनों पर भारी जुर्माना लगाया है, जिसकी पूरी डिटेल्स ये हैं:
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महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी को आदेश: कंपनी ग्राहक को 8,71,200 रुपये की राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाएगी (यह ब्याज 2 अप्रैल 2015 से लेकर पूरी रकम चुकाए जाने के दिन तक गिना जाएगा)। इसके अलावा महिंद्रा को मानसिक प्रताड़ना के लिए 1,50,000 का मुआवजा रुपये और 10,000 रुपये अदालती खर्च के रूप में अलग से देने होंगे।
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डीलर (राजाराम एंड संस) को आदेश: ऑर्डर देने में देरी करने के लिए डीलर को ग्राहक को अलग से 50,000 रुपये का मुआवजा देने का हुक्म सुनाया गया है।
समय सीमा और अतिरिक्त पेनल्टी: रिफंड और उसके ब्याज को छोड़कर, मुआवजे और अदालती खर्च की बाकी सभी रकमों का भुगतान आदेश के 30 दिनों के भीतर करना होगा। यदि कंपनियां इस समय सीमा में नाकाम रहती हैं, तो बची हुई राशि पर 8 प्रतिशत का अतिरिक्त वार्षिक ब्याज लागू कर दिया जाएगा।