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खरीफ फसल: मक्का और सोयाबीन का घटा रकबा, उड़द-बाजरा और तुअर की बढ़ी बुवाई; क्या बढ़ सकती है महंगाई?

Wed, 30 Sep 2026 02:03 PM IST
द बोनस बोनस डेस्क, नई दिल्ली
बोनस डेस्क, नई दिल्ली Published by: द बोनस Updated Wed, 30 Sep 2026 02:03 PM IST
सार

खरीफ फसलों के रकबे में उतार-चढ़ाव से बाजार और रसोई पर असर। मक्का, सोयाबीन, धान, कपास का रकबा घटा, जबकि उड़द, तुअर, बाजरा बढ़ा। कीमतों पर संभावित प्रभाव। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

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Kharif Crop Area Changes: Direct Impact on Kitchen and Market, What Will Get Expensive?
खरीफ फसल (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

देश में खरीफ सीजन की फसलों के रकबे (बुवाई क्षेत्र) में इस बार आए उतार-चढ़ाव का सीधा असर आने वाले महीनों में आपकी रसोई और बाजार पर पड़ सकता है। कृषि मंत्रालय की हालिया राष्ट्रीय रबी कॉन्फ्रेंस में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जहां कुछ प्रमुख फसलों के रकबे में कमी आई है, वहीं कुछ दलहन और मोटे अनाजों का दायरा बढ़ा है। उत्पादन के आधिकारिक आंकड़े और पहला अग्रिम अनुमान अक्टूबर के मध्य तक आने की उम्मीद है, लेकिन शुरुआती रुझानों ने बाजार में हलचल बढ़ा दी है।

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इस खरीफ सीजन में मक्का, सोयाबीन, कपास, धान और गन्ने जैसी महत्वपूर्ण फसलों के बुवाई क्षेत्र में पिछले साल की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है। मक्का का रकबा घटने से इसकी घरेलू उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। मक्का का इस्तेमाल न केवल खाद्य बल्कि पोल्ट्री (मुर्गी पालन) और स्टार्च उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है, जिससे इसके दाम चढ़ सकते हैं। वहीं, सोयाबीन का रकबा कम होने से खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार द्वारा हाल ही में खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाने से आयात के जरिए आपूर्ति को संभालने में मदद मिल सकती है।

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धान का रकबा घटने से चावल के कुल उत्पादन पर असर पड़ना तय है। इससे पहले आई एक रिपोर्ट में देश में करीब एक करोड़ टन कम चावल पैदा होने का अनुमान जताया गया था, जिसका असर घरेलू कीमतों और निर्यात दोनों पर पड़ सकता है। कपास के उत्पादन में कमी आने से कपड़ा उद्योग की लागत बढ़ सकती है।

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2025 और 2026 के आकड़े 

किनका रकबा घटा?

  • मक्का: 94.08 से घटकर 91.09 लाख हेक्टेयर, यानी 2.99 लाख हेक्टेयर की कमी।
  • सोयाबीन: 122.98 से 121.82 लाख हेक्टेयर, यानी 1.16 लाख हेक्टेयर की कमी।
  • धान: 438.19 से 421.82 लाख हेक्टेयर, यानी 16.37 लाख हेक्टेयर की बड़ी कमी।
  • कपास: 109.87 से 109.17 लाख हेक्टेयर, यानी 0.69 लाख हेक्टेयर कम।
  • गन्ना: 58.87 से 58.47 लाख हेक्टेयर, यानी 0.40 लाख हेक्टेयर कम।

किना रकबा बढ़ा?

  • उड़द: 22.46 से 25.15 लाख हेक्टेयर, यानी 2.68 लाख हेक्टेयर या करीब 11.9% बढ़ोतरी।
  • तुअर: 44.93 से 45.66 लाख हेक्टेयर, यानी 0.72 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी।
  • बाजरा: 62.87 से 64.86 लाख हेक्टेयर, यानी 1.99 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी।
  • सूरजमुखी: 0.64 से 1.25 लाख हेक्टेयर, यानी 0.61 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी। यह लगभग दोगुने के करीब है।

कहां से मिल रही है राहत? 

एक तरफ जहां कुछ फसलों का रकबा घटा है, वहीं दूसरी तरफ दालों और मोटे अनाजों के मोर्चे पर कुछ राहतभरी खबरें भी हैं। उड़द और तुअर (अरहर) की बुवाई में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि आने वाले दिनों में मौसम अनुकूल रहा और उत्पादन बेहतर रहा, तो घरेलू बाजार में दालों की आपूर्ति सुधरेगी और विदेशों से आयात पर हमारी निर्भरता कुछ हद तक कम होगी। बाजरा का रकबा बढ़ने से मोटे अनाजों की उपलब्धता मजबूत होगी। इसके अलावा, सूरजमुखी का रकबा बढ़ना भी खाद्य तेल बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

अग्रिम अनुमान आने में क्यों हो रही है देरी?

सामान्य तौर पर खरीफ फसलों का पहला अग्रिम अनुमान सितंबर के अंत तक आ जाता है, लेकिन इस बार इसमें थोड़ी देरी हो रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि अभी तक महाराष्ट्र सहित करीब 10 राज्यों ने अपने फसल अनुमान कृषि मंत्रालय को नहीं भेजे हैं। मंत्रालय ने इन सभी राज्यों को एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है, ताकि अक्टूबर के मध्य तक सटीक आंकड़े जारी किए जा सकें।
फसलों के रकबे में होने वाला यह बदलाव सीधे तौर पर मांग और आपूर्ति के समीकरण को तय करता है। यदि समय रहते आयात और बफर स्टॉक के जरिए स्थिति को नहीं संभाला गया, तो आने वाले दिनों में रोजमर्रा की कई चीजें और महंगी हो सकती हैं।

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