Biz Updates: निवेश के बड़े वादों के साथ AI समिट का समापन, वैश्विक व्यापार में हुए बदलाव से भारत को कैसे फायदा
राजधानी दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का समापन एक ऐतिहासिक वैश्विक घोषणा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के भविष्य को दिशा देने वाले बड़े निवेश प्रतिबद्धताओं के साथ हुआ। इस छह दिवसीय समिट में करीब 6 लाख लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया, जबकि लाइव वर्चुअल स्ट्रीमिंग के जरिए 9 लाख से अधिक कुल व्यूज दर्ज किए गए। कार्यक्रम में 100 से अधिक देशों और 20 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधिमंडलों ने हिस्सा लिया, जहां जिम्मेदार और समावेशी AI अपनाने पर विशेष जोर दिया गया।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) के अनुसार, इंडिया AI इम्पैक्ट समिट डिक्लेरेशन को 92 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का समर्थन प्राप्त हुआ। इस घोषणा में समिट के दौरान गठित सात थीमैटिक वर्किंग ग्रुप्स द्वारा किए गए कार्यों और सुझावों को मान्यता दी गई है। इसके साथ ही 13 प्रमुख वैश्विक और भारतीय फ्रंटियर मॉडल डेवलपर्स ने “न्यू दिल्ली फ्रंटियर AI इम्पैक्ट कमिटमेंट्स” की घोषणा की, जिसका उद्देश्य भरोसेमंद, सुरक्षित और समावेशी AI तैनाती को बढ़ावा देना है।
समिट ने AI वैल्यू चेन में बड़े वित्तीय निवेशों को भी गति दी। अनुमान है कि इंफ्रास्ट्रक्चर, फाउंडेशन मॉडल, हार्डवेयर और एप्लिकेशन सहित AI से जुड़े क्षेत्रों में 200 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आई हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने AI-केंद्रित इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अगले सात वर्षों में 110 अरब डॉलर निवेश करने का संकल्प जताया, जबकि अडानी एंटरप्राइजेज ने 2035 तक 100 अरब डॉलर निवेश की योजना घोषित की। इसके अलावा, टाटा ग्रुप ने AI-रेडी डेटा सेंटर को स्केल करने के लिए ओपनएआई के साथ साझेदारी की घोषणा की, जो भारत में AI इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
ट्रांसअटलांटिक व्यापार में हो रहे बदलाव से भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों में हो रहा पुनर्संतुलन वैश्विक कारोबार की रणनीतियों को तेजी से प्रभावित कर रहा है, और इसका सबसे बड़ा लाभ भारत को मिल सकता है, खासकर सूक्ष्म और मध्यम उद्यम क्षेत्र (SME) में। विश्लेषकों का मानना है कि बदलता ट्रांसअटलांटिक व्यापार ढांचा वैश्विक सप्लाई चेन और निर्यात बाजारों के लिए नए अवसर पैदा कर रहा है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच हुई राजनीतिक व्यापार समझ, जिसे आम तौर पर टर्नबेरी फ्रेमवर्क कहा जा रहा है, धीरे-धीरे एक दो-स्तरीय ट्रांसअटलांटिक व्यापार वातावरण बना रही है। नीति विश्लेषक प्रसून शर्मा के अनुसार, यह ढांचा बड़े और छोटे कारोबारों के लिए अलग-अलग प्रतिस्पर्धी परिस्थितियां तैयार कर रहा है।
उन्होंने कहा कि टर्नबेरी फ्रेमवर्क प्रभावी रूप से दो-स्तरीय ट्रांसअटलांटिक व्यापार वातावरण बना रहा है। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां उत्पादन का स्थानीयकरण कर सकती हैं, टैक्स और अनुपालन संरचनाओं को अनुकूलित कर सकती हैं और नियामकीय छूट हासिल करने के लिए लॉबिंग भी कर सकती हैं, जबकि छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए तय अनुपालन लागत इतनी अधिक होती है कि वह कई बार उनके पूरे अमेरिकी मुनाफे से भी ज्यादा हो जाती है, जिससे यह बाजार आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हो जाता है।