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Byju's: अर्श से फर्श पर कैसे आई 'रविंद्रन की बायजू'? मूल्यांकन 22 अरब डॉलर से गिरकर शून्य हुआ, समझें सबकुछ

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Wed, 27 May 2026 05:40 PM IST
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सार

सिंगापुर में छह महीने की सजा की खबरों के बीच बायजू रविंद्रन के उत्थान और पतन की पूरी कहानी यहां पढ़ें। क्या हैं 1.2 अरब डॉलर के लोन का विवाद और स्टार्टअप जगत के लिए इसके सबक क्या हैं?

From $22 Billion to Zero: The Complete Q&A Explainer of Byju's Spectacular Collapse
बायजू का पतन - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

एक वक्त था जब बायजू को भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम का सबसे चमकता सितारा और सफलता की गारंटी माना जाता था। कंपनी के संस्थापक रविंद्रन बायजू देश के स्टार्टअप कल्चर के पोस्टर ब्वॉय थे। लेकिन आज यह कंपनी दिवालिया हो चुकी है और इसके संस्थापक भारी कानूनी विवादों में घिरे हैं। खबर है कि सिंगापुर की एक अदालत ने अवमानना से जुड़े एक मामले में उन्हें छह महीने की सजा सुनाई है।


 
आखिर एक छोटे से क्लासरूम से शुरू होकर 22 अरब डॉलर तक पहुंचने वाली इस कंपनी और इसके मुखिया का यह हश्र कैसे हुआ? आइए आसान सवाल-जवाब के जरिए इस पूरे मामले को समझते हैं।

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सवाल: बायजू और उसके संस्थापक की मौजूदा स्थिति क्या है?

जवाब: कभी 22 अरब डॉलर की भारी-भरकम वैल्यूएशन वाली यह कंपनी आज पूरी तरह से दिवालिया हो चुकी है। हालात इतने खराब हैं कि कंपनी के संस्थापक बायजू रवींद्रन ने खुद एक मौके पर स्वीकार किया कि अब कंपनी की वैल्यूएशन 'जीरो' यानी शून्य हो गई है। इसके अलावा, संपत्ति का खुलासा न करने से जुड़े अदालत की अवमानना के एक मामले में सिंगापुर की अदालत ने रवींद्रन को छह महीने की जेल की सजा भी सुनाई है।

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सवाल: एक शिक्षक से अरबपति बनने तक बायजू रवींद्रन का सफर कैसे शुरू हुआ?

जवाब: केरल के अझीकोड में जन्मे रवींद्रन के माता-पिता दोनों शिक्षक थे। वे एक शिपिंग कंपनी में इंजीनियर के तौर पर काम करते थे और खाली समय में अपने दोस्तों को कैट (सीएटी) परीक्षा की तैयारी कराते थे। गणित की मुश्किल पहेलियों को चुटकियों में सुलझाने की उनकी कला इतनी मशहूर हुई कि जल्द ही उनके क्लासरूम स्टेडियम में बदल गए। इसी लोकप्रियता को भुनाते हुए साल 2015 में उन्होंने बायजू लर्निंग एप लॉन्च किया और जल्द ही यह देश भर में मशहूर हो गया।


सवाल: कंपनी ने अचानक इतनी बड़ी सफलता कैसे हासिल की?

जवाब: कंपनी की असली उड़ान कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुई। जब स्कूल अचानक बंद हुए, तो माता-पिता परेशान हो गए और ऑनलाइन पढ़ाई ही एकमात्र विकल्प बचा। इस दौरान कंपनी के यूजर्स तेजी से बढ़े और दुनियाभर के निवेशकों ने बिना सोचे-समझे बायजू में जमकर पैसा लगाया। इस भारी फंडिंग के दम पर कंपनी ने 'आकाश एजुकेशनल सर्विसेज', 'व्हाइटहैट जूनियर', और 'ग्रेट लर्निंग' जैसी कई कंपनियों को खरीदा और फीफा वर्ल्ड कप से लेकर क्रिकेट टीम तक को स्पॉन्सर किया।

सवाल: फिर इतनी बड़ी कंपनी के पतन की शुरुआत कहां से हुई?

जवाब: पतन की सबसे बड़ी वजह यह गलतफहमी थी कि महामारी के दौरान जो ग्रोथ हो रही है, वह हमेशा चलेगी। जैसे ही दुनिया खुली और स्कूल दोबारा शुरू हुए, ऑनलाइन पढ़ाई की मांग अचानक घट गई। इसके साथ ही, कंपनी की आक्रामक सेल्स रणनीति ने इसकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया। माता-पिता पर महंगे सब्सक्रिप्शन खरीदने का भारी दबाव बनाया गया और डर का माहौल बनाकर कई परिवारों को ऐसे ईएमआई या लोन के जाल में फंसाया गया जिसे चुकाना उनके लिए मुश्किल था। शिक्षा के क्षेत्र में भरोसा सबसे बड़ी चीज होती है, और जब यह भरोसा टूटा, तो कंपनी का पतन तेजी से होने लगा।

सवाल: इस बीच वित्तीय और कानूनी विवादों ने क्या भूमिका निभाई?

जवाब: जब कंपनी का खर्च उसकी कमाई से कहीं ज्यादा हो गया, तो आंतरिक हालात बिगड़ने लगे। वित्तीय नतीजे समय पर जमा नहीं किए गए और इसी बीच कंपनी के ऑडिटर डेलॉयट और कई बोर्ड सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सबसे बड़ा संकट तब खड़ा हुआ जब कंपनी ने 1.2 अरब डॉलर का विदेशी लोन लिया। विदेशी कर्जदाताओं ने आरोप लगाया कि बायजू ने करीब 53.3 करोड़ डॉलर की रकम को जटिल तरीकों से विदेशी खातों में ट्रांसफर कर दिया है। इसके बाद अमेरिका से लेकर भारत तक मुकदमों की झड़ी लग गई।

सवाल: बायजू ने दूसरी कंपनियों को खरीदने की जो होड़ लगाई थी, क्या उससे कंपनी को कोई फायदा हुआ?

जवाब: शुरुआत में यह रणनीति बहुत शानदार और आक्रामक लगी, लेकिन असल में इसने कंपनी के कामकाज को बुरी तरह उलझा दिया। महामारी के दौरान मिले अपार पैसे के दम पर बायजू ने 'आकाश एजुकेशनल सर्विसेज', 'व्हाइटहैट जूनियर' और 'ग्रेट लर्निंग' जैसी कई कंपनियों को ताबड़तोड़ तरीके से खरीदा। कंपनी का सपना हर उम्र के लिए एक ग्लोबल एजुकेशन सिस्टम बनाने का था, लेकिन अलग-अलग देशों और श्रेणियों के इन व्यवसायों को एक साथ जोड़ना और चलाना बेहद मुश्किल साबित हुआ। कंपनी के पास इतने बड़े कारोबार को एक साथ संभालने के लिए जरूरी अनुशासन की कमी थी। नतीजा यह हुआ कि लागत बेतहाशा बढ़ती गई, अंदरूनी जटिलताएं बढ़ गईं और फैसले लेने की प्रक्रिया बेहद धीमी और अव्यवस्थित हो गई।

सवाल: क्या इस पूरी बर्बादी के लिए सिर्फ संस्थापक बायजू रवींद्रन जिम्मेदार हैं या बड़े निवेशकों की भी इसमें कोई भूमिका है?

जवाब: इस पूरी कहानी को केवल एक अति-महत्वाकांक्षी संस्थापक की विफलता के रूप में देखना गलत होगा, क्योंकि इस संकट को पैदा करने में बड़े वैश्विक निवेशकों की भी बराबर की हिस्सेदारी है। कोरोना काल के दौरान इन निवेशकों ने ही स्टार्टअप्स पर बहुत तेजी से विस्तार करने का भारी दबाव बनाया था। उस दौर में अंधी दौड़ और भारी खर्च को सफलता का पैमाना माना जाता था और मुनाफा कमाने को पुराने जमाने की सोच समझा जाता था। जिन निवेशकों ने बाद में बायजू के कामकाज और अनुशासन की आलोचना की, उन्हीं लोगों ने कभी कंपनी को तेजी से आगे बढ़ने और खूब पैसा बहाने के लिए सराहा था था। आसान शब्दों में कहें तो, बड़े निवेशकों की ओर से बनाए गए मुनाफे के इसी मायाजाल में बायजू फंसता चला गया और अंततः तंगहाल हो गया।

सवाल: क्या इस पूरी घटना से स्टार्टअप जगत के लिए कोई सबक हैं?

जवाब: बायजू का पतन कई अहम सबक देता है। पहला यह कि कागजी वैल्यूएशन एक छलावा हो सकती है और व्यापार का टिकाऊ होना ज्यादा जरूरी है। दूसरा, विकास की अंधी दौड़ में वित्तीय अनुशासन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। यह कंपनी एक रात में तबाह नहीं हुई, बल्कि बहुत ज्यादा कर्ज, जरूरत से ज्यादा विस्तार और अत्यधिक आत्मविश्वास इसे धीरे-धीरे पूरी तरह ले डूबा।

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