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भारत ने बदली कच्चे तेल की रणनीति: प्रतिबंधों के बीच में सऊदी अरब को मिला फायदा, रूस से क्रूड फ्लो हुआ कम
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sun, 22 Feb 2026 01:19 PM IST
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सार
India Oil Strategy 2026: भारत ने कच्चे तेल आयात में संतुलित बदलाव शुरू किया है। रूस से आयात में प्रतिबंधों के कारण कमी आई है, जबकि सऊदी अरब से आपूर्ति बढ़ी है। फरवरी में सऊदी भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लागत थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन भारत भू-राजनीतिक संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर रणनीति बना रहा है।
भारत में रूसी तेल आयात में आई कमी
- फोटो : Adobestock
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विस्तार
वैश्विक प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबाव के बीच भारत ने कच्चे तेल आयात की अपनी रणनीति में संतुलित बदलाव शुरू किया है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि सऊदी अरब फिर से भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहा है, जबकि रूस से आने वाला तेल घटा है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है ताकि ऊर्जा सुरक्षा बनी रहे और रिफाइनरियों का काम प्रभावित न हो।
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1 से 18 फरवरी के बीच भारत का कुल कच्चा तेल आयात औसतन 48.5 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो जनवरी के 52.5 लाख बैरल प्रतिदिन से करीब 8 प्रतिशत कम है। जहाजों के आंकड़ों के अनुसार रूस से आयात दिसंबर 2025 में 12.8 लाख बैरल प्रतिदिन था। यह जनवरी में घटकर 12.2 लाख और फरवरी की शुरुआत में लगभग 10.9 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मार्च में यह 8 से 10 लाख बैरल प्रतिदिन के बीच रह सकता है।
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प्रतिबंधों का सीधा असर
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी। एक समय रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया था और कुल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा दे रहा था। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ के नए प्रतिबंधों के कारण अब रूसी तेल पर दबाव बढ़ गया है। भुगतान, शिपिंग और बीमा से जुड़ी दिक्कतों ने भी प्रवाह को प्रभावित किया है।
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सऊदी की मजबूत वापसी
रूस से आयात घटने के बीच सऊदी अरब से आपूर्ति बढ़ी है। फरवरी में सऊदी से आयात 10 से 11 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है, जो नवंबर 2019 के बाद का उच्च स्तर है। मौजूदा रुझान के अनुसार फरवरी में सऊदी भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन सकता है। इसके बाद रूस और इराक का स्थान रहेगा।
लागत और विकल्प की चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी तेल कम होने से औसत लागत 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है। वेनेजुएला से सीमित मात्रा में सस्ता तेल खरीदकर कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन वह रूस की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता। उत्पादन और लॉजिस्टिक सीमाओं के कारण वेनेजुएला की आपूर्ति सीमित है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत पूरी तरह रूस से दूरी नहीं बना रहा है, बल्कि संतुलन बना रहा है। घरेलू ईंधन आपूर्ति और रिफाइनरी संचालन को ध्यान में रखते हुए रूस से न्यूनतम आवश्यक आयात जारी रह सकता है। जब तक भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अंतिम रूप नहीं ले लेता, तब तक यह संतुलित नीति जारी रहने की संभावना है। अब भारत के लिए कीमत के साथ-साथ भू-राजनीतिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।
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