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West Asia Conflict: भारत पर जल्द दिख सकता है वैश्विक तनाव का असर, विकास दर अनुमान में एक फीसदी की कटौती संभव
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 01 Apr 2026 04:43 AM IST
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सार
एशिया के देशों का पश्चिम से सीधा व्यापार भले कम हो, लेकिन वे ऊर्जा आयात और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर होने के कारण ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। रेटिंग एजेंसियों ने खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का जिक्र किया है, जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और गैस की सप्लाई गुजरती है। इसका बड़ा हिस्सा एशिया तक पहुंचता है।
पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत पर पड़ेगा असर
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
पश्चिम एशिया संघर्ष के आगामी वित्त वर्ष तक जारी रहने पर भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में करीब एक फीसदी तक कमी आ सकती है, जबकि खुदरा महंगाई में लगभग 1.5 फीसदी बढ़त हो सकती है।
ईवाई इकोनॉमी वॉच रिपोर्ट के अनुसार कपड़ा, पेंट, रसायन, उर्वरक, सीमेंट व टायर जैसे कई क्षेत्र सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। इन क्षेत्रों में रोजगार या आय में किसी भी कमी से मांग पर और दबाव पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी आयात करता है, इसलिए वह ऐसे बाहरी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील है।
घट सकती है भारत की जीडीपी वृद्धि
ईवाई ने फरवरी की अपनी रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वृद्धि 6.8 से 7.2 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। इससे पहले आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने अनुमान लगाया था, भारत की जीडीपी वृद्धि घटकर 6.1 फीसदी रह सकती है।
बढ़ सकती है मंहगाई
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि खुदरा महंगाई लगभग 1.5 फीसदी बढ़कर अपने मूल अनुमान सात फीसदी से ऊपर जा सकती है। इसकी वजह है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति का संकट। युद्ध ने कच्चे तेल और ऊर्जा बाजारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इससे तेल की घरेलू आपूर्ति और भंडारण पर असर पड़ा है। संघर्ष जल्दी समाप्त हो जाने पर भी देश में स्थिति सामान्य होने में कुछ महीनों का समय लग सकता है।
रुपये में गिरावट दुनिया की अन्य मुद्राओं जैसी : एसबीआई
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारतीय रुपये में हालिया कमजोरी देखी गई, लेकिन एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट असामान्य नहीं है। ये अन्य वैश्विक मुद्राओं के समान ही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 27 फरवरी को पश्चिम एशिया में मौजूदा संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये में गिरावट आई है। यह गिरावट दुनिया की अन्य मुद्राओं जैसी है, इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं है। 27 फरवरी के बाद रुपये की गिरावट अन्य मुद्राओं के मुकाबले न सिर्फ संतुलित है, बल्कि उन मुद्राओं से बेहतर है जो पहले काफी मजबूत हुई थीं। एसबीआई के मुताबिक, रुपये की भी दबाव सहने की एक सीमा है। मौजूदा हालात में वैश्विक अनिश्चितता का असर सभी देशों की मुद्राओं पर पड़ा है। जो मुद्राएं पहले मजबूत हुई थीं, उनमें अब ज्यादा गिरावट देखी जा रही है।
2013 जैसी स्थिति नहीं
मौजूदा हालात 2013 जैसे नहीं हैं, जब रुपये में भारी उतार-चढ़ाव था और भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार संभालने के लिए खास कदम उठाने पड़े थे। इस बार विदेशी कर्ज जुटाने जैसे विकल्प भी खज्यादा प्रभावी नहीं माने जा रहे, क्योंकि विकसित देशों में खुद ब्याज दरों का संतुलन बिगड़ा हुआ है।
भारत की स्थिति मजबूत
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ईवाई इकोनॉमी वॉच रिपोर्ट के अनुसार कपड़ा, पेंट, रसायन, उर्वरक, सीमेंट व टायर जैसे कई क्षेत्र सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। इन क्षेत्रों में रोजगार या आय में किसी भी कमी से मांग पर और दबाव पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी आयात करता है, इसलिए वह ऐसे बाहरी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील है।
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घट सकती है भारत की जीडीपी वृद्धि
ईवाई ने फरवरी की अपनी रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वृद्धि 6.8 से 7.2 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। इससे पहले आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने अनुमान लगाया था, भारत की जीडीपी वृद्धि घटकर 6.1 फीसदी रह सकती है।
बढ़ सकती है मंहगाई
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि खुदरा महंगाई लगभग 1.5 फीसदी बढ़कर अपने मूल अनुमान सात फीसदी से ऊपर जा सकती है। इसकी वजह है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति का संकट। युद्ध ने कच्चे तेल और ऊर्जा बाजारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इससे तेल की घरेलू आपूर्ति और भंडारण पर असर पड़ा है। संघर्ष जल्दी समाप्त हो जाने पर भी देश में स्थिति सामान्य होने में कुछ महीनों का समय लग सकता है।
रुपये में गिरावट दुनिया की अन्य मुद्राओं जैसी : एसबीआई
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारतीय रुपये में हालिया कमजोरी देखी गई, लेकिन एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट असामान्य नहीं है। ये अन्य वैश्विक मुद्राओं के समान ही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 27 फरवरी को पश्चिम एशिया में मौजूदा संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये में गिरावट आई है। यह गिरावट दुनिया की अन्य मुद्राओं जैसी है, इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं है। 27 फरवरी के बाद रुपये की गिरावट अन्य मुद्राओं के मुकाबले न सिर्फ संतुलित है, बल्कि उन मुद्राओं से बेहतर है जो पहले काफी मजबूत हुई थीं। एसबीआई के मुताबिक, रुपये की भी दबाव सहने की एक सीमा है। मौजूदा हालात में वैश्विक अनिश्चितता का असर सभी देशों की मुद्राओं पर पड़ा है। जो मुद्राएं पहले मजबूत हुई थीं, उनमें अब ज्यादा गिरावट देखी जा रही है।
2013 जैसी स्थिति नहीं
मौजूदा हालात 2013 जैसे नहीं हैं, जब रुपये में भारी उतार-चढ़ाव था और भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार संभालने के लिए खास कदम उठाने पड़े थे। इस बार विदेशी कर्ज जुटाने जैसे विकल्प भी खज्यादा प्रभावी नहीं माने जा रहे, क्योंकि विकसित देशों में खुद ब्याज दरों का संतुलन बिगड़ा हुआ है।
भारत की स्थिति मजबूत
- देश के पास 700 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार है।
- यह भंडार 10 महीने से ज्यादा के आयात को कवर करता है।
- अल्पावधि कर्ज कुल भंडार का 20 फीसदी से भी कम है।
- इससे रुपये पर सट्टेबाजी के दबाव को कम करने में मदद मिल रही है।
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