डायरेक्ट सेलिंग कारोबार: ₹23,522 करोड़ का कारोबार, 91 लाख लोगों को मिला रोजगार, 47% महिलाएं; जानें आगे क्या
देश का डायरेक्ट सेलिंग उद्योग वित्त वर्ष 2025 में 7% की वार्षिक वृद्धि के साथ ₹23,522 करोड़ पर पहुंच गया है। 91 लाख एक्टिव सेल्लर्स और 43 लाख महिलाओं की भागीदारी वाले इस सेक्टर के बारे में पूरी रिपोर्ट पढ़ें।
विस्तार
भारतीय डायरेक्ट सेलिंग (प्रत्यक्ष बिक्री) उद्योग ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। 'एसोसिएशन ऑफ डायरेक्ट सेलिंग एंटिटीज ऑफ इंडिया' (एडीएसईआई) और रिसर्च पार्टनर कांतार की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश का डायरेक्ट सेलिंग बाजार सात प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) के साथ बढ़कर 23,522 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। स्वरोजगार और अतिरिक्त आय के एक प्रमुख साधन के रूप में उभरते हुए इस क्षेत्र ने वैश्विक स्तर पर भारत को 11वें स्थान पर ला खड़ा किया है। उद्योग के तेजी से होते विस्तार को देखते हुए अगले वित्तीय वर्ष तक इसके 25,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार करने का अनुमान लगाया गया है।
भारतीय डायरेक्ट सेलिंग उद्योग की मौजूदा स्थिति और विकास दर क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 में समाप्त वित्तीय वर्ष के दौरान डायरेक्ट सेलिंग उद्योग ने न केवल वित्तीय मजबूती दिखाई है, बल्कि सूक्ष्म-उद्यमिता को भी बढ़ावा दिया है।
- बाजार का आकार और लक्ष्य: उद्योग का कुल कारोबार 23,522 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है, जो अगले वित्त वर्ष तक 25,000 करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।
- वैश्विक रैंकिंग: भारत दुनिया के 15 सबसे बड़े डायरेक्ट सेलिंग बाजारों में 11वें स्थान पर काबिज है।
- सक्रिय विक्रेताओं की संख्या: इस क्षेत्र में 91 लाख सक्रिय डायरेक्ट सेल्लर्स जुड़े हुए हैं।
- आयु वर्ग और आय: कुल सक्रिय विक्रेताओं में से 69 प्रतिशत लोग 25 से 44 वर्ष के आयु वर्ग के हैं। इसके अलावा, 32 प्रतिशत से अधिक विक्रेताओं ने इस गतिविधि से लगातार हर महीने आय प्राप्त होने की बात कही है।
महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन में इस सेक्टर की क्या भूमिका है?
डायरेक्ट सेलिंग उद्योग ने देश में बिना बड़े पूंजी निवेश के आत्मनिर्भरता और महिला-नेतृत्व वाले विकास को नई दिशा दी है।
- महिलाओं की हिस्सेदारी: कुल 91 लाख विक्रेताओं में से करीब 47 प्रतिशत (लगभग 43 लाख) महिलाएं हैं।
- सामाजिक-आर्थिक समावेश: एडीएसईआई के संरक्षक गौतम बाली के अनुसार, लगभग दो-तिहाई (2/3) विक्रेताओं के लिए डायरेक्ट सेलिंग ही आजीविका का प्राथमिक साधन बन चुका है। छोटे शहरों और गांवों की गृहिणियां स्वतंत्र आय अर्जित कर बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घरेलू बचत में योगदान दे रही हैं।
- एडीएसईआई का दृष्टिकोण: एडीएसईआई के अध्यक्ष संजीव कुमार ने कहा कि यह उद्योग पिछले एक दशक में सरकार के स्वरोजगार, कौशल विकास और महिला-नीत विकास के दृष्टिकोण के पूरी तरह अनुकूल रहा है।
किन प्रॉडक्ट्स की मांग सबसे ज्यादा है और किन क्षेत्रों का दबदबा है?
दैनिक उपभोग की वस्तुओं और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े उत्पादों ने इस पूरे कारोबार की रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया है।
- उत्पाद श्रेणियों का वर्चस्व: वेलनेस (स्वास्थ्य), पर्सनल केयर और कॉस्मेटिक्स की कुल बिक्री में 86 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी रही है, जो भारतीय परिवारों में इन वस्तुओं की नियमित खपत को दर्शाती है।
- क्षेत्रीय बाजार भागीदारी: देश भर में उत्तरी भारत 26.8 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा प्रादेशिक बाजार रहा है। इसके बाद 24.5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पश्चिमी भारत का स्थान आता है।
इस सेक्टर के सामने क्या मुख्य चुनौतियां हैं और आगे की राह क्या है?
उद्योग लगातार वृद्धि दर्ज कर रहा है, लेकिन विक्रेताओं को लंबे समय तक रोके रखना एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।
- नियामक ढांचा: 'उपभोक्ता संरक्षण (डायरेक्ट सेलिंग) नियम, 2021' ने इस उद्योग को औपचारिक रूप देने और परिचालन मानकों को पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- रिटेंशन और ट्रेनिंग पर जोर: गौतम बाली के अनुसार, कई विक्रेता व्यवसाय स्थापित होने से पहले ही छोड़ देते हैं। इसके समाधान के लिए बेहतर प्रशिक्षण, मजबूत गवर्नेंस और उपभोक्ताओं के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता जरूरी है।
डायरेक्ट सेलिंग उद्योग न केवल 25,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा छूने की ओर अग्रसर है, बल्कि देश में लोकतांत्रिक उद्यमशीलता का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। 91 लाख से अधिक लोगों की आजीविका और 43 लाख महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ा यह क्षेत्र पारदर्शी नियमों और बेहतर कौशल प्रशिक्षण के बल पर भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को और मजबूत करेगा।