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Hindi News ›   Business ›   Business Diary ›   India’s New Economic Barometer: MoSPI to Launch Index of Services Production (ISP) on July 14 to Track Service

ISP: 14 जुलाई को लॉन्च होगा सर्विसेज प्रोडक्शन इंडेक्स, जानें कैसे नए आर्थिक पैमाने से बदलेगी देश की तस्वीर

Mon, 13 Jul 2026 02:24 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Mon, 13 Jul 2026 02:24 PM IST
सार

भारत में सर्विस सेक्टर की मासिक रफ्तार मापने के लिए MoSPI 14 जुलाई को नया 'इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन' (आईएसपी) लॉन्च कर रहा है। जानें कैसे यह सूचकांक अर्थव्यवस्था का पूरा परिदृश्य बदल देगा और नीति निर्माताओं के कितने काम आएगा; पूरी रिपोर्ट विस्तार से पढ़ें।

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India’s New Economic Barometer: MoSPI to Launch Index of Services Production (ISP) on July 14 to Track Service
भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : amarujala

विस्तार

भारतीय अर्थव्यवस्था में आधे से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) की हर महीने की धड़कन को मापने के लिए सरकार एक नया और बेहद सटीक पैमाना लाने जा रही है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) 14 जुलाई को देश का पहला 'इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन' (ISP) यानी सेवा उत्पादन सूचकांक जारी करने के लिए पूरी तरह तैयार है। जानकार इसे एक हाई फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर के तौर पर देख रहे हैं। इसका नया आधार वर्ष 2024-25 तय किया गया है। यह कदम नीति निर्माताओं, निवेशकों और कारोबारियों को अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े हिस्से की तात्कालिक और सटीक स्थिति समझने में मदद करेगा। 

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क्या है नया इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक हमारे पास देश की मासिक औद्योगिक गतिविधि को मापने के लिए 'इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन' (आईआईपी) तो था, लेकिन सेवा क्षेत्र के लिए ऐसा कोई मासिक संकेतक उपलब्ध नहीं था। जबकि भारत की आर्थिक वृद्धि का मुख्य इंजन अब सेवा क्षेत्र बन चुका है और यह देश के सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में आधे से अधिक का योगदान देता है। अर्थशास्त्रियों का मानना था कि एक मजबूत मासिक सेवा संकेतक न होने से अर्थव्यवस्था के वास्तविक रुझानों को समय पर ट्रैक करना मुश्किल होता था। नया आईएसपी (आईएसपी) इसी कमी को दूर करेगा और औद्योगिक सूचकांक (आईआईपी) के पूरक के रूप में काम करेगा।

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आईएसपी में कौन-से सेक्टर्स शामिल होंगे और क्या बाहर रहेगा?

यह सूचकांक बाजार आधारित सेवाओं के एक बड़े हिस्से को कवर करेगा। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित सेक्टर्स को शामिल किया जा रहा है:

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  • व्यापार और परिवहन
  • दूरसंचार 
  • आवास और मनोरंजन 
  • वित्तीय गतिविधियां 
  • रियल एस्टेट

ये क्षेत्र मिलकर कुल सेवा क्षेत्र के जीवीए का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं, जो इसे बेहद मजबूत संकेतक बनाता है। हालांकि, पहले चरण में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं को डेटासेट विकसित होने की प्रक्रिया में होने के कारण इससे बाहर रखा गया है। इनके डेटा के लिए 'एनुअल सर्वे ऑफ इनकॉर्पोरेटेड सर्विसेज सेक्टर एंटरप्राइजेज' (एएसआईएसएसई) के लागू होने का इंतजार किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, अनौपचारिक सेवा अर्थव्यवस्था और गैर-बाजार सेवाओं जैसे सार्वजनिक प्रशासन, रक्षा, सामाजिक कार्य और केंद्रीय बैंकिंग गतिविधियों को भी प्रशासनिक डेटा सीमाओं के कारण अभी बाहर रखा गया है।

आखिर कहां से आएगा इस बैरोमीटर के लिए डेटा?

इस सूचकांक को पारंपरिक और कछुआ गति से चलने वाले सर्वेक्षणों के बजाय पूरी तरह डिजिटल और प्रशासनिक डेटाबेस पर आधारित बनाया गया है ताकि आंकड़े जल्दी मिल सकें। सूचना का मुख्य जरिया 'गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स नेटवर्क' (जीएसटीएन) यानी जीएसटी डेटा होगा। इसके अलावा रेलवे, नागरिक उड्डयन, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्रों से परिचालन संबंधी लाइव डेटा भी इसमें जोड़ा जाएगा। इस आधुनिक दृष्टिकोण से देरी कम होगी और आंकड़ों की विश्वसनीयता काफी बढ़ जाएगी।

विशेषज्ञों की इस पर क्या सलाह है और आगे क्या बदलेगा?

नीति आयोग की फेलो देबजानी घोष की अध्यक्षता वाली एक विशेष समिति ने सिफारिश की है कि इस सूचकांक को शुरुआती तौर पर ट्रायल बेसिस (प्रायोगिक तौर पर) पर विस्तृत उप-क्षेत्रीय आंकड़ों के साथ जारी किया जाए, ताकि उपयोगकर्ताओं से फीडबैक लेकर इसके ढांचे को और मजबूत किया जा सके। समिति ने संदर्भ महीने की समाप्ति के करीब 60 दिनों के भीतर इसे जारी करने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा, घोष समिति भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को मापने के लिए भी एक नई कार्यप्रणाली तैयार कर रही है, जिससे भविष्य में तकनीकी सेवाओं के सही योगदान का सटीक आकलन हो सकेगा।

यह नया आर्थिक पैमाना भारत के सांख्यिकीय तंत्र को आधुनिक बनाने और राष्ट्रीय खातों को सुधारने की सरकारी कोशिशों का हिस्सा है। इसके आने से नीति निर्माताओं को देश की मासिक आर्थिक सेहत की अधिक संतुलित और व्यापक तस्वीर मिल सकेगी। इससे न केवल सरकारी नीतियां अधिक प्रभावी बनेंगी, बल्कि व्यापारिक फैसले और बाजार में निवेश की दिशा भी अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

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