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GTRI: क्यूसीओ टेस्टिंग के महंगे खर्च से एमएसएमई पर दबाव, जीटीआरआई ने सरकार से की फीस की सीमा तय करने की मांग

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Tue, 14 Apr 2026 05:04 PM IST
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सार

क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) और बीआईएस सर्टिफिकेशन के बढ़ते खर्च से एमएसएमई आयातकों और मेक इन इंडिया अभियान पर असर पड़ रहा है। क्या है पूरा मामला विस्तार से जानने के लिए पढ़ें। 

Quality Control Order BIS Certification MSME Importers Make in India GTRI
एमएसएमई सेक्टर को बजट से उम्मीदें - फोटो : ANI
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विस्तार

भारत में उत्पादों की गुणवत्ता और उपभोक्ता सुरक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) के नियम अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए एक बड़ी चुनौती बन रहे हैं। प्रमुख थिंक टैंक 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (जीटीआरआई) ने मंगलवार को सरकार से आग्रह किया है कि रूटीन औद्योगिक उत्पादों की टेस्टिंग के लिए ली जाने वाली फीस की एक अधिकतम सीमा तय की जाए। 

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छोटे आयातकों के कारोबार से बाहर होने का खतरा

जीटीआरआई के मुताबिक, क्वालिटी कंट्रोल नियमों के तेजी से विस्तार के कारण टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव पड़ रहा है, जिससे एमएसएमई के लिए अनुपालन संबंधी बड़ी बाधाएं पैदा हो गई हैं। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने चेतावनी दी है कि भारत के बढ़ते क्वालिटी कंट्रोल ढांचे के कारण टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की लागत इतनी अधिक हो गई है कि कई एमएसएमई आयातक कारोबार से बाहर हो सकते हैं। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि अगर ऐसा होता है, तो बाजार पर पूरी तरह से बड़े आयातकों का दबदबा कायम हो जाएगा।

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15-20 लाख रुपये का शुरुआती खर्च बना चुनौती

यह सारा खर्च ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) की 'फॉरेन मैन्युफैक्चरर्स सर्टिफिकेशन स्कीम' (एमएफसीएस) के कारण उत्पन्न हो रहा है। इस नियम के तहत, विदेशी कंपनियों को भारत में सामान भेजने से पहले BIS सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य है। 

इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई कदम उठाने पड़ते हैं:

  • एक अधिकृत भारतीय प्रतिनिधि नियुक्त करना।
  • तकनीकी दस्तावेज जमा करना।
  • बीआईएस द्वारा विदेशी फैक्ट्री का निरीक्षण।
  • बीआईएस से मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में सैंपलिंग और टेस्टिंग कराना।

अजय श्रीवास्तव का कहना है कि बड़े आयातक अधिक मात्रा में सामान मंगाकर इस खर्च को आसानी से बांट लेते हैं। हालांकि, कम मात्रा में या विशेष उत्पाद मंगाने वाले छोटी कंपनियों के लिए 15 से 20 लाख रुपये का यह भारी-भरकम शुरुआती खर्च आयात को व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक बना देता है।

मेक इन इंडिया पहल पर पड़ सकता है नकारात्मक असर

इस भारी सर्टिफिकेशन लागत का असर केवल आयातकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की 'मेक इन इंडिया' पहल को भी नुकसान पहुंचा सकता है। अजय श्रीवास्तव के अनुसार, कई घरेलू निर्माता ऐसे विशेष इनपुट्स, कंपोनेंट्स और मशीनरी के आयात पर निर्भर हैं, जो फिलहाल भारत में जरूरी गुणवत्ता या बड़े पैमाने पर नहीं बनाए जाते हैं। ऐसे में महंगी टेस्टिंग का सीधा असर स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग की लागत पर पड़ेगा।

जीटीआरआई की ओर से क्या सुझाव दिए गए?

उद्योगों को राहत देने के लिए जीटीआरआई ने सरकार के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख सुझाव रखे हैं:

  • रूटीन औद्योगिक उत्पादों की टेस्टिंग फीस को कैप (निर्धारित) किया जाए।
  • केवल भारत ही नहीं, बल्कि मान्यता प्राप्त विदेशी प्रयोगशालाओं की टेस्टिंग रिपोर्ट को भी स्वीकार किया जाए।
  • अत्यधिक सैंपलिंग की जगह जोखिम-आधारित  टेस्टिंग के नियमों को अपनाया जाए।
  • कोई भी नया क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर लागू करने से पहले उसका उद्योगों पर पड़ने वाले प्रभाव का उचित मूल्यांकन किया जाए।

यदि सरकार सर्टिफिकेशन और टेस्टिंग की जटिलताओं और लागत को कम नहीं करती है, तो इसका सबसे अधिक खामियाजा देश के एमएसएमई सेक्टर को भुगतना पड़ सकता है।

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