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UAE: यूएई ने ओपेक और ओपेक प्लस छोड़ा; वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूचाल, जानिए ईरान युद्ध के बीच इसके क्या मायने

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Tue, 28 Apr 2026 06:19 PM IST
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सार

पश्चिम एशिया से एक बहुत जरूरी खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपीईसी और ओपीईएसी+ से बाहर होने का फैसला किया है। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।

UAE decided to quit OPEC and OPEC+ in major setback for oil producers' bloc
ओपेक+ - फोटो : ANI
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विस्तार

वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीति के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने मंगलवार को पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन 'ओपेक' और 'ओपेक प्लस' से बाहर निकलने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। ईरान युद्ध के कारण पहले से ही पैदा हुए ऐतिहासिक ऊर्जा संकट और अस्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच उठाया गया यह कदम ओपेक समूह और उसके अघोषित नेता सऊदी अरब के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। 

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ओपेक समूह पर असर और वैश्विक व्यापार की चुनौती

लंबे समय से ओपेक का प्रमुख सदस्य रहा यूएई अब इस संगठन का हिस्सा नहीं है। इस चौंकाने वाले फैसले से तेल निर्यातक देशों के इस समूह में अव्यवस्था पैदा होने और इसके कमजोर होने की आशंका काफी बढ़ गई है। ओपेक ने भू-राजनीतिक मुद्दों से लेकर उत्पादन कोटे तक के आंतरिक मतभेदों के बावजूद हमेशा एक एकजुटता दिखाने की कोशिश की है, लेकिन यूएई के ओपेक से बाहर निकलने से इस एकता पर संशय गहरा गया है। यह घटनाक्रम ऐसे नाजुक समय में हुआ है जब खाड़ी के तेल उत्पादक देश होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते अपने निर्यात को सुचारू रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। यह ईरान और ओमान के बीच एक संकरा समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) गुजरती है। जहाजों पर ईरान के लगातार हमलों और धमकियों के कारण इस अहम मार्ग से होने वाला व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

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अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक जीत

यूएई का ओपेक से बाहर निकलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत का है। राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से ओपेक पर तेल की कीमतें बढ़ाकर दुनिया भर के देशों का आर्थिक शोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने खाड़ी देशों के लिए अमेरिकी सैन्य समर्थन को भी सीधे तौर पर तेल की कीमतों से जोड़ दिया था। ट्रंप का स्पष्ट कहना था कि एक तरफ अमेरिका ओपेक सदस्यों की रक्षा करता है, वहीं दूसरी तरफ ये देश तेल की ऊंची कीमतें थोपकर अमेरिका और दुनिया का फायदा उठाते हैं। 

यूएई की नाराजगी और फैसले की असली वजह

पश्चिम एशिया में व्यापार का एक प्रमुख केंद्र और वाशिंगटन के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक होने के नाते यूएई अपने साथी अरब देशों से काफी नाराज है। यूएई का मानना है कि युद्ध के दौरान कई ईरानी हमलों से उसे बचाने के लिए अरब देशों ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इस नाराजगी को यूएई के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गर्गश ने सोमवार को 'गल्फ इन्फ्लुएंसर्स फोरम' में सार्वजनिक रूप से जाहिर भी किया था। उन्होंने ईरानी हमलों पर अरब और खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना की। अनवर गर्गश ने साफ किया कि खाड़ी सहयोग परिषद के देशों ने तार्किक रूप से एक-दूसरे का समर्थन जरूर किया है, लेकिन राजनीतिक और सैन्य मोर्चे पर उनका रुख ऐतिहासिक रूप से सबसे कमजोर रहा। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें अरब लीग से ऐसे कमजोर रुख की उम्मीद थी, लेकिन खाड़ी सहयोग परिषद से उन्हें ऐसी कोई अपेक्षा नहीं थी, जिसने उन्हें पूरी तरह से हैरान कर दिया है।

अब आगे क्या होगा?

यूएई के इस कदम ने न केवल पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक गहरे दरार को उजागर किया है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखला की स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यूएई की स्वतंत्र उत्पादन नीति कच्चे तेल की कीमतों को किस दिशा में ले जाती है और ओपेक समूह अपने वजूद और बाजार पर अपने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए अब क्या नई रणनीति अपनाता है।

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