बैंकिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव: 20 साल में 23 गुना बढ़ा बिना गारंटी वाला कर्ज, जानें सरकारी बैंकों का क्या हाल
SBI Report: भारतीय बैंकों में अनसिक्योर्ड लोन का आंकड़ा ₹46.9 लाख करोड़ पहुंच गया है। जानें क्यों बढ़ी रिस्क सेंसिटिविटी, सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी और आरबीआई की इस पर क्या है राय?
विस्तार
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले दो दशकों में ऋण वितरण के तौर-तरीकों में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिला है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, देश में असुरक्षित ऋण का आंकड़ा 46.9 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। बिना किसी गिरवी या कोलेटरल के दिए जाने वाले इन कर्जों में हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी ने बैंकिंग सिस्टम में जोखिम को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
दो दशकों में कितना बढ़ा असुरक्षित ऋण का आकार?
एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2005 में असुरक्षित ऋणों का कुल आकार मात्र दो लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 46.9 लाख करोड़ रुपये हो गया है। कुल बैंक ऋण में असुरक्षित लोन की हिस्सेदारी में भी भारी इजाफा हुआ है।
वित्त वर्ष 2005 में यह हिस्सेदारी 17.7 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 24.5 प्रतिशत हो गई है। रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि वित्त वर्ष 2019 के बाद से कुल ऋण में असुरक्षित लोन की हिस्सेदारी लगातार 20 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। चूंकि ये ऋण बिना किसी कोलेटरल के दिए जाते हैं, इसलिए इनकी बढ़ती संख्या बैंकिंग प्रणाली में संभावित क्रेडिट जोखिम बढ़ने के बारे में बताती है।
अलग-अलग बैंकों की क्या हिस्सेदारी?
आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि असुरक्षित ऋण बांटने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की भूमिका सबसे अहम रही है। वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार-
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक: कुल असुरक्षित ऋण में 53 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे हैं।
- निजी क्षेत्र के बैंक: इनका हिस्सा 38 प्रतिशत है।
- विदेशी बैंक: सात प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं।
- स्मॉल फाइनेंस बैंक: कुल असुरक्षित ऋण में 2 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
यह डेटा बैंकों के लेंडिंग पोर्टफोलियो में आए बदलाव की जानकारी देता है। इसमें सुरक्षित लोन के मुकाबले असुरक्षित लोन का विस्तार काफी तेजी से हुआ है।
युवा उधारकर्ताओं के बारे में रिपोर्ट में क्या कहा गया?
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी दिसंबर 2025 में जारी अपनी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (एफएसआर) में इस मुद्दे को उठाया था। केंद्रीय बैंक के अनुसार, फिनटेक लेंडर्स की लोन बुक में असुरक्षित ऋणों का हिस्सा 70 प्रतिशत से अधिक है।
चिंता की बात यह है कि फिनटेक द्वारा दिए गए इन कर्जों में से आधे से अधिक 35 वर्ष से कम आयु के उधारकर्ताओं को दिए गए हैं, जो युवा वर्ग के बीच बढ़ते कर्ज के जोखिम दिखाते हैं। हालांकि, RBI ने यह भी बताया कि बैंकों और एनबीएफसी में असुरक्षित बिजनेस लोन मुख्य रूप से उच्च गुणवत्ता वाले उधारकर्ताओं के पास हैं, जो एसेट क्वालिटी के लिहाज से अच्छी बात है।
एनपीए में गिरावट एक राहत का संकेत
असुरक्षित ऋणों में भारी उछाल के बावजूद, बैंकिंग सेक्टर के लिए एक सकारात्मक खबर यह है कि बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (एनपीए), जो 2018 में 11.46 प्रतिशत के शिखर पर था, 2025 में घटकर 2.31 प्रतिशत रह गया है।
एसबीआई की यह रिपोर्ट बताती है कि जहां एक ओर अनसिक्योर्ड लेंडिंग ने क्रेडिट ग्रोथ को रफ्तार दी है, वहीं दूसरी ओर कोलेटरल की कमी मध्यम अवधि में क्रेडिट क्वालिटी के लिए चिंता का विषय बन सकती है। गिरते एनपीए के बीच बढ़ता असुरक्षित कर्ज भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के लिए एक ऐसा संतुलन है, जिस पर नियामकों और बैंकों को कड़ी नजर रखनी होगी।