Air Defence: क्या हैं पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए? ₹15000 करोड़ खर्च कर इन्हें बनाने की हो रही तैयारी, जानें सबकुछ
भारत सरकार ने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान तैयार करने से जुड़ी एएमसीए परियोजना के लिए 15,000 करोड़ रुपये का टेंडर निजी कंपनियों को जारी किया है। जानिए एचएएल को छोड़कर टाटा, एलएंडटी व भारत फोर्ज पर भरोसा जताने की पूरी कहानी।
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भारत के रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रक्षा मंत्रालय ने देश के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी स्वदेशी एयरोस्पेस प्रोग्राम यानी 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (एएमसीए) को रफ्तार देने के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर रुख किया है। इस प्रोजेक्ट के लिए सरकारी एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को किनारे करते हुए देश की दिग्गज प्राइवेट कंपनियों को आमंत्रित किया गया है।
आइए आसान सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं इस पूरे मेगा-प्रोजेक्ट की हर अहम बात:
सवाल: एएमसीए प्रोजेक्ट क्या है और यह वायुसेना के लिए इतना अहम क्यों है?
जवाब: एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बेट एयरक्राफ्ट) भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ (रडार की पकड़ में न आने वाला) फाइटर जेट तैयार करने से जुड़ी परियोजना है। यह एक दो इंजन वाला मल्टी-रोल लड़ाकू विमान होगा, जिसे गहरे हवाई हमलों और वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इन विमानों को तैयार करने का मुख्य उद्देश्य भविष्य के युद्धों में भारत को हवाई श्रेष्ठता दिलाना और चीन के J-20 जैसे अन्य पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का मुकाबला करना है।
सवाल: पांचवीं पीढ़ी के विमानों की क्या होती है खासियत?
जवाब: चौथी या 4.5वीं पीढ़ी विमानों से अलग पांचवीं पीढ़ी के विमान अपने विशेष कल-पुर्जों, डिजाइन और तकनीक के कारण बहुत अलग होते हैं। आइए इनके बारे में जानें।
1. अलग तरह की डिजाइन
- S-शेप के एयर इनटेक: पुराने विमानों के इंजनों के पंखे रडार पर बड़ी आसानी से पकड़ में आ जाते हैं। पांचवीं पीढ़ी के विमानों में इनटेक को 'S' आकार का बनाया जाता है ताकि इंजन के ब्लेड रडार की तरंगों से छिप सकें।
- रडार एब्जॉर्बेंट मटीरियल (आरएएम): पांचवीं पीढ़ी के विमानों की बाहरी परत पर विशेष कंपोजिट मटीरियल का लेप होता है जो दुश्मन के रडार की तरंगों को वापस टकराने के बजाय सोख लेता है। इससे इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (आरसीएस) बहुत कम हो जाता है और यह रडार पर एक छोटी चिड़िया जितना ही नजर आता है।
2. आंतरिक हथियार बे
- आमतौर पर चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों (जैसे सुखोई, मिराज या राफेल) में मिसाइलें और बम उनके पंखों के नीचे लटके होते हैं, जो रडार पर साफ दिखाई देते हैं और विमान की गति को भी धीमा करते हैं।
- पांचवीं पीढ़ी के विमानों में हथियारों को विमान के अंदर एक छिपे हुए चेंबर में रखा जाता है। जब विमान को मिसाइल दागनी होती है, केवल तभी इसके दरवाजे कुछ सेकंड के लिए खुलते हैं।
3. सुपरक्रूज क्षमता
- पुराने विमानों को सुपरसोनिक (ध्वनि से तेज) उड़ने के लिए 'आफ्टरबर्नर' का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो बहुत सारा ईंधन पीता है और विमान का हीट सिग्नेचर (तापमान) बढ़ा देता है जिससे इन्फ्रारेड मिसाइलें उसे आसानी से निशाना बना सकती हैं।
- एएमसीए के उन्नत जीई-एफ414 इंजन और इसका हल्का डिजाइन इसे बिना आफ्टरबर्नर के ही लंबे समय तक सुपरसोनिक स्पीड बनाए रखने की क्षमता देते हैं। इससे ईंधन बचता है और विमान की रेंज बढ़ती है।
4. उन्नत एवियोनिक्स और सेंसर फ्यूजन
- पुराने विमानों में पायलट को रडार, हथियार, और अन्य कम्युनिकेशन्स के लिए अलग-अलग स्क्रीन्स से डेटा समझकर खुद फैसले लेने पड़ते हैं।
- एएमसीए में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और एईएसए रडार का उपयोग होता है। सेंसर फ्यूजन की मदद से कंप्यूटर खुद सारे डेटा को प्रोसेस करता है और पायलट को युद्धक्षेत्र का एक ही स्क्रीन पर 360-डिग्री का सटीक नज़ारा देता है।
5. नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर
- यह विमान हवा में उड़ते हुए अन्य ड्रोन्स, लड़ाकू विमानों, सैटेलाइट और जमीनी रडार के साथ रीयल-टाइम डेटा शेयर कर सकता है। अगर एएमसीए खुद किसी टारगेट पर हमला नहीं कर रहा है, तो भी वह टारगेट की सटीक लोकेशन अपने पीछे उड़ रहे किसी अन्य विमान को भेज सकता है।
- पुरानी पीढ़ियों के विमानों (जैसे मिग-29, जगुआर) की रणनीति दुश्मन के इलाके में तेजी से घुसकर हवाई युद्ध करने की होती है, जिसके लिए उन्हें भारी हथियारों की जरूरत होती है। वहीं, पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए की रणनीति पहले देखो और पहले मारो की है। अपनी स्टील्थ क्षमता और आधुनिक सेंसर की मदद से यह दुश्मन के रडार और विमानों को उनके देखने से बहुत पहले ही ट्रैक कर सकता है और स्टैंड-ऑफ दूरी (सुरक्षित दूरी) से ही उन्हें तबाह कर सकता है।

सवाल: इन विमानों को तैयार करने की परियोजना का टेंडर किन्हें मिला है?
जवाब: रक्षा मंत्रालय ने एक बहुत बड़े नीतिगत बदलाव के तहत इस 15,000 करोड़ रुपये के प्रोटोटाइप टेंडर के लिए आवेदन तीन भारतीय निजी कंपनियों के कंसोर्टियम (समूह) से मांगे हैं। इन तीन दावेदारों में लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) शामिल है, जिसने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ साझेदारी की है; भारत फोर्ज, जिसने बीईएमएल के साथ हाथ मिलाया है; और तीसरी कंपनी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स है। सबसे खास बात यह है कि सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की बजाय सीधे तौर पर इन निजी कंपनियों पर यह बड़ा भरोसा जताया गया है।
इस फैसले की एक वजह यह भी है कि एचएएल अपने तेजस मार्क1ए जैसे भारी भरकम ऑर्डर समय पर पूरा नहीं कर सका। कंपनी को इसके बाद तेजस मार्क-2 भी बनाना है। यदि पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का प्रोजेक्ट एचएएल के पास ही रहता तो विमान की आपूर्ति 2035 से भी देरी का अंदेशा बना रहता। एचएएल का भले निगमीकरण कर दिया गया हो, पर वह प्रशासनिक लेटलतीफी से आजाद नहीं है। निजी कंपनियां सामान खरीदने में स्वतंत्र होंगी। इसलिए समय सीमा का पालन कर पाएंगी। एमका को निजी हाथों में सौंपने से आपूर्ति में लगने वाला वाला समय कम हो जाएगा।
सवाल: टेंडर जीतने वाली कंपनी को आगे क्या करना होगा?
जवाब: जो भी कंपनी यह टेंडर जीतेगी, उसे चयन के तीन महीने के भीतर एक नई कंपनी बनानी होगी। इस नई कंपनी का पूरा मालिकाना हक और नियंत्रण भारतीय कंपनियों के पास ही रहेगा और इसमें नियमों से बाहर विदेशी हिस्सेदारी रखने की सख्त मनाही होगी। यह नई कंपनी रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली 'एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी' (एडीए) के साथ मिलकर विमान के पांच प्रोटोटाइप तैयार करेगी।
सवाल: क्या टाटा के पास इस रेस में कोई खास बढ़त मौजूद है?
जवाब: हां, तीनों दावेदारों में से टाटा के पास विमान निर्माण की सुविधा स्थापित करने का पूर्व अनुभव है। टाटा ने एयरबस के साथ मिलकर गुजरात के वडोदरा में सी-295 सैन्य परिवहन विमान बनाने की मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी तैयार की है, जो उनके लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट हो सकता है।
सवाल: इन आधुनिक लड़ाकू विमानों के बनकर तैयार होने की टाइमलाइन क्या है?
जवाब: नियमों के मुताबिक, कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 30 महीने के भीतर विमान की पहली उड़ान होनी चाहिए। पहला प्रोटोटाइप 2029 तक तैयार होने की उम्मीद है, जिसमें जीई एफ414 इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके बाद 84 महीनों के भीतर 1,800 उड़ानों का कड़ा टेस्ट प्रोग्राम पूरा करना अनिवार्य है। भारतीय वायुसेना 2035 से इन विमानों की सात स्क्वाड्रन को बेड़े में शामिल करना शुरू करेगी।
सवाल: इस परियोजना पर आगे का आउटलुक क्या?
जवाब: 15,000 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और निजी क्षेत्र की भागीदारी को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। उम्मीद है कि अगले चार से पांच महीनों में चयन प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और यह साफ हो जाएगा कि भारत के पांचवीं पीढ़ी के विमान निर्माण की कमान किस कंपनी के हाथों में होगी।