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सिर्फ फोर्टिस ही नहीं, इन बड़ी कंपनियों के में भी हुआ है विवाद, लगा करोड़ों रुपये हेरफेर का आरोप

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Updated Wed, 05 Sep 2018 04:02 PM IST
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बड़े अस्पताल में शामिल फोर्टिस के प्रमोटर बंधुओं में आपसी विवाद अब एनसीएलटी कोर्ट में चला गया है। देश के कार्पोरेट इतिहास में यह पहला ऐसा मामला नहीं हैं, जिसमें मामला कोर्ट में गया है। इससे पहले मुंबई के लीलावती अस्पताल और टाटा समूह-साइरस मिस्त्री का विवाद भी शामिल है। इन कंपनियों में संपत्ति को लेकर के विवाद राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में पहुंच गए थे, जिनमें कुछ मामले विचाराधीन चल रहे हैं। 

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फोर्टिस का यह है विवाद

फोर्टिस हेल्थकेयर में नियंत्रक हिस्सेदारी मलेशियाई कंपनी को सौंपे जाने के बाद इसके पूर्व प्रमोटर बंधुओं में तनाव पैदा हो गया है। छोटे भाई शिवइंदर मोहन सिंह ने मंगलवार को बड़े भाई मलविंदर मोहन सिंह के खिलाफ एनसीएलटी में याचिका दाखिल की है। छोटे भाई शिवइंदर ने बड़े भाई मलविंदर पर फोर्टिस को डुबोने का आरोप लगाया है। सिंह बंधुओं पर कंपनी से एक साल पहले 7.8 करोड़ डॉलर निकालने का आरोप लग रहा है। 
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90 के दशक में हुई थी शुरुआत

नब्बे के दशक के आखिर में शिवइंदर ने अपने बड़े भाई मालविंदर मोहन सिंह के साथ फोर्टिस हेल्थकेयर की शुरुआत की थी। 2008 में सिंह बंधुओं ने रैनबैक्सी में अपने स्टॉक को जापान की प्रमुख दवा कंपनी दाइची संक्योन को बेच दिया था। फिलहाल फोर्टिस हैल्थकेयर की शाखाएं भारत, दुबई, मॉरिशस और श्रीलंका में काम कर रही हैं।

यह है विवाद की असली वजह

कंपनी की बैलेंस शीट में इस 500 करोड़ रुपये का जिक्र है, लेकिन इस पैसे का इस्तेमाल दूसरी कंपनियों को फंड डायवर्ट कर दिया। यही नहीं कंपनी के ऑडिटर डेलॉयट ने दूसरी तिमाही के नतीजों को मंजूरी नहीं दी है। 

बोर्ड से नहीं ली मंजूरी

इतनी बड़ी रकम को निकालने के लिए दोनों भाइयों ने कंपनी के बोर्ड से भी मंजूरी नहीं ली। इस मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि यह अभी तक साफ नहीं है कि इस फंड का क्या हुआ। हालांकि जानकारों का कहना है कि दोनों सिंह भाई इस पैसे को लौटाने जा रहे हैं। इसके बाद ही फोर्टिस का रिजल्ट जारी किया जा सकेगा।

खरीदा था यह बड़ा अस्पताल

2005 में सिंह बंधुओं ने 2005 में दिल्ली के प्रसिद्ध अस्पताल एस्कॉर्ट्स को 650 करोड़ रुपये में खरीदा था। तब यह हेल्थकेयर सेक्टर में सबसे बड़ी डील मानी गई थी। 

टाटा संस-साइरस मिस्त्री विवाद

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25 अक्टूबर, 2016 को नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाली 100 अरब डॉलर की कंपनी टाटा ग्रुप ने अपने अध्यक्ष सायरस मिस्त्री को बर्खास्त कर कॉर्पोरेट जगत को चौंका दिया था। कंपनी के बोर्ड ने चार साल से अध्यक्ष का पद संभाल रहे 48 वर्षीय मिस्त्री की छुट्टी कर इसकी अंतरिम कमान एक बार फिर से रतन टाटा को सौंप दी थी।

इसके साथ ही मिस्त्री द्वारा 2013 में गठित समूह कार्यकारी परिषद (जीईसी) को भी भंग कर दिया गया है। रतन टाटा के उत्तराधिकारी के तौर पर मिस्त्री को यह जिम्मेदारी 29 दिसंबर 2012 को सौंपी गई थी। बोर्ड में वह 2006 में चुने गए और इसके बाद नवंबर 2011 में कंपनी के उपाध्यक्ष बनाए गए। टाटा संस के सबसे बड़े हिस्सेदार शापूरजी पलोनजी के प्रतिनिधि के तौर पर उन्हें अध्यक्ष बनाया गया था।

टाटा-मिस्त्री घटनाक्रम

टाटा संस-सायरस मिस्त्री मामले की अब तक की घटनाएं इस प्रकार हैं :

  • 24 अक्तूबर, 2016 : टाटा संस ने सायरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से बर्खास्त किया। रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया।
  • 25 अक्तूबर, 2016 : मिस्त्री ने टाटा संस के बोर्ड को पत्र लिखा, टाटा के ट्रस्टी द्वारा क्षद्म नियंत्रण का लगाया आरोप।
  • 19 दिसंबर, 2016 : मिस्त्री ने टाटा समूह की सभी कंपनियों के निदेशक पद से इस्तीफा दिया।
  • 20 दिसंबर, 2016 : मिस्त्री ने एनसीएलटी में याचिका दाखिल कर अल्पमत शेयरधारकों के दमन और कुप्रबंधन का आरोप लगाया।
  • 12 जनवरी, 2017 : टाटा संस ने एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन नियुक्त किया।
  • 6 फरवरी, 2017 : मिस्त्री को टाटा संस के बोर्ड से निदेशक पद से हटाया गया।
  • 21 सितंबर, 2017 : टाटा संस के बोर्ड ने प्राइवेट कंपनी बनने की योजना को मंजूरी दी।
  • 12 जून, 2018 : एनसीएलटी ने फैसले के लिए चार जुलाई की तिथि तय की।
  • 4 जुलाई, 2018 : एनसीएलटी ने फैसले की तिथि को बढ़ाकर नौ जुलाई किया।
  • 9 जुलाई, 2018 : एनसीएलटी ने मिस्त्री की वह याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन पद से बर्खास्त किए जाने को चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि मिस्त्री को बोर्ड से इसलिए हटाया गया, क्योंकि बोर्ड और उसके सदस्यों का उन पर से विश्वास खत्म हो गया था।


टाटा संस में किसका कितना है दम

शेयरधारक                            हिस्सेदारी (प्रतिशत में)
टाटा के विभिन्न ट्रस्ट                      66
शपूरजी पालोनजी समूह                18.4
टाटा समूह की सूचीबद्ध कंपनियां    11.9
अन्य                                            3.7

लीलावती अस्पताल में भी हुआ था ऐसा विवाद

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leelavati hospital

नवंबर 2011 में मुंबई के प्रसिद्ध लीलावती अस्पताल में भी इसी तरह का विवाद देखने को मिला था। तब इस अस्पताल में आयकर विभाग ने छापा मारा था। लेकिन इस छापे के बाद कोई नहीं कार्रवाई नहीं हुई थी।

इसके बाद पिछले साल फिर से अस्पताल के मैनेजिंग ट्रस्टी निकेट मेहता ने बोर्ड के कुछ सदस्यों पर मनी लॉन्ड्रिंग करने का आरोप लगाया था। मेहता ने तब कहा था कि ट्रस्टियों  ने अस्पताल के 500 करोड़ के फंड का इस्तेमाल संपत्ति खरीदने के लिए किया था। इन संपत्तियों में ओएनजीसी की एक इमारत और कांदिवली, बांद्रा व खार में फ्लैट खरीदे गए हैं।  

दो दशकों से चल रहा विवाद

323 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में पारिवारिक विवाद पिछले दो दशकों से चल रहा है। इसमें भाई किशोर मेहता, प्रबोध मेहता, रश्मि मेहता और संस्थापक विजय मेहता का नाम शामिल है। निकेट मेहता, विजय मेहता के बेटे हैं। 

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