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AAP vs Raghav Chadha: खामोशी, सीमित सक्रियता और बदले संकेत, केजरीवाल और राघव के बीच दूरी बढ़ने की पूरी कहानी

सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: Sharukh Khan Updated Sat, 04 Apr 2026 02:14 PM IST
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सार

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल जब जेल में थे तब राघव चड्ढा विदेश में थे। यहीं से दूरी बढ़ने की कहानी शुरू हुई। खामोशी, सीमित सक्रियता और बदले संकेतों ने दरार और बढ़ा दी। संगठनात्मक फैसलों से लेकर सोशल मीडिया तक में बदलाव दिखा।

Kejriwal Raghav Controversy Distance Grows After Jail Phase and Foreign Absence, AAP Internal Dynamics Change
AAP vs Raghav Chadha - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

आम आदमी पार्टी के भीतर अरविंद केजरीवाल और राघव चड्ढा के बीच दूरी अब खुलकर सामने आ गई है। दो साल पहले कथित शराब नीति मामले में केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान राघव चड्ढा विदेश में थे। यही घटनाक्रम अब अंदरूनी समीकरणों में बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।
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मार्च से सितंबर 2024 तक केजरीवाल जेल में रहे। इस दौरान पार्टी का पूरा फोकस गिरफ्तारी और कानूनी लड़ाई पर था। पार्टी को मजबूत सार्वजनिक समर्थन की जरूरत थी। इसी समय चड्ढा की अनुपस्थिति ने सवाल खड़े किए। पार्टी के भीतर यह धारणा बनी कि संकट के समय कोर टीम पूरी तरह एकजुट नहीं दिखी।
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लोकसभा चुनाव के दौरान संकेत और स्पष्ट हुए। राघव चड्ढा को स्टार प्रचारकों की सूची से दूर रखा गया। उनकी भूमिका सीमित रही। पंजाब में बाढ़ और अन्य हालात में भी उनकी फील्ड मौजूदगी कम नजर आई। इससे उनकी ग्राउंड कनेक्ट पर सवाल उठे।

राघव पर ये आरोप भी लगे
पंजाब आप के लिए अहम राज्य है। आरोप लगे कि कानून व्यवस्था, किसान मुद्दों और प्रशासनिक चुनौतियों पर चड्ढा अपेक्षित रूप से सक्रिय नहीं रहे। दूसरी ओर उनकी अंतरराष्ट्रीय गतिविधियां और सार्वजनिक उपस्थिति अलग दिशा का संकेत देती रहीं।

 

जेल के दौरान और उसके बाद भी केजरीवाल के समर्थन में उनकी ओर से सीमित बयान आए। अन्य नेताओं की तुलना में उनकी खामोशी ने अटकलों को हवा दी। संगठन में कुछ जिम्मेदारियों में बदलाव भी हुआ। विश्लेषकों ने इसे सॉफ्ट साइडलाइनिंग के संकेत के रूप में देखा।

 

पार्टी के भीतर राष्ट्रीय विस्तार और राज्य की राजनीति को लेकर भी मतभेद की चर्चा रही। चड्ढा का फोकस नीति और अंतरराष्ट्रीय छवि पर ज्यादा बताया गया, जबकि पार्टी जमीनी राजनीति पर जोर देती रही।

रिहाई के जश्न से भी नदारद रहे चड्ढा
केजरीवाल को राहत मिलने के बाद पार्टी में जश्न का माहौल रहा। इस दौरान चड्ढा की गैरमौजूदगी चर्चा में रही। सोशल मीडिया पर भी बदलाव दिखा। उनके पोस्ट से पार्टी का नाम और प्रतीक कम नजर आने लगे। इससे अलग राजनीतिक दिशा के संकेत मिले। 

 

सूत्रों के अनुसार राज्यसभा में भी उनका रुख कुछ मुद्दों पर अलग नजर आया। उन्होंने ऐसे विषय उठाए जिन्हें व्यक्तिगत प्राथमिकता से जोड़ा गया। इससे संगठन में असहजता बढ़ी।

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनकी सक्रियता सीमित रही। कुछ कार्यक्रमों के बाद उनका फोकस राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्यादा दिखा। संसद में उठाए गए मुद्दों पर सरकार की कार्रवाई और उस पर उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया को भी अलग नजरिए से देखा गया। 

 

इन सभी घटनाओं ने मिलकर एक तस्वीर बनाई है। सोशल मीडिया दूरी, सीमित संगठनात्मक भूमिका और अलग राजनीतिक रुख ने संकेत दिया कि दोनों के बीच फासला बढ़ा है। फिलहाल पार्टी और चड्ढा ने किसी टकराव को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी हैं कि समीकरण पहले जैसे नहीं रहे।
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