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जलवायु परिवर्तन: हिमालय में कमजोर हो रहे हैं ग्लेशियर, तेजी से बढ़ रही है संख्या; बर्फ के घनत्व में भी कमी

Fri, 28 Aug 2026 06:10 AM IST
दुष्यंत शर्मा आशीष तिवारी, चंडीगढ़
आशीष तिवारी, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 28 Aug 2026 06:10 AM IST
सार

ज्यादातर ग्लेशियर फ्रैक्चर्ड हैं, यानी उनमें ठोस बर्फ की कमी हो रही है। कुछ ऐसे ग्लेशियर भी हैं, जिसमें बीच-बीच में बर्फ का घनत्व कम हो चुका है। ऐसी स्थिति में लाखों टन वजनी बर्फ के पहाड़ अपना सपोर्ट खो रहे हैं और हैंगिंग यानी लटके ग्लेशियर की तरह खड़े हैं। ऐसे ग्लेशियर कभी भी भारी तबाही मचा सकते हैं।

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Climate Change: Rapidly expanding glacial lake outbursts in the Himalayas pose a major threat.
हिमालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमालयन क्षेत्र के ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं। ज्यादातर ग्लेशियर फ्रैक्चर्ड हैं, यानी उनमें ठोस बर्फ की कमी हो रही है। कुछ ऐसे ग्लेशियर भी हैं, जिसमें बीच-बीच में बर्फ का घनत्व कम हो चुका है। ऐसी स्थिति में लाखों टन वजनी बर्फ के पहाड़ अपना सपोर्ट खो रहे हैं और हैंगिंग यानी लटके ग्लेशियर की तरह खड़े हैं। ऐसे ग्लेशियर कभी भी भारी तबाही मचा सकते हैं। हिमालयन क्षेत्र में बर्फ पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल की तबाही ऐसे ही कमजोर हो चुके ग्लेशियर और उसके पीछे बनी झील के तेज प्रवाह की वजह से हुई है।

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चंडीगढ़ स्थित डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन की संस्था डिफेंस जियो इनफॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट के पूर्व डायरेक्टर डॉक्टर अश्वघोष गंजू कहते हैं कि नेपाल में आई तबाही कमजोर हो चुके ग्लेशियर के टूटने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) प्रमुख कारण लग रही है। उनका कहना है कि हजारों साल पुराने ग्लेशियर बदलते हुए तापमान और ग्लोबल वार्मिंग के चलते एक साल में आधा से एक फिट तक आगे बढ़ रहे हैं। 
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कई बार यह सत्रह से बीस हजार फीट की ऊंचाई पर आगे खिसकते खिसकते एक ढलान में आ जाते हैं जिनको हैंगिंग ग्लेशियर कहते हैं और यही खतरनाक हो जाते हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर रत्नाकर सेनगुप्ता कहते हैं कि हिमालयन रीजन के ग्लेशियर लाखों टन वजनी बर्फ का भार नहीं झेल पा रहे हैं। इसकी वजह बताते हुए डॉक्टर सेनगुप्ता कहते हैं कि या तो ज्यादातर ग्लेशियर फ्रेक्चर्ड हैं या फिर हैंगिंग पोजीशन में आ चुके हैं। इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है।
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1990 से ज्यादा कमजोर हो रहे ग्लेशियर
सन 1990 से हिमालयन रीजन के ग्लेशियरों का कमजोर होना लगातार जारी है। बदलते हुए क्लाइमेट पर नजर रखने वाले पर्यावरणविद सुपर्णो कहते हैं कि 1975 से हिमालय के इलाकों में मौजूद ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की भनक लगने लगी थी। लेकिन 1990 के आस पास इसकी संख्या तेजी से बढ़ी है। 


हर तबाही के पीछे एक जैसा पैटर्न
वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखंड के केदारनाथ में 2013, चमोली में 2021 और 2023 में सिक्किम में हुई तबाही नेपाल की तरह ही थी। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि सबके पीछे सबसे बड़ा कारण हिमालय के कमजोर होते ग्लेशियर हैं। 

  • केदारनाथ: 2013 में विनाशकारी बाढ़ आई थी। इस घटना में भी कई साइंस जर्नल और वैज्ञानिकों ने हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ का एक कारक माना था।
  • चमोली: 2021 को अचानक आई बाढ़ का कारण रौंती शिखर के पास चट्टान और ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरना था। 
  • सिक्किम: 2023 में विनाशकारी बाढ़ का कारण दक्षिण ल्होनक झील का फटना था। जो झील के आकार के बढ़ने से हुआ था।
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