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आयुर्वेदिक कॉलेज की रिसर्च: तेल की बूंद से पता चलेगी बीमारी की गंभीरता, किडनी-प्रोस्टेट के मरीजों पर शोध
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 08 Apr 2026 09:08 AM IST
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सार
शोध में पाया गया कि जिन मरीजों में तेल तेजी से और समान रूप से फैला, उनकी स्थिति बेहतर थी। जिनमें फैलाव धीमा या अनियमित रहा, उनमें बीमारी मध्यम स्तर की पाई गई, जबकि जिन मामलों में तेल डूब गया, उनकी स्थिति अधिक गंभीर निकली।
डाॅ. सुमित श्रीवास्तव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सिर्फ तेल की एक बूंद से बीमारी की गंभीरता और मरीज के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है। आयुर्वेद की सदियों पुरानी विधि तैल बिंदु परीक्षा एक बार फिर चर्चा में है। धन्वतरि आयुर्वेदिक कॉलेज एंड हॉस्पिटल में हुए शोध में इस पारंपरिक तकनीक को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर जांचा गया, जिसके नतीजे सकारात्मक सामने आए हैं। यह शोध नवंबर 2025 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल केमिकल हेल्थ रिस्क में प्रकाशित हुआ है।
शोध में किडनी और प्रोस्टेट से जुड़ी बीमारियों के मरीजों पर विशेष रूप से अध्ययन किया गया। कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुमित श्रीवास्तव के अनुसार तैल बिंदु परीक्षा एक सरल प्रक्रिया है। इसमें मरीज के मूत्र के ऊपर तिल के तेल की एक बूंद डाली जाती है और उसके फैलने के तरीके का अध्ययन किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यदि तेल तेजी से फैलकर गोल और साफ आकार बनाता है तो स्थिति साध्य यानी आसानी से ठीक होने वाली मानी जाती है। वहीं फैलाव धीमा और अनियमित होने पर बीमारी ‘कष्टसाध्य’ मानी जाती है। यदि तेल फैलने के बजाय नीचे बैठ जाए तो यह असाध्य यानी गंभीर स्थिति का संकेत देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक शरीर में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को दर्शा सकती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सस्ती, आसान और बिना दर्द वाली जांच है, जो खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।
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शोध में किडनी और प्रोस्टेट से जुड़ी बीमारियों के मरीजों पर विशेष रूप से अध्ययन किया गया। कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुमित श्रीवास्तव के अनुसार तैल बिंदु परीक्षा एक सरल प्रक्रिया है। इसमें मरीज के मूत्र के ऊपर तिल के तेल की एक बूंद डाली जाती है और उसके फैलने के तरीके का अध्ययन किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यदि तेल तेजी से फैलकर गोल और साफ आकार बनाता है तो स्थिति साध्य यानी आसानी से ठीक होने वाली मानी जाती है। वहीं फैलाव धीमा और अनियमित होने पर बीमारी ‘कष्टसाध्य’ मानी जाती है। यदि तेल फैलने के बजाय नीचे बैठ जाए तो यह असाध्य यानी गंभीर स्थिति का संकेत देता है।
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वैज्ञानिक तरीके से किया गया शोध
इस पारंपरिक विधि को शोध में वैज्ञानिक तरीके से अपनाया गया। मूत्र के नमूने नियंत्रित वातावरण में लिए गए और माइक्रोपिपेट की मदद से तय मात्रा में तेल की बूंद डाली गई। पूरे परीक्षण को कैमरे में रिकॉर्ड कर हर बदलाव का विश्लेषण किया गया और इन परिणामों की तुलना आधुनिक जांचों से की गई। निष्कर्षों में पाया गया कि जिन मरीजों में तेल तेजी से और समान रूप से फैला, उनकी स्थिति बेहतर थी। जिनमें फैलाव धीमा या अनियमित रहा, उनमें बीमारी मध्यम स्तर की पाई गई, जबकि जिन मामलों में तेल डूब गया, उनकी स्थिति अधिक गंभीर निकली।विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक शरीर में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को दर्शा सकती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सस्ती, आसान और बिना दर्द वाली जांच है, जो खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।