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Highcourt: चाय या कैंटीन भत्ता पीएफ गणना के लिए महंगाई भत्ता के बराबर नहीं, ट्रिब्यूनल को चार माह का समय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 04 Feb 2026 03:25 PM IST
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सार
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वही भत्ते ‘बेसिक वेजेज’ माने जाएंगे जो सभी कर्मचारियों को सार्वभौमिक, नियमित और अनिवार्य रूप से दिए जाते हों। जो भत्ते केवल कुछ कर्मचारियों को पद, वर्ग या नियोक्ता के विवेक पर मिलते हैं, उन्हें सार्वभौमिक नहीं माना जा सकता।
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कर्मचारी भविष्य निधि में किन भत्तों को बेसिक वेतन का हिस्सा माना जाएगा, इस अहम सवाल पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए विशेष भत्ता, चाय/कैंटीन भत्ता और ओवरटाइम वेतन को पीएफ गणना में शामिल करने के आदेशों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने ईपीएफ अपीलीय ट्रिब्यूनल और क्षेत्रीय पीएफ आयुक्त के फैसलों को कानून के विपरीत करार दिया है।
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कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण स्पष्ट अवैधता से ग्रस्त है और उसने सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी की। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका स्वीकार करते हुए मामला पुनः ट्रिब्यूनल को भेज दिया और निर्देश दिया कि चार माह के भीतर कानून के अनुसार नया फैसला किया जाए।
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यह मामला प्लास्टिक निर्माण करने वाली फरीदाबाद की कंपनी एक्सप्रो के खिलाफ शुरू हुई कार्यवाही से जुड़ा है। क्षेत्रीय पीएफ आयुक्त ने कंपनी को स्पेशल अलाउंस और कैंटीन अलाउंस पर पीएफ योगदान देने का जिम्मेदार ठहराया था लेकिन ओवरटाइम वेतन को ‘बेसिक वेजेज’ से बाहर रखा था। हालांकि, पीएफ विभाग द्वारा कोई अपील दायर न होने के बावजूद, ईपीएफ अपीलीय ट्रिब्यूनल ने स्वतः संज्ञान
लेते हुए ओवरटाइम वेतन को भी पीएफ में शामिल करने का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वही भत्ते ‘बेसिक वेजेज’ माने जाएंगे जो सभी कर्मचारियों को सार्वभौमिक, नियमित और अनिवार्य रूप से दिए जाते हों। जो भत्ते केवल कुछ कर्मचारियों को पद, वर्ग या नियोक्ता के विवेक पर मिलते हैं, उन्हें सार्वभौमिक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि चाय या कैंटीन भत्ता ‘महंगाई भत्ता’ के बराबर नहीं है क्योंकि यह महंगाई या जीवनयापन की लागत से जुड़ा नहीं होता। साथ
ही कोर्ट ने कहा कि ओवरटाइम वेतन ‘बेसिक वेजेज’ से स्पष्ट रूप से बाहर है क्योंकि ओवरटाइम केवल कुछ कर्मचारियों को, वह भी अतिरिक्त कार्य करने पर मिलता है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह विवाद 2011 से लंबित है। इस देरी पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को चार माह के भीतर अंतिम निर्णय देने का अनिवार्य निर्देश जारी किया।
