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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   High Court said it wrong to remove a teacher from his job after 18 years, interest given on reinstatement

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 18 साल बाद शिक्षिका को नौकरी से हटाना गलत, बहाली के साथ मिलेगा ब्याज

Thu, 27 Aug 2026 03:45 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Thu, 27 Aug 2026 03:45 PM IST
सार

अदालत ने 18 साल की संतोषजनक सेवा के बाद शिक्षिका को नौकरी से निकालने के निर्णय को अवैधानिक करार दिया। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को सही मानते हुए शिक्षिका को सेवा में बहाल करने और बकाया वेतन का 9 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया है।
 

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High Court said it wrong to remove a teacher from his job after 18 years, interest given on reinstatement
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने रायपुर स्थित राजकुमार कॉलेज प्रबंधन की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने 18 साल की संतोषजनक सेवा के बाद शिक्षिका को नौकरी से निकालने के निर्णय को अवैधानिक करार दिया। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को सही मानते हुए शिक्षिका को सेवा में बहाल करने और बकाया वेतन का 9 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया है।
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मामला रायपुर के राजकुमार कॉलेज का है, जहां 21 जून, 1990 को सविता मोहंती को ओडिया भाषा पढ़ाने के लिए सहायक शिक्षिका के पद पर नियुक्त किया गया था। इसके बाद,वर्ष 1994 में कॉलेज प्रबंधन ने उनकी सेवाओं का नियमितीकरण करते हुए लगातार वार्षिक वेतन वृद्धि का लाभ प्रदान किया। शिक्षिका लगभग 18 वर्षों तक संस्थान में अपनी संतोषजनक सेवाएं देती रहीं। हालांकि, 19 जून, 2008 को कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें अचानक नौकरी से निकाल दिया। प्रबंधन ने तर्क दिया कि विद्यालय में ओडिया भाषा पढ़ने वाले छात्रों की संख्या काफी कम हो गई है। प्रबंधन ने यह बात भी रखी कि शिक्षिका के पास बीएड की डिग्री नहीं है, जिससे उन्हें किसी अन्य विषय को पढ़ाने का दायित्व नहीं दिया जा सकता।
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निष्कासन आदेश से परेशान होकर शिक्षिका ने अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दायर की। अपीलीय प्राधिकारी ने 8 मई, 2012 को शिक्षिका के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें पिछले पूरे वेतन तथा 9 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज के साथ बहाल करने का आदेश दिया। फैसले को चुनौती देते हुए कॉलेज प्रबंधन ने उच्च न्यायालय की एकल पीठ में याचिका दायर की थी। एकल पीठ ने 17 मार्च 2026 को प्रबंधन की याचिका निरस्त कर दी। इसके बा,द प्रबंधन ने एकल पीठ के आदेश के विरुद्ध खंडपीठ में अपील प्रस्तुत की थी।
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उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि वर्ष 1990 के नियुक्ति पत्र के अनुसार बीएड की डिग्री कोई अनिवार्य पूर्व-शर्त नहीं थी। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1994 में जब शिक्षिका की सेवाएं नियमित की गईं, तब प्रबंधन ने बीएड की योग्यता पर कोई सवाल नहीं उठाया था। अदालत ने यह भी पाया कि मूल निष्कासन आदेश में मुख्य आधार छात्रों की घटती संख्या को ही बनाया गया था। ऐसी स्थिति में 18 साल की लंबी सेवा के बाद बीएड न होने का हवाला देकर नौकरी समाप्त करना कानूनन सही नहीं है।
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