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KamarChhath: संतान की दीर्घायु के लिये माताएं आज रखेंगी कमरछठ व्रत, जानें इस तिहार से जुड़ी मान्यताएं और कथा
Wed, 02 Sep 2026 10:24 AM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Wed, 02 Sep 2026 10:24 AM IST
सार
Kamarchhath 2026: छत्तीसगढ़ में आज बुधवार को कमरछठ यानी हलषष्ठी का व्रत मनाया जायेगा। इस दौरान महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिये उपवास रखेंगी। व्रत के दौरान महिलाएं सगरी बनाकर उसमें छह प्रकार के खिलौने रखेंगी। पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करेंगी।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
Kamarchhath 2026: छत्तीसगढ़ में आज बुधवार को कमरछठ यानी हलषष्ठी का व्रत मनाया जायेगा। इस दौरान महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिये उपवास रखेंगी। व्रत के दौरान महिलाएं सगरी बनाकर उसमें छह प्रकार के खिलौने रखेंगी। पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करेंगी। पूजा में भैंस के दूध, दही और घी के साथ लाई, महुआ, तिल और अरहर सहित छह प्रकार के अन्न का भोग चढ़ायेंगी। पूजा के बाद पसहर चावल और छह प्रकार की भाजी से तैयार प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाएगा।
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हर साल कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व यानी भादो मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। कमरछठ पर हल से जुते खेत का अन्न नहीं खाया जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों में इसे हल छठ, हरछठ और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में यह त्योहार कमरछठ या खमर छठ के नाम से जाना जाता है। संतान के दीर्घायु की कामना से माताएं यह व्रत रखती हैं। विधि-विधान से पूजा करती हैं। यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के छह दिन बाद चंद्रषष्ठी, बलदेव छठ, रंधन षष्ठी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन माताएं षष्ठी माता की पूजा करके परिवार की खुशहाली और संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। छत्तीसगढ़ की कमर छठ में पूजा के बाद बच्चों को लेकर एक विशेष रस्म निभाते हैं। कई जगह माताएं अपने बच्चों की पीठ पर पीली पोती लगाती हैं और उनकी दीर्घायु और नजर-दोष से रक्षा की कामना करती हैं। सामूहिक पूजा के बाद इस परंपरा को श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
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बनाई जाती है सगरी
कमरछठ व्रत में तालाब में पैदा हुए खाद्य पदार्थ या बगैर हल के जोते हुए खाद्य सामग्री बनाये जाते हैं। कमरछठ की सबसे खास पहचान पारंपरिक प्रसाद है। इसलिए इस दिन बिना हल चली वस्तुओं का विशेष महत्व है। महिलाएं पूजा के बाद पसहर चावल (लाल भात) और छह प्रकार की भाजी का सेवन करती हैं। छह प्रकार की भाजियों को पानी और काली मिर्च के साथ पकाने की पारंपरिक विधि का विशेष महत्व है। इस दिन सिर्फ भैंस के दूध, दही और घी का ही सेवन करते हैं। वहीं कई क्षेत्रों में दोना-पत्तल में प्रसाद ग्रहण करने की भी परंपरा है। कमरछठ का व्रत में महिलाएं शिव और पार्वती जी की पूजा कर कथा सुनती हैं। गली मोहल्लों और घरों में सगरी यानि दो तालाब की स्वरूप आकृति बनाई जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं सगरी में दूध, दही अर्पण करती हैं।
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भगवान बलराम से जुड़ा है तिहार
पुराणों के मुताबिक, हलषष्ठी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से है। बलराम का प्रमुख अस्त्र हल है और उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। इसी वजह से इस दिन को हलषष्ठी कहा जाता है। संतान प्राप्ति की कामना करने वाली महिलाएं हल षष्ठी का व्रत रखती हैं।