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आईआईटी बॉम्बे: क्या फिर लौटेंगे 2015 वाले परीक्षा नियम, कार्रवाई से पहले क्या छात्र रख पाएंगे अपना पक्ष?
Thu, 08 Oct 2026 10:10 AM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Thu, 08 Oct 2026 10:10 AM IST
सार
IIT Bombay: आईआईटी बॉम्बे की सीनेट ने परीक्षा में अनुचित साधनों से जुड़े 2015 के नियमों पर लौटने का फैसला किया है। अब कार्रवाई से पहले छात्रों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। शिक्षक को आरोप की जानकारी दर्ज करनी होगी। छात्र के लिए अपना प्रपत्र भरना अनिवार्य नहीं होगा। नई एसओपी भी तैयार की जा रही है।
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IIT Bombay
- फोटो : AI Generated
विस्तार
आईआईटी बॉम्बे की सीनेट ने बुधवार को परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को लेकर अहम फैसला लिया है। बैठक में 2015 में लागू नियमों की ओर वापस जाने पर सहमति बनी है। इसका सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि किसी छात्र के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा। अधिकारियों के मुताबिक, यह फैसला उस समिति की समीक्षा के बाद लिया गया है, जिसे 18 सितंबर को एक छात्र की मौत के बाद परीक्षा में अनुचित साधनों से जुड़े मामलों की प्रक्रिया की समीक्षा करने के लिए बनाया गया था। समिति ने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश की थी।
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2026 के नियमों में क्या था प्रावधान?
आईआईटी बॉम्बे में 2026 में लागू किए गए मौजूदा नियमों के तहत परीक्षा में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वाले छात्रों को एफआर2 ग्रेड और एक सेमेस्टर के निलंबन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता था। इन नियमों में बिना अनुमति वाली सामग्री या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण रखने अथवा इस्तेमाल करने जैसे मामले शामिल थे। मोबाइल फोन, टैबलेट और स्मार्टवॉच भी इसके दायरे में आते थे। दोबारा नियम तोड़ने वाले छात्रों पर भी निलंबन की कार्रवाई हो सकती थी। इसके मुकाबले 2015 के नियमों में निलंबन का प्रावधान मुख्य रूप से गंभीर मामलों जैसे सामूहिक नकल, बार-बार नियम तोड़ने और किसी दूसरे व्यक्ति की जगह परीक्षा देने जैसे मामलों में था।
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2015 के नियमों में क्या था?
2015 की व्यवस्था में परीक्षा के दौरान अनुचित साधन पाए जाने पर एक तय प्रक्रिया का पालन किया जाता था। अगर निरीक्षक को किसी छात्र के पास अनुचित सामग्री मिलती थी, तो उसे जब्त किया जाता था और छात्र को नई उत्तर पुस्तिका देकर परीक्षा जारी रखने की अनुमति दी जाती थी। इसके बाद मामले की रिपोर्ट तैयार करके विभागाध्यक्ष को भेजी जाती थी। फिर विभाग की शैक्षणिक अनुशासन समिति मामले की जांच करती थी। समिति उपलब्ध सबूतों के आधार पर यह तय करती थी कि वास्तव में परीक्षा में अनुचित साधन का इस्तेमाल हुआ था या नहीं। अगर सबूत स्पष्ट नहीं होते थे, तो छात्र को संदेह का लाभ देने का भी प्रावधान था।
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