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सीट का समीकरण: 2022 में यहां पहली बार जीती सपा, जीत दिलाने वाली पूजा अब भाजपाई; जानें चायल का चुनावी इतिहास
Thu, 29 Oct 2026 08:19 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Thu, 29 Oct 2026 08:19 PM IST
सार
- कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट 1957 के चुनाव में अस्तित्व में आई थी।
- इस सीट से कांग्रेस, पीएसपी, जनसंघ, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा, बसपा, सपा ने जीत दर्ज की है।
- 2022 में यहां से सपा की पूजा पाल जीतीं थीं। पूजा अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं।
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चायल सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। भले ही मतदान में अभी समय हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी हलचल साफ दिखाई देने लगी है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने, सामाजिक समीकरण साधने और स्थानीय मुद्दों के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने में जुटे हैं। आने वाले चुनाव में जहां भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। उत्तर प्रदेश की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच हम आपको राज्य की हर विधानसभा सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं चायल विधानसभा सीट का पूरा सियासी गणित, चुनावी इतिहास और यहां बदलते राजनीतिक समीकरण।
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पहले जानते हैं चायल सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला कौशांबी है। जिले में कुल तीन विधानसभा सीटें हैं- चायल, मंझनपुर और सिराथू। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट की बात करेंगे। कौशांबी जनपद की चायल विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह विधानसभा दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा थी। यहां के पहले यानी कि 1957 के चुनाव में गोकुल प्रसाद और सैयद मुजफ्फर हुसैन विधायक बने थे, जिन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी। 1957 के समय में चायल एक द्विसदस्यीय विधानसभा सीट थी।
चायल विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
चायल विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में दलित, यादव, पिछड़ी जाति और मुस्लिम समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी दलित मतदाताओं की है, जो लगभग 34% हैं। इसके बाद यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 16% और अन्य पिछड़ी जातियों की आबादी लगभग 16% है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15% है। अन्य प्रमुख वर्गों में ब्राह्मण समाज और वैश्य समुदाय के मतदाता करीब 5-5% हैं। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला कौशांबी है। जिले में कुल तीन विधानसभा सीटें हैं- चायल, मंझनपुर और सिराथू। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट की बात करेंगे। कौशांबी जनपद की चायल विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह विधानसभा दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा थी। यहां के पहले यानी कि 1957 के चुनाव में गोकुल प्रसाद और सैयद मुजफ्फर हुसैन विधायक बने थे, जिन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी। 1957 के समय में चायल एक द्विसदस्यीय विधानसभा सीट थी।
चायल विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
चायल विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में दलित, यादव, पिछड़ी जाति और मुस्लिम समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी दलित मतदाताओं की है, जो लगभग 34% हैं। इसके बाद यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 16% और अन्य पिछड़ी जातियों की आबादी लगभग 16% है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15% है। अन्य प्रमुख वर्गों में ब्राह्मण समाज और वैश्य समुदाय के मतदाता करीब 5-5% हैं। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
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इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
चायल विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे की शुरुआत
चायल विधानसभा सीट (तत्कालीन इलाहाबाद जिले की चायल सीट) के चुनावी इतिहास की बात करें तो यहां के पहले यानी कि 1957 के चुनाव में कांग्रेस के गोकुल प्रसाद और सैयद मुजफ्फर हुसैन दोनों विजयी हुए थे। चूंकि उस समय यह विधानसभा एक द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थी, इसलिए इस क्षेत्र से दो विधायक चुने गए थे।
इन चुनावों के बाद राज्य में 1962 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल विधानसभा को एकल-सदस्यीय सीट में बदल दिया गया।
चायल विधानसभा सीट पर पहली बार जीती पीएसपी
1962 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर पहली बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नौनिहाल सिंह चौधरी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की कमल कुमारी गोइंदी को 4,586 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में नौनिहाल सिंह चौधरी को 17,508 वोट, जबकि कमल कुमारी गोइंदी को 12,922 वोट मिले।
1967 में सीट पर कांग्रेस की वापसी हुई
इस चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस की वापसी हुई। इस चुनाव में कांग्रेस के डी. लाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के एस. लाल को 8,788 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में डी. लाल को 14,498 वोट, जबकि एस. लाल को 5,710 वोट मिले।
1957: कांग्रेस के दबदबे की शुरुआत
चायल विधानसभा सीट (तत्कालीन इलाहाबाद जिले की चायल सीट) के चुनावी इतिहास की बात करें तो यहां के पहले यानी कि 1957 के चुनाव में कांग्रेस के गोकुल प्रसाद और सैयद मुजफ्फर हुसैन दोनों विजयी हुए थे। चूंकि उस समय यह विधानसभा एक द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थी, इसलिए इस क्षेत्र से दो विधायक चुने गए थे।
इन चुनावों के बाद राज्य में 1962 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल विधानसभा को एकल-सदस्यीय सीट में बदल दिया गया।
चायल विधानसभा सीट पर पहली बार जीती पीएसपी
1962 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर पहली बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नौनिहाल सिंह चौधरी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की कमल कुमारी गोइंदी को 4,586 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में नौनिहाल सिंह चौधरी को 17,508 वोट, जबकि कमल कुमारी गोइंदी को 12,922 वोट मिले।
1967 में सीट पर कांग्रेस की वापसी हुई
इस चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस की वापसी हुई। इस चुनाव में कांग्रेस के डी. लाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के एस. लाल को 8,788 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में डी. लाल को 14,498 वोट, जबकि एस. लाल को 5,710 वोट मिले।
1969: चायल विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनसंघ जीता
1969 के विधानसभा चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर एक बार फिर सत्ता बदली। इस बार के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के जवाहर लाल को 1,065 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 12,366 वोट, जबकि जवाहर लाल को 11,301 वोट मिले।
वहीं 1974 के विधानसभा चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की। इस चुनाव में कांग्रेस के कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल के जगन्नाथ आर्य को 5,038 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 19,773 वोट, जबकि जगन्नाथ आर्य को 14,735 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1969 के विधानसभा चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर एक बार फिर सत्ता बदली। इस बार के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के जवाहर लाल को 1,065 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 12,366 वोट, जबकि जवाहर लाल को 11,301 वोट मिले।
वहीं 1974 के विधानसभा चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की। इस चुनाव में कांग्रेस के कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल के जगन्नाथ आर्य को 5,038 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 19,773 वोट, जबकि जगन्नाथ आर्य को 14,735 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत
1974 के बाद 1977 के चुनाव हुए। इस चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के धर्मवीर को 2,568 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 23,146 वोट, जबकि धर्मवीर को 20,578 वोट मिले।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस (आई) की एक बार फिर वापसी हुई। इस चुनाव में विजय प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के भागीरथ को हराया। चुनाव में विजय प्रकाश को 20,814 वोट मिले, जबकि भागीरथ को 18,181 वोटों से संतोष करना पड़ा।
1974 के बाद 1977 के चुनाव हुए। इस चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के धर्मवीर को 2,568 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कन्हैया लाल सोनकर को 23,146 वोट, जबकि धर्मवीर को 20,578 वोट मिले।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पर कांग्रेस (आई) की एक बार फिर वापसी हुई। इस चुनाव में विजय प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के भागीरथ को हराया। चुनाव में विजय प्रकाश को 20,814 वोट मिले, जबकि भागीरथ को 18,181 वोटों से संतोष करना पड़ा।
1985, 1989: लगातार दो चुनाव में कांग्रेस ने मारी बाजी
इन चुनावों के बाद राज्य में 1985 और 1989 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर शानदार वापसी की। 1985 के चुनाव में कांग्रेस के शैलेंद्र कुमार विजयी हुए। उन्होंने लोकदल के भागीरथ को हराया। जबकि 1989 के चुनाव में शैलेंद्र कुमार ने लगातार दूसरी बार चुनाव में जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार सेठ भागीरथ को 11,044 वोटों के अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991: चायल में पहली बार जीती जनता दल
1991 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पहली बार जनता दल के खाते में गई। इस चुनाव में दिनेश चंद्र सोनकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शिवदानी को 1,840 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जनता दल के दिनेश चंद्र सोनकर को 19,243 वोट, जबकि भाजपा के शिवदानी को 17,403 वोट मिले।
1993: चायल में भाजपा को मिली पहली जीत
1993 के विधानसभा चुनाव में कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शिवदानी विजयी हुए। यह चायल सीट पर भाजपा की पहली जीत थी। शिवदानी ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राधेश्याम भारती को 12,757 वोटों के अंतर से हराया था। इस चुनाव में शिवदानी को कुल 37,727 वोट मिले, जबकि राधेश्याम भारती को 24,970 वोट मिले थे।
इन चुनावों के बाद राज्य में 1985 और 1989 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर शानदार वापसी की। 1985 के चुनाव में कांग्रेस के शैलेंद्र कुमार विजयी हुए। उन्होंने लोकदल के भागीरथ को हराया। जबकि 1989 के चुनाव में शैलेंद्र कुमार ने लगातार दूसरी बार चुनाव में जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार सेठ भागीरथ को 11,044 वोटों के अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991: चायल में पहली बार जीती जनता दल
1991 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट पहली बार जनता दल के खाते में गई। इस चुनाव में दिनेश चंद्र सोनकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शिवदानी को 1,840 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जनता दल के दिनेश चंद्र सोनकर को 19,243 वोट, जबकि भाजपा के शिवदानी को 17,403 वोट मिले।
1993: चायल में भाजपा को मिली पहली जीत
1993 के विधानसभा चुनाव में कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शिवदानी विजयी हुए। यह चायल सीट पर भाजपा की पहली जीत थी। शिवदानी ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राधेश्याम भारती को 12,757 वोटों के अंतर से हराया था। इस चुनाव में शिवदानी को कुल 37,727 वोट मिले, जबकि राधेश्याम भारती को 24,970 वोट मिले थे।
1996: चायल सीट पर कांग्रेस की जीत
1996 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट से कांग्रेस के विजय प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के दिनेश चंद्र सोनकर को 5,308 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विजय प्रकाश को 39,763 वोट, जबकि दिनेश चंद्र सोनकर को 34,455 वोट मिले। इस चुनाव के बाद इस सीट पर कांग्रेस फिर कभी नहीं जीत पाई। चायल सीट पर यह कांग्रेस की आखिरी जीत थी।
2002: चायल में बहुजन समाज पार्टी के दबदबे की शुरुआत
1996 के बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के दयाराम विजयी हुए। उन्होंने सपा के राधेश्याम भारती को 13,016 वोटों से हराया। चुनाव में दयाराम को 33,799 वोट मिले, जबकि राधेश्याम को 20,783 वोट मिले। इन चुनावों के बाद हुए 2007 और 2012 के चुनावों में भी बसपा ने चायल से जीत दर्ज करते हुए जीत की हैट्रिक लगाई।
2007 के चुनाव में इस सीट से बहुजन समाज पार्टी (BSP) के दयाराम ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने समाजवादी पार्टी के रामचंद्र को 14,960 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में दयाराम को 36,742 वोट, जबकि रामचंद्र को 21,782 वोट मिले।
2012: बसपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
इसके बाद 2012 के चुनाव हुए। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने चायल सीट पर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करते हुए जीत की हैट्रिक लगाई। चुनाव में मोहम्मद आसिफ जाफरी विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के चंद्र बली को 1,290 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोहम्मद आसिफ जाफरी को 54,796 वोट, जबकि चंद्र बली को 53,506 वोट मिले।
2017: भाजपा ने मारी बाजी
इस चुनाव की बात करें तो कौशांबी की चायल विधानसभा सीट पर 1993 के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में संजय कुमार विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के तलत अजीम को 40,116 वोटों के बड़े अंतर से हराया। संजय कुमार को 85,713 वोट, जबकि तलत अजीम को 45,597 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के मोहम्मद आसिफ जाफरी 43,776 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
1996 के चुनाव में चायल विधानसभा सीट से कांग्रेस के विजय प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के दिनेश चंद्र सोनकर को 5,308 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विजय प्रकाश को 39,763 वोट, जबकि दिनेश चंद्र सोनकर को 34,455 वोट मिले। इस चुनाव के बाद इस सीट पर कांग्रेस फिर कभी नहीं जीत पाई। चायल सीट पर यह कांग्रेस की आखिरी जीत थी।
2002: चायल में बहुजन समाज पार्टी के दबदबे की शुरुआत
1996 के बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इन चुनावों में चायल सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के दयाराम विजयी हुए। उन्होंने सपा के राधेश्याम भारती को 13,016 वोटों से हराया। चुनाव में दयाराम को 33,799 वोट मिले, जबकि राधेश्याम को 20,783 वोट मिले। इन चुनावों के बाद हुए 2007 और 2012 के चुनावों में भी बसपा ने चायल से जीत दर्ज करते हुए जीत की हैट्रिक लगाई।
2007 के चुनाव में इस सीट से बहुजन समाज पार्टी (BSP) के दयाराम ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने समाजवादी पार्टी के रामचंद्र को 14,960 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में दयाराम को 36,742 वोट, जबकि रामचंद्र को 21,782 वोट मिले।
2012: बसपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
इसके बाद 2012 के चुनाव हुए। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने चायल सीट पर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करते हुए जीत की हैट्रिक लगाई। चुनाव में मोहम्मद आसिफ जाफरी विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के चंद्र बली को 1,290 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोहम्मद आसिफ जाफरी को 54,796 वोट, जबकि चंद्र बली को 53,506 वोट मिले।
2017: भाजपा ने मारी बाजी
इस चुनाव की बात करें तो कौशांबी की चायल विधानसभा सीट पर 1993 के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में संजय कुमार विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के तलत अजीम को 40,116 वोटों के बड़े अंतर से हराया। संजय कुमार को 85,713 वोट, जबकि तलत अजीम को 45,597 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के मोहम्मद आसिफ जाफरी 43,776 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2022: सपा को मिली पहली जीत
2017 के चुनाव के बाद कौशांबी जिले की चायल विधानसभा सीट पर एक ऐसे चेहरे की एंट्री हुई, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींचा। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पूजा पाल को प्रयागराज की उनकी पारंपरिक शहर पश्चिमी सीट के बजाय कौशांबी की चायल विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा।
पूजा पाल वही नेता हैं, जिनके पति और इलाहाबाद पश्चिम सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के तत्कालीन विधायक राजू पाल की 25 जनवरी 2005 को दिनदहाड़े अंधाधुंध गोलियाँ मारकर हत्या कर दी गई थी। इस बहुचर्चित हत्याकांड का आरोप सपा के तत्कालीन सांसद अतीक अहमद, उनके भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ और उनके साथियों पर लगा था। राजू पाल और पूजा पाल की शादी इस घटना के मात्र 9 दिन पहले ही हुई थी।
2022 का चुनाव पूजा पाल के लिए चायल विधानसभा सीट पर पहला चुनाव था। उन्होंने अपना दल (सोनेलाल) के प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को 13,209 वोटों के अंतर से पराजित किया। चुनाव में पूजा पाल को 88,818 वोट और उनके प्रतिद्वंद्वी को 75,609 वोट मिले। हालांकि, कुछ समय बाद राजनीतिक मतभेद के चलते पूजा पाल को समाजवादी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं। वर्तमान में वे भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय हैं और उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है।