Chiraiya Review: ‘ये तो पति का हक है..’, इस सोच को तोड़ती है ‘चिरैया’, रिव्यू में जानें क्याें देखना है जरूरी?
Web Show Chiraiya Review: वेब शो 'चिरैया' रिलीज हो चुका है। दिव्या दत्ता इसमें प्रमुख भूमिका में नजर आई हैं। कैसा है यह शो और कितना कमाल है सितारों का अभिनय? पढ़िए इस रिव्यू में...
विस्तार
भारत में 2024 में मैरिटल रेप और मैरिटल कंसेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में हुई सुनवाई ने एक बहुत जरूरी सवाल उठाया। क्या शादी के बाद भी एक औरत की सहमति मायने रखती है? या फिर शादी के नाम पर उसकी 'ना' की कोई कीमत नहीं रहती?
हमारे समाज में आज भी इस मुद्दे पर खुलकर बात नहीं होती। इसे 'घर की बात' कहकर दबा दिया जाता है। ऐसे समय में 'चिरैया' जैसा वेब शो सामने आता है और इस चुप्पी को तोड़ने की कोशिश करती है। अभिनेत्री दिव्या दत्ता इस कहानी की जान हैं। उनके साथ प्रसन्ना बिष्ट, सरिता जोशी और बाकी कलाकार मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं।
यह माहौल किसी फिल्मी दुनिया जैसा नहीं, बल्कि हमारे आसपास के घरों जैसा लगता है। यह शो आपको हंसाने या हल्का महसूस कराने के लिए नहीं है। यह आपको सोचने पर मजबूर करती है। कई बार असहज भी करती है, क्योंकि जो दिखाया गया है, वह सच के बहुत करीब लगता है।
कहानी
कहानी लखनऊ की रहने वाली कमलेश की है। वह एक ऐसी महिला है, जो शादी के बाद अपने ससुराल में पूरी तरह ढल चुकी है। वह वही करती है, जो उससे उम्मीद की जाती है। घर संभालना, रिश्ते निभाना, चुप रहना - सब कुछ। बाहर से उसकी जिंदगी ठीक लगती है। लेकिन धीरे-धीरे पता चलता है कि यह 'ठीक' सिर्फ दिखावा है।
कहानी तब गहराती है जब उसकी देवरानी पूजा के साथ शादी की पहली रात जबरदस्ती होती है। यह सिर्फ एक घटना नहीं है। यह उस सोच को सामने लाती है, जहां औरत की इच्छा को जरूरी नहीं माना जाता। जब पूजा की बात सामने आती है, तो उसे सहारा देने के बजाय सवाल किए जाते हैं- 'ये तो पति का हक है', 'ये इतनी बड़ी बात नहीं है?', 'घर की इज्जत का क्या?'
यहीं पर सीरीज बहुत सच्चाई के साथ दिखाती है। एक औरत जब आवाज उठाती है, तो उसे सबसे पहले अपने ही लोगों से लड़ना पड़ता है। कमलेश इस बात को समझती है। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके पति के अलावा उसे अपने ही घर में कोई साथ नहीं मिलता।
कमलेश के लिए यह लड़ाई सिर्फ पूजा के लिए नहीं रहती। यह धीरे-धीरे उसकी अपनी लड़ाई बन जाती है। वह समझने लगती है कि जो चीजें वर्षों से 'नॉर्मल' मानी जा रही थीं, वे गलत हैं। सीरीज एक और जरूरी बात भी दिखाती है।
पैट्रिआर्की सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है। कई बार घर की औरतें भी उसी सोच को आगे बढ़ाती हैं। कमलेश धीरे-धीरे बदलती है। वह डरती है, कन्फ्यूज होती है, लेकिन रुकती नहीं। वह सवाल पूछना शुरू करती है। और यही इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत है - एक औरत का अपनी आवाज तक पहुंचना।
अभिनय
इस शो की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है। दिव्या दत्ता ने कमलेश के किरदार को बहुत सादगी और सच्चाई के साथ निभाया है। उनका अभिनय कहीं भी ज्यादा नाटकीय नहीं लगता। बल्कि बहुत स्वाभाविक है। उनके चेहरे के भाव, उनकी चुप्पी और उनके अंदर चल रहा संघर्ष साफ दिखाई देता है।
वह यह महसूस कराती हैं कि यह सिर्फ एक किरदार नहीं है। बल्कि कई औरतों की हकीकत है। प्रसन्ना ने पूजा के किरदार में ईमानदारी दिखाई है। उनका दर्द ऑडियंस तक पहुंचता है।
सरिता जोशी जैसी अनुभवी अभिनेत्री स्क्रीन पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। लेकिन उनका किरदार जितना मजबूत हो सकता था, उतना लिखा नहीं गया। सपोर्टिंग कास्ट भी सीरीज को मजबूत बनाती है। संजय मिश्रा अपने खास अंदाज में किरदार को गहराई देते हैं। वह स्क्रीन पर आते ही असर छोड़ते हैं।
उनके साथ सिद्धार्थ शॉ, फैसल राशिद, टीनू आनंद और अंजुम सक्सेना जैसे कलाकार अपने-अपने रोल में सटीक लगते हैं। इन सभी का अभिनय कहानी को और रियल बनाता है। इससे परिवार का माहौल असली लगता है और ऑडियंस कहानी से जुड़ पाते हैं।
निर्देशन
शशांत शाह का निर्देशन इस वेब शो की गंभीरता को बनाए रखता है। उन्होंने कहानी को बहुत सीधा और रियल तरीके से पेश किया है। कहीं भी अनावश्यक ड्रामा नहीं है। इससे विषय की गंभीरता बनी रहती है। घर का माहौल, किरदारों के बीच बातचीत और पूरी सेटिंग बहुत रियल लगती है।
हालांकि, कुछ जगहों पर इसकी गति धीमी हो जाती है। कुछ सीन लंबे लगते हैं। एडिटिंग थोड़ी और बेहतर हो सकती थी। फिर भी, यह बात सराहनीय है कि निर्देशक ने इस संवेदनशील विषय को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने इसे बैलेंस के साथ प्रस्तुत किया।
नेगेटिव पॉइंट
इसमें LGBTQ ट्रैक को शामिल किया गया है। लेकिन उसे सही तरीके से विकसित नहीं किया गया। इससे वह अधूरा सा लगता है। सरिता जोशी के किरदार को और गहराई दी जा सकती थी। इससे कहानी और मजबूत बनती।
कुछ एपिसोड में गति धीमी लगती है। इससे ऑडियंस की रुचि थोड़ी कम हो सकती है। इसके अलावा, अंत को थोड़ा और प्रभावी और स्पष्ट बनाया जा सकता था। इससे उसका असर और ज्यादा गहरा होता।
देखें या नहीं
चिरैया एक ऐसा शो है, जो हर किसी के लिए नहीं है। अगर आप हल्का-फुल्का एंटरटेनमेंट ढूंढ रहे हैं, तो यह आपको भारी लग सकती है। लेकिन अगर आप ऐसी कहानियां देखना चाहते हैं, जो समाज की सच्चाई दिखाती हैं और आपको सोचने पर मजबूर करती हैं, तो यह जरूर देखनी चाहिए।
यह आपको सहज महसूस नहीं कराती। बल्कि आपको उन सवालों के सामने खड़ा करती है, जिनसे हम अक्सर बचते हैं। कहानी साफ तरीके से यह पूछती है - क्या शादी के बाद भी एक औरत को अपनी इच्छा रखने और 'ना' कहने का अधिकार है? यही सवाल इस वेब शो को जरूरी और प्रभावशाली बनाता है।