Rudra Review: अजय देवगन ने संभाला अपराध कथा का देसी मोर्चा, ‘लूथर’ के मुकाबले मिले इतने नंबर
आदित्य बिड़ला समूह की मनोरंजन कंपनी अप्लॉज एंटरटेनमेंट ने बीबीसी स्टूडियोज के साथ मिलकर उनके चर्चित शो ‘लूथर’ को हिंदी में ‘रुद्र: द एज ऑफ डार्कनेस’ के नाम से बनाया है। सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ से बीते साल ही अपना ओटीटी डेब्यू कर चुके अभिनेता अजय देवगन अब अपना वेब सीरीज डेब्यू कर रहे हैं। अजय देवगन की मौजूदगी ही इस वेब सीरीज का चुंबक है जिसकी तरफ उनके फैंस का खिंचना तय है। सीरीज में वह एक पुलिस अफसर का किरदार निभा रहे हैं और इस तरह के किरदारों में अजय के फैंस का सबसे पसंदीदा किरदार रहा है ‘सिंघम’। रुद्र एक तरह से सिंघम के विलोम की तरह तैयार किया गया है। ये किरदार न चक्कर लगाती गाड़ी से उतरता है। न हवा में उड़कर अपराधियों को दबोचता है और न ही ये सब करते हुए परदे पर उसके पीछे धमाकों से गाड़ियां उछलती दिखती है। रुद्र का किरदार अजय देवगन के लिए लिखा गया मजबूत किरदार है। अभी इसका पहला सीजन आया है। और, पहले सीजन में ही अजय देवगन ने मामला जमाने में कामयाबी पाई है। सीरीज में बहुत जगहों पर बेहतरी की गुंजाइश है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सीरीज बनाने वाले इन्हें अगले सीजन में दूर जरूर करेंगे।
इशान त्रिवेदी, अब्बास दलाल और हुसैन दलाल ने मिलकर इदरीस एलबा को शोहरत दिलाने वाले शो ‘लूथर’ का रीमेक लिखा है। रीमेक इसलिए क्योंकि इसे अनूदित किया जाता तो इसमें हिंदुस्तान का लोक और अच्छे तरीके से पिरोया जा सकता है। वेब सीरीज ‘रुद्र: द एज ऑफ डार्कनेस’ में चूंकि पूरा फोकस इसके मुख्य किरदार डीसीपी रुद्र वीर सिंह पर है इसलिए कथा का विस्तार भी उन्हीं की परिधि में सिमटा रह जाता है। ओरीजनल और रीमेक में फर्क बस यही है कि यहां कहानी थोड़ा रफ्तार में है। हर एपीसोड में एक अपराध कथा को पूरा करने का दबाव लेखकों और निर्देशक पर साफ नजर आता है। अपराधी की देह भाषा, उसकी देह यष्टि और उसकी मनोभावनाओं का विश्लेषण दृश्यों के जरिये नहीं बल्कि रुद्र से उसके संवादों के जरिये कराया जाता है। बार बार दिखने वाले न्यूज चैनलों पर समाचार पढ़ने वाले अपने हिसाब से हिंदी और अंग्रेजी में बोलते रहते हैं, ऐसा आमतौर पर होता नहीं है। पहले सीजन में कुल छह एपीसोड हैं और हर एपीसोड की अवधि औसतन 50 मिनट रखते हुए हर एपीसोड को छोटे बजट की एक मुकम्मल फिल्म की तरह बनाने की कोशिश की गई है।
राजेश मापुस्कर निर्देशित ‘रुद्र: द एज ऑफ डार्कनेस’ का कथा विस्तार ‘लूथर’ के हिसाब से ही आगे बढ़ता है। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि वहां एक अपराध कथा को सुलझाने के लिए लूथर के पास रुद्र से ज्यादा वक्त होता है और ये कहानियां दशक भर पहले की हैं। ‘रुद्र’ 2022 की सीरीज है। कहानी का प्लॉट सेट करने के लिए पहले सीजन में चुनी गई कहानियों में बच्चेबाज कर्नल से लेकर सलेब्रिटी रक्तपिपासु और दिमागी तौर पर हिले हुए अपराधी तक ऐसे गुनहगार शामिल हैं, जिनका आमतौर पर बनने वाली अपराध कथाओं में जिक्र नहीं होता। और, इस सीरीज को लगातार देखते रहने का एक आकर्षण इस सीरीज के ये अपराधी भी हैं। इन किरदारों में के सी शंकर, हेमंत खेर और ल्यूक केनी जैसे कलाकार चमकने में कामयाब भी रहे हैं। देखा जाए तो इस सीरीज तक अजय देवगन अगर दर्शकों को खींचकर लाने में कामयाब दिख रहे हैं तो ये सीरीज लगातार देखने की वजह अपराधियों का किरदार कर रहे ये कलाकार ही बनते हैं।
वेब सीरीज ‘रुद्र: द एज ऑफ डार्कनेस’ एक शानदार सीरीज बनते बनते रह गई सीरीज भी है। और, इसकी वजह है इसके निर्देशन में इसके किरदारों का चरित्र ठीक से उभर न पाना। रुद्र की अपनी पारिवारिक कहानी दर्शकों के सामने दर्द नहीं उभर पाती है। इमारत की छत के किनारे खड़े रुद्र को देखकर दर्शकों को ये तो समझ आता है कि वह भीतर से टूटा हुआ है। लेकिन, उसकी बीवी के अपने प्रेमी के साथ रहने की कहानी का दर्द धीरे धीरे खुलता है और इसका असर कहानी पर दिखाई नहीं देता। वहीं, आलिया का किरदार भी अधपका सा लगता है। अपराधियों की तरह सोचने वाले एक पुलिस अफसर का इस शातिर दिमाग छोकरी के बीच एक रिश्ता सीरीज की कहानी बनाती चलती है लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि पटकथा को वैसा सहारा नहीं दे पाती हैं जैसी कि ऐसी सीरीज में उम्मीद रहती है। एशा देओल अगर सीरीज में निष्प्रभावी दिखती हैं तो इसमें गलती उनकी नहीं बल्कि पटकथा की है। राशि खन्ना को भी अपने अभिनय के रंग दिखाने का ज्यादा मौका ये सीरीज दे नहीं पाती है।
जय शीला बंसल, चिराग महाबल और गगन सिंह सेठी ने सीरीज की पूरी सेटिंग मुंबई की पृष्ठभूमि में होने के कारण वैसे ही संवाद लिखे हैं। ऐसे में रुद्र का किरदार एक अंदर ही अंदर कुछ न कुछ बुनते रहने वाले पुलिस अफसर का होते हुए भी ज्यादा कुछ नयापन सीरीज को दे नहीं पाता है। सीरीज में मुंबई की लोकेशंस को कथा का हिस्सा बनाने की कोशिश दिलचस्प है, लेकिन मुंबई फिल्मों और सीरीज में इतना कुछ घिस चुका है कि एक अच्छी कोशिश होने के बाद भी ये दर्शकों में खास उत्सुकता जगा नहीं पाती। मुंबई की बजाय अगर सीरीज की पृष्ठभूमि कोई हिंदी भाषी प्रदेश मसलन चंडीगढ़, जयपुर या लखनऊ रखी जाती तो इसमें नवीनता भी होती और ‘लूथर’ का असल डीएनए भी बेहतर तरीके से नई संतति को जन्म दे पाता। डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर इसके ठीक पहले रिलीज हुई सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ की लोकेशन्स ने ही दर्शकों में काफी दिलचस्पी जगाई। इस मायने में हेमंत हेमाने के कैमरे की तमाम कोशिशें भी सीरीज की अतिरिक्त मदद नहीं कर पाती हैं। कहानी कम से कम समय में पूरी करने का दबाव सीरीज की वीडियो एडीटर अंतरा लाहिड़ी पर भी दिखता है। ये सीरीज अपराध कथाएं पसंद करने वालों के लिए ही है और सीरीज शुरू होते ही अनन्या बिड़ला अपने गाने से इस बात का एलान भी करती हैं।