Maamla Legal Hai 2 Hindi Review: जज की कुर्सी पर बैठे रवि किशन, क्या इस बार रंग जमा सकी कोर्टरूम कॉमेडी?
Maamla Legal Hai 2 web series Review: रवि किशन अभिनीत वेब सीरीज ‘मामला लीगल है 2’ ओटीटी पर स्ट्रीम हो चुकी है। जानिए, कैसी है ये सीरीज?
विस्तार
साल 2024 में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ इसलिए चला था क्योंकि उसमें सब कुछ बहुत सहज था। कोर्टरूम कॉमेडी को मेकर्स ने मजेदार बना दिया था। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के छोटे-छोटे केस, पटपड़गंज कोर्ट का माहौल और ऐसे किरदार, जो थोड़े अजीब जरूर थे लेकिन नकली नहीं लगते थे।
मगर दूसरा सीजन ऐसा जादू नहीं चला सका है। मेकर्स ने इस बार कहानी का दायरा बढ़ाया है, सिर्फ केस और कॉमेडी नहीं, बल्कि सिस्टम, कुर्सी, ताकत और अदालत के अंदर के रिश्तों को भी जगह दी गई है। किरदारों के इमोशंस और आपसी रिश्तों पर भी फोकस किया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि वी.डी. त्यागी (रवि किशन) अब वकील नहीं, जज हैं। इस बार वह सिस्टम को बाहर से नहीं, अंदर से देखते हैं। यही बदलाव इस सीजन को देखने की सबसे ठोस वजह बनता है।
देखने में ‘मामला लीगल है 2’ पहले सीजन से बड़ा जरूर लगता है, लेकिन इस बार उसकी पकड़ वैसी नहीं बनती। शो कई जगह जरूरत से ज्यादा समझदार बनने की कोशिश में अपना चार्म खो देता है।
कहानी
इस सीजन का पूरा भार वी.डी. त्यागी (रवि किशन) पर है। पहले सीजन में वह ऐसे वकील थे जो अदालत के सिस्टम को समझते थे और उसी हिसाब से चलते थे। इस बार वह जज बन चुके हैं। यही बदलाव कहानी को नया एंगल देता है। वह सिर्फ फाइलें निपटाने वाले जज नहीं लगते, बल्कि अदालत को अपने तरीके से देखने और चलाने वाले शख्स लगते हैं।
इस बार भी लगभग हर एपिसोड में नया केस देखने को मिलता है, इसलिए सीरीज अपनी कोर्टरूम पहचान बनाए रखती है। दूसरी तरफ जज बने रवि किशन का अपना सिस्टम, उनका नजरिया और फैसले लेने का तरीका भी साथ-साथ चलता रहता है। शो सिर्फ केस नहीं दिखाता बल्कि उस कुर्सी के पीछे चलने वाला खेल भी सामने लाता है। यहां तक तो सीरीज पकड़ बनाए रखती है पर दिक्कत उसके बाद शुरू होती है।
इस बार केस से ज्यादा कोर्ट के अंदर के लोगों, उनकी पकड़, उनका प्रभाव और आपसी चालबाजी सीरीज की कहानी पर हावी हो जाती है। यह आइडिया कागज पर अच्छा लगता है, लेकिन स्क्रीन पर हमेशा उतना असरदार नहीं बन पाता है। कुछ एपिसोड ठीक बैठते हैं, जबकि कुछ जगह कहानी साफ तौर पर खिंची हुई लगती है।
कई सीन ऐसे हैं जो जल्दी खत्म हो सकते थे लेकिन उन्हें खींचा गया है। कुछ जगह रफ्तार गिरती है और शो थकाने लगता है। दूसरी कमी यह है कि कई मोड़ों का अंदाजा पहले ही लग जाता है। जब ऑडियंस पहले से समझ जाए कि आगे क्या होने वाला है, तो मजा आधा रह जाता है। यही ‘मामला लीगल है 2’ की सबसे बड़ी कमजोरी है।
एक्टिंग
जज बने वी.डी. त्यागी यानी रवि किशन अपने रोल से शो को संभालने की कोशिश करते हैं। उनकी आवाज, डायलॉग डिलीवरी और हाव-भाव इस किरदार को सबसे यादगार बनाते हैं।
निधि बिष्ट का ट्रैक इस बार सिर्फ सीधा-सादा नहीं रखा गया है। अंजुम बत्रा के साथ उनकी नोकझोंक, तकरार और दबा-दबा रोमांटिक एंगल उनके सीन को मजेदार बनाता है। दोनों साथ आते हैं, तो सीन में अपने आप मजा बढ़ जाता है।
नायला ग्रेवाल इस बार पहले से ज्यादा नजर आती हैं और अपने किरदार में सहज बनी रहती हैं। अनंत वी. जोशी अपनी कॉमिक टाइमिंग से कई जगह शो को हल्का करते हैं और कुछ सीन में वही राहत देते हैं जिसकी इस सीजन को जरूरत थी।
कुशा कपिला इस सीजन में वकील नैना अरोड़ा के रूप में जुड़ती हैं। उनके किरदार में कॉन्फिडेंस, स्टाइल और आक्रामकता है। वह जहां आती हैं, वहां मामला और उलझता है। विरोधी को सीधी टक्कर देने वाला उनका ट्रैक शुरुआत में मजा देता है लेकिन बाद में किरदार उतना नहीं खुलता जितनी उम्मीद बनती है।
दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ का इसमें कैमियो है और वह आते ही ध्यान खींचते हैं। उनका हिस्सा छोटा है इसलिए किरदार ज्यादा खुल नहीं पाता। दिव्येंदु भट्टाचार्य कम समय में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। कुल मिलाकर, इस बार मेकर्स ने बाकी कलाकारों को भी जगह दी है। फिर भी हर किरदार को मिला समय बराबर काम नहीं करता है। कुछ चेहरे याद रह जाते हैं, कुछ बस भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
निर्देशन
निर्देशक राहुल पांडे ने दूसरे सीजन को बिखरने नहीं दिया है। शो अपनी दुनिया में बना रहता है और कोर्ट का माहौल लगातार महसूस होता है। बस सबसे बड़ी दिक्कत इसकी गति है। कई सीन ऐसे हैं जिनका मतलब जल्दी समझ आ जाता है, लेकिन शो उन्हें पेश करने में देरी करता है। इसके चलते कई एपिसोड खिंचे हुए महसूस होते हैं। एडिटिंग थोड़ी और सख्त होती, तो यह सीजन कहीं ज्यादा असरदार बन सकता था।
लेखन
सौरभ खन्ना, करण शर्मा और अमन खान ने इस बार शो को सिर्फ केस-बेस्ड कॉमेडी तक सीमित नहीं रखा है। उन्होंने सिस्टम, कुर्सी, ताकत और कोर्ट की पॉलिटिक्स को भी कहानी का हिस्सा बनाया है। लेखन का इरादा साफ है, लेकिन उसकी धार हर जगह एक जैसी नहीं रहती।
कुछ डायलॉग और सिचुएशन काम करते हैं, जबकि कई ट्रैक पहले से समझ में आने लगते हैं। शो कई जगह एंटरटेन करता है, चौंकाता कम है। यही वजह है कि दूसरा सीजन पहले सीजन जैसी पकड़ नहीं बना पाता।
देखें या नहीं
अगर आपने ‘मामला लीगल है’ का पहला सीजन पसंद किया था, तो दूसरा सीजन भी देख सकते हैं। खासकर इसलिए क्योंकि वी.डी. त्यागी का किरदार इस बार पूरी सीरीज की जान बन जाता है। अगर आप पहले सीजन जैसी लगातार हंसी और वही ताजगी ढूंढ रहे हैं, तो इस बार कमी साफ महसूस होगी।
‘मामला लीगल है 2’ में आइडिया है, किरदार हैं और कुछ अच्छे मोमेंट्स भी हैं। यह सीजन कई जगह खिंचता है और वहीं कई जगह इसकी पकड़ ढीली पड़ जाती है। कुल मिलाकर, अगर आपको पटपड़गंज कोर्ट की दुनिया पसंद आई थी, तो यह सीजन देखा जा सकता है। बस इस बार हंसी कम और सिस्टम की खींचतान ज्यादा है।