Tu Yaa Main Review: सोशल मीडिया स्टार से सर्वाइवल तक; आदर्श-शनाया की फिल्म करती है इम्प्रेस, कुछ जगह है चूक
Tu Yaa Main Movie Review: कैसी है शनाया कपूर और आदर्शन गौरव की नई फिल्म ‘तू या मैं’? जानने के लिए पढ़िये ये रिव्यू…
विस्तार
बेजॉय नांबियार की 'तू या मैं' एक रिलेशनशिप ड्रामा से शुरू होकर सर्वाइवल थ्रिलर में बदलने वाली फिल्म है। इसमें शनाया कपूर और आदर्श गौरव मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म थाई फिल्म 'द पूल' का आधिकारिक अडैप्टेशन है, लेकिन इसे भारतीय सामाजिक और डिजिटल माहौल के हिसाब से ढाला गया है।
फिल्म की खास बात यह है कि यह सिर्फ जान बचाने की कहानी नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया इमेज, क्लास डिफरेंस और रिश्तों में पावर बैलेंस को भी साथ लेकर चलती है। फिल्म का टोन दो हिस्सों में बंटा हुआ महसूस होता है - पहला रिलेशनशिप ड्रामा और दूसरा सर्वाइवल थ्रिलर।
कहानी
कहानी अवनी शाह उर्फ ‘मिस वैनिटी’ (शनाया कपूर) और मारुति कदम (आदर्श गौरव) की है। अवनी सोशल मीडिया की दुनिया में एक स्थापित नाम है, जिसकी हर चाल उसकी ब्रांड इमेज को ध्यान में रखकर चलती है। दूसरी तरफ मारुति मुंबई के नालासोपारा से आने वाला स्ट्रगलिंग रैपर है, जो आला फ्लोपारा के नाम से परफॉर्म करता है। वह अपने टैलेंट के दम पर पहचान बनाना चाहता है। दोनों की मुलाकात एक म्यूजिक इवेंट में होती है। काम के सिलसिले में शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे रिश्ते में बदल जाती है। अवनी पहली बार मारुति की साधारण, लेकिन वास्तविक दुनिया से रूबरू होती है।
मामला तब बिगड़ता है जब उनका रिश्ता अवनी के परिवार के लिए चिंता का कारण बन जाता है। इमेज और करियर को बचाने के लिए उन्हें गोवा भेज दिया जाता है। वहीं हालात अचानक बदल जाते हैं और दोनों एक सुनसान स्विमिंग पूल में फंस जाते हैं, जहां एक मगरमच्छ भी मौजूद है। इसके बाद कहानी पूरी तरह सर्वाइवल पर आ जाती है। रिश्ते की खटास इस खतरे के बीच भी बनी रहती है, लेकिन रिलेशनशिप ड्रामा से सर्वाइवल थ्रिलर में बदलाव थोड़ा अचानक महसूस होता है।
अभिनय
आदर्श ने मारुति के किरदार में सादगी और ईमानदारी रखी है। वे किरदार को बहुत बड़ा या हीरोइक नहीं बनाते। उन्होंने नालासोपारा का लहजा सहजता से अपनाया है, जिससे किरदार विश्वसनीय बनता है। यह कोशिश कहीं-न-कहीं फिल्म 'गली बॉय' में रणवीर सिंह द्वारा पकड़े गए लोकल टोन की याद दिलाती है। हालांकि, आदर्श इसे अपनी अलग पहचान के साथ निभाते हैं। सर्वाइवल वाले हिस्से में उनका परफॉरमेंस खास तौर पर मजबूत है। वो थकान, डर और जिम्मेदारी को बैलेंस तरीके से दिखाते हैं। फिल्म के दूसरे हिस्से में उनका अभिनय कहानी को टिकाए रखता है।
शनाया अवनी के किरदार में कॉन्फिडेंस और असुरक्षा दोनों को साथ लेकर चलती हैं। वो दिखाती हैं कि एक ब्रांडेड इमेज के पीछे एक सामान्य लड़की भी है जो दबाव में टूट सकती है। इमोशनल सीन में वो असर छोड़ती हैं। हालांकि, कुछ हाई-इंटेंसिटी सीन में और मजबूती आ सकती थी। फिर भी उनका परफॉरमेंस पहले की तुलना में ज्यादा बेहतर लगता है। दोनों की केमिस्ट्री रोमांस से ज्यादा टकराव पर आधारित है। यह कहानी के हिसाब से ठीक है, लेकिन इससे भावनात्मक गहराई थोड़ी सीमित रह जाती है।
इसके अलावा क्षिति जोग, अंश विकास चोपड़ा, पारुल गुलाटी जैसे सपोर्टिंग एक्टर्स अपने-अपने रोल में दमदार काम करते दिखाई दिए।
निर्देशन
बेजॉय नांबियार ने फिल्म के सर्वाइवल हिस्से को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया है। पूल का सेटअप साफ दिखता है और ऑडियंस समझ पाती है कि खतरा कहां है। सीमित लोकेशन के बावजूद कैमरा वर्क क्लियर है। साउंड डिजाइन तनाव बनाए रखने में मदद करता है।
हालांकि, फिल्म की रफ्तार बीच में थोड़ी धीमी पड़ जाती है। कुछ सीन दोहराव जैसे लगते हैं - बार-बार कोशिशें और समान तनाव। अगर एडिटिंग थोड़ी और टाइट होती तो फिल्म और असरदार बन सकती थी। साथ ही, पहले हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने का बदलाव और सहज होता तो फिल्म ज्यादा संतुलित महसूस होती। फिर भी निर्देशन नियंत्रण में रहता है और फिल्म अनावश्यक ड्रामा से बची रहती है।
कमियां
फिल्म में थ्रिल तो है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी दिक्कत इसकी धीमी रफ्तार है। कहानी कई जगह जरूरत से ज्यादा खिंची हुई लगती है। सस्पेंस बनता है, पर उसे इतना लंबा खींच दिया जाता है कि असर कम होने लगता है। थोड़ा बोरियत महसूस होती है।
पहला हाफ ठीक से सेटअप करता है- अवनी और मारुति की मुलाकात, उनका काम, परिवार और रिलेशनशिप। यह हिस्सा एंटरटेनिंग है और आपको जोड़े रखता है। दूसरे हाफ में फिल्म पूरी तरह थ्रिलर मोड में चली जाती है। कुछ सीन सच में सीट से बांधते हैं। लेकिन कई जगह एक जैसी कोशिशें और लंबा सस्पेंस थका देता है।
सबसे बड़ी कमी यह लगती है कि पहले हिस्से की इमोशनल बिल्डअप और बाद की खतरनाक सिचुएशन के बीच मजबूत कनेक्शन नहीं बन पाता। आखरी में भी कुछ बातें अधूरी रह जाती हैं, जिससे पूरा एक्सपीरियंस थोड़ा अधूरा सा लगता है।
देखे या नहीं?
‘तू या मैं’ एक अलग तरह की कोशिश है, जो इन्फ्लुएंसर कल्चर और सर्वाइवल थ्रिलर को जोड़ती है। फिल्म की ताकत इसके लीड एक्टर्स और सीमित लोकेशन में बने तनाव में है। कमजोरी इसकी असमान रफ्तार और टोन के अचानक बदलाव में है।
कुल मिलाकर, यह एक ठीक-ठाक लेकिन दिलचस्प फिल्म है। यह पूरी तरह बैलेंस नहीं है, लेकिन अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करती है और उसी वजह से ध्यान खींचती है।