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विचार: वित्तीय अनुशासन का रोल मॉडल बनती सरकार

डॉ. शिरीष मिश्र Published by: Rahul Kumar Updated Thu, 14 May 2026 09:43 PM IST
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Fiscal Discipline Becomes UP Government’s New Identity
सीएम योगी आदित्यनाथ - फोटो : UP Gov YT Channel
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संकट केवल आर्थिक मंदी या राजस्व की कमी तक सीमित नहीं होता। संकट का अर्थ होता है, संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जनसंख्या की बढ़ती जरूरतें, अवसंरचना पर अतिरिक्त भार और वैश्विक परिस्थितियों का अनिश्चित होना। ऐसे समय में शासन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियों की नहीं, बल्कि उसके संयम की होती है। क्योंकि जब संसाधन सीमित हों और अपेक्षाएं असीमित, तब संतुलन ही सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है। संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का कोई विकल्प नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार केवल नीतियां नहीं बनाती, वह एक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं अपने आचरण में मितव्ययिता दिखाता है, तो उसका प्रभाव प्रशासनिक संरचना से लेकर आम नागरिक के व्यवहार तक फैलता है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी युद्ध से उपजे वर्तमान वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी फ्लीट में कटौती, अनावश्यक यात्राओं पर नियंत्रण और डिजिटल माध्यमों के अधिकतम उपयोग जैसे कदम उठाने का निर्णय लेकर वित्तीय अनुशासन बेहतरीन उदाहरण रखा है।  



एक नई कार्यसंस्कृति का जन्म 
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते विश्व अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार और महंगाई राज्य सरकारों के सामने संसाधनों की तंगी एक वास्तविक चुनौती बन चुकी है। ऐसी स्थिति में सरकारी खर्चों में कटौती महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों के फ्लीट में 50 प्रतिशत की कटौती, वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति को प्रोत्साहन देना, सोने की अनावश्यक खरीद को हतोत्साहित करना, पीएनजी, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग पर जोर देना, और सरकारी बैठकों, सम्मेलनों तथा सेमिनारों को वर्चुअल माध्यम से आयोजित करने की पहल इस दृष्टिकोण की परिचायक है। यह केवल धन बचाने की कवायद नहीं है, यह एक नई कार्यसंस्कृति भी है। 
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जन-विश्वास ही असली ताकत
यह सोचना भूल होगी कि ये उपाय केवल आर्थिक हैं। इनका एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम भी है। जब आम नागरिक देखता है कि उसका मुखिया सार्वजनिक परिवहन की बात करता है, तो वह अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयों को अलग नजर से देखने लगता है। जब वह जानता है कि शासन की बागडोर संभाले हाथ भी उन्हीं सिद्धांतों पर चलते हैं जो आम जन से अपेक्षित हैं, तो उसके मन में सरकार के प्रति एक विश्वास जागता है। वह विश्वास जो लोकतंत्र की असली ताकत है। मितव्ययिता जब ऊपर से शुरू होती है, तो वह नीचे तक स्वाभाविक रूप से उतरती है।  
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अब प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी
आज जब युवा पीढ़ी अपने नेताओं में आदर्श ढूंढती है, जब जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है, तब इस तरह के निर्णय एक सकारात्मक संदेश देते हैं। यह साबित होता है कि राजनीति में भी आत्म-अनुशासन संभव है। वित्तीय संकट में एक जिम्मेदार शासन वही करता है जो एक जिम्मेदार परिवार करता है, पहले खर्च घटाओ, फिर आय बढ़ाने के उपाय सोचो। हालांकि यह भी एक कड़वा सत्य है कि मुख्यमंत्री के निर्णयों की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि यह भावना पूरे प्रशासनिक तंत्र में कितनी गहराई से उतरती है। 

मितव्ययिता एक दर्शन
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मितव्ययिता का यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक उपाय नहीं है, यह एक दर्शन है, एक संस्कार है। संकट में संयम, विपत्ति में विवेक और सीमित संसाधनों में असीमित सेवा का संकल्प.... यही वह धरातल है जिस पर विश्वसनीय शासन खड़ा होता है। यही लोकतंत्र की असली शक्ति है और यही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत भी। 

(अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ. शिरीष मिश्र केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी में वाणिज्य विभाग के प्रोफ़ेसर हैं।)

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