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विचार: संवेदनशील नेतृत्व का मानवीय स्पर्श
Fri, 26 Jun 2026 06:16 PM IST
Rahul Kumar
ए.के. जैन
ए.के. जैन
Published by: Rahul Kumar
Updated Fri, 26 Jun 2026 06:16 PM IST
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
- फोटो : पीटीआई
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कुछ घटनाएं पूरे समाज की चेतना को झकझोर देती हैं और इतनी पीड़ादायी होती हैं कि उनका दंश पूरी जिंदगी भर सालता है। ऐसे में जब कोई मुख्यमंत्री शासक की अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए भी एक अभिभावक की तरह लोगों के दुःख-दर्द पर अपने मर्म भरे हाथ रखता है, तो उसमें यह भाव भी होता है कि वेदना की इस घड़ी में मैं आपके साथ हूं और यह भाव जख्मों पर शीतल मरहम की तरह लोगों का संबल बन जाता है। लखनऊ के अलीगंज में आग से जलकर 15 बच्चों की मौत ऐसी पीड़ादायक घटना है, जिसकी भरपाई तो संभव नहीं लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे समय अपनी संवेदनशीलता का जो मानवीय स्पर्श व्यथित परिजनों को दिया, वह शासन का एक जिम्मेदार चेहरा है। सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब लोगों की व्यथा में उनके साथ दिखाई देता है तो न्याय की उम्मीद भी बढ़ जाती है।
करुणा और कठोरता दोनों ही सुशासन के महत्वपूर्ण आयाम हैं। संवेदना यदि पीड़ित के घावों पर मरहम रखती है, तो कठोरता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी दोषी बचे नहीं और पीड़ितों को न्याय मिले। लेकिन, यह तभी संभव है जब नेतृत्व संवेदनशील हो। लखनऊ में जिस समय यह घटना हुई, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण चल रहा था, मंच सजा था, कार्यक्रम में उत्साह था और तभी उन्हें वह खबर मिली जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में मंच से कहा, ‘मुझे आज अलीगढ़ में रुकना था लेकिन अभी-अभी लखनऊ में एक दुखद घटना की जानकारी मिली है, जिसमें कुछ बच्चों की अग्निकांड में मृत्यु हो गई है। मैंने अधिकारियों को वहां भेजा है और स्वयं भी तुरंत लखनऊ लौट रहा हूं।’ यह एक मुख्यमंत्री के भीतर के इंसान की आवाज़ थी, जो घटना से व्यथित था और अपनी जिम्मेदारियों को जल्द से जल्द पूरा करने का आग्रही था। उनका मंतव्य समझते हुए उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक घटनास्थल पर पहुंच चुके थे और विह्वल थे।
लखनऊ पहुंचते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सीधे घटनास्थल पर गए और वहां का निरीक्षण किया। जब एक मुख्यमंत्री किसी घटना का संज्ञान लेकर खुद मैदान में उतरता है तो प्रशासनिक मशीनरी भी उतनी ही सक्रिय हो जाती है। वह घायलों को देखने केजीएमयू अस्पताल भी गए और मृतकों के परिजनों को को धीरज बंधाया। आश्वस्त किया कि दोषी किसी भी सूरत में बख्शे नहीं जाएंगे। आक्सीजन सपोर्ट पर अपना इलाज करा रही एक युवती से उन्होंने बात कर पूरी जानकारी ली। मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार की आर्थिक सहायता की घोषणा की। शाम तक यह राशि शोक संतप्त परिवारों को सौंप भी दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीएमएनआरएफ से दो-दो लाख रुपये देने का ऐलान किया। आर्थिक मदद से किसी का जीवन नहीं लौटता, लेकिन यह संदेश जरूर जाता है कि व्यवस्था उदासीन नहीं है, आपके साथ है। रात में ही रक्षामंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह भी घटनास्थल और अस्पताल पहुंच गए, जो इस बात का प्रतीक था कि चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, आपदा की स्थिति में लोगों को अकेला नहीं छोड़ती।
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राजनीति की परिभाषाएं बहुत हैं, लेकिन जब कोई राजनेता अपना कार्यक्रम बीच में छोड़कर, मंच से उठकर, दर्द की आग में जलते किसी परिवार के पास दौड़ता है और उनके आंसू पोछता है तो सारी परिभाषाएं धूमिल पड़ जाती हैं। रह जाती है सिर्फ मनुष्यता की परिभाषा। लेकिन इसके साथ ही प्रशासकीय दायित्वों का निर्वहन भी जरूरी है। आधी रात तक मुख्यमंत्री के आवास पर उच्चस्तरीय बैठकें चलती रहीं। लापरवाही बरतने वाले चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। अलीगंज थाने में छह नामजद अभियुक्तों समेत अन्य जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और अपर पुलिस महानिदेशक प्रवीण कुमार की दो सदस्यीय एसआईटी गठित की गई, जिसे सात दिनों में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया। इसका संदेश दूर तक गया। कानपुर में फिजिक्स वाला सहित 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया। प्रदेश में हर कोचिंग संस्थान जाकर इस बात की पड़ताल शुरू हो गई कि वहां बच्चों के लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं। भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए भी यह जरूरी है।
राज्य में जब भी आपदा की स्थिति आई है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता उभार पर देखने को मिली है। आंधी, आकाशीय बिजली, अतिवृष्टि या दुर्घटनाओं से प्रभावित परिवारों को समय पर राहत पहुंचे, यह उन्होंने हर बार सुनिश्चित किया है। यहां तक कि सभी जिलों के प्रभारी मंत्रियों को भी ऐसे परिवारों से मुलाकात कर उनका दुःख-दर्ट बांटने के निर्देश हैं। उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक या मानवजनित आपदा आई, मुख्यमंत्री ने अपना दफ्तर छोड़ा और स्वयं उस दर्द के पास जाकर खड़े हुए। पूर्ववर्ती शासकों से इसी भिन्नता ने उन्हें जननायक बनाया है।
अलीगंज अग्निकांड को लेकर सीएम योगी की गंभीरता का अहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अगले दिन के अपने सभी आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिए। उम्मीद है कि एसआईटी भी अपनी जांच को पूरी गंभीरता से अंजाम देकर इस अग्निकांड के लिए दोषी लोगों को कठोर दंड दिलाना सुनिश्चित कराएगी। ऐसा होने पर नियम-कानूनों की अवहेलना करने वालों और उनको प्रश्रय देने वालों तक शासन का कठोर संदेश पहुंचेगा। इससे होने वाले संभावित हादसों को भी रोका जा सकेगा, ताकि किसी और बच्चे या निर्दोष की जान न जाए।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक ए.के. जैन उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं।)
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करुणा और कठोरता दोनों ही सुशासन के महत्वपूर्ण आयाम हैं। संवेदना यदि पीड़ित के घावों पर मरहम रखती है, तो कठोरता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी दोषी बचे नहीं और पीड़ितों को न्याय मिले। लेकिन, यह तभी संभव है जब नेतृत्व संवेदनशील हो। लखनऊ में जिस समय यह घटना हुई, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण चल रहा था, मंच सजा था, कार्यक्रम में उत्साह था और तभी उन्हें वह खबर मिली जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में मंच से कहा, ‘मुझे आज अलीगढ़ में रुकना था लेकिन अभी-अभी लखनऊ में एक दुखद घटना की जानकारी मिली है, जिसमें कुछ बच्चों की अग्निकांड में मृत्यु हो गई है। मैंने अधिकारियों को वहां भेजा है और स्वयं भी तुरंत लखनऊ लौट रहा हूं।’ यह एक मुख्यमंत्री के भीतर के इंसान की आवाज़ थी, जो घटना से व्यथित था और अपनी जिम्मेदारियों को जल्द से जल्द पूरा करने का आग्रही था। उनका मंतव्य समझते हुए उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक घटनास्थल पर पहुंच चुके थे और विह्वल थे।
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लखनऊ पहुंचते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सीधे घटनास्थल पर गए और वहां का निरीक्षण किया। जब एक मुख्यमंत्री किसी घटना का संज्ञान लेकर खुद मैदान में उतरता है तो प्रशासनिक मशीनरी भी उतनी ही सक्रिय हो जाती है। वह घायलों को देखने केजीएमयू अस्पताल भी गए और मृतकों के परिजनों को को धीरज बंधाया। आश्वस्त किया कि दोषी किसी भी सूरत में बख्शे नहीं जाएंगे। आक्सीजन सपोर्ट पर अपना इलाज करा रही एक युवती से उन्होंने बात कर पूरी जानकारी ली। मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार की आर्थिक सहायता की घोषणा की। शाम तक यह राशि शोक संतप्त परिवारों को सौंप भी दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीएमएनआरएफ से दो-दो लाख रुपये देने का ऐलान किया। आर्थिक मदद से किसी का जीवन नहीं लौटता, लेकिन यह संदेश जरूर जाता है कि व्यवस्था उदासीन नहीं है, आपके साथ है। रात में ही रक्षामंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह भी घटनास्थल और अस्पताल पहुंच गए, जो इस बात का प्रतीक था कि चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, आपदा की स्थिति में लोगों को अकेला नहीं छोड़ती।
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राजनीति की परिभाषाएं बहुत हैं, लेकिन जब कोई राजनेता अपना कार्यक्रम बीच में छोड़कर, मंच से उठकर, दर्द की आग में जलते किसी परिवार के पास दौड़ता है और उनके आंसू पोछता है तो सारी परिभाषाएं धूमिल पड़ जाती हैं। रह जाती है सिर्फ मनुष्यता की परिभाषा। लेकिन इसके साथ ही प्रशासकीय दायित्वों का निर्वहन भी जरूरी है। आधी रात तक मुख्यमंत्री के आवास पर उच्चस्तरीय बैठकें चलती रहीं। लापरवाही बरतने वाले चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। अलीगंज थाने में छह नामजद अभियुक्तों समेत अन्य जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और अपर पुलिस महानिदेशक प्रवीण कुमार की दो सदस्यीय एसआईटी गठित की गई, जिसे सात दिनों में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया। इसका संदेश दूर तक गया। कानपुर में फिजिक्स वाला सहित 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया। प्रदेश में हर कोचिंग संस्थान जाकर इस बात की पड़ताल शुरू हो गई कि वहां बच्चों के लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं। भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए भी यह जरूरी है।
राज्य में जब भी आपदा की स्थिति आई है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता उभार पर देखने को मिली है। आंधी, आकाशीय बिजली, अतिवृष्टि या दुर्घटनाओं से प्रभावित परिवारों को समय पर राहत पहुंचे, यह उन्होंने हर बार सुनिश्चित किया है। यहां तक कि सभी जिलों के प्रभारी मंत्रियों को भी ऐसे परिवारों से मुलाकात कर उनका दुःख-दर्ट बांटने के निर्देश हैं। उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक या मानवजनित आपदा आई, मुख्यमंत्री ने अपना दफ्तर छोड़ा और स्वयं उस दर्द के पास जाकर खड़े हुए। पूर्ववर्ती शासकों से इसी भिन्नता ने उन्हें जननायक बनाया है।
अलीगंज अग्निकांड को लेकर सीएम योगी की गंभीरता का अहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अगले दिन के अपने सभी आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिए। उम्मीद है कि एसआईटी भी अपनी जांच को पूरी गंभीरता से अंजाम देकर इस अग्निकांड के लिए दोषी लोगों को कठोर दंड दिलाना सुनिश्चित कराएगी। ऐसा होने पर नियम-कानूनों की अवहेलना करने वालों और उनको प्रश्रय देने वालों तक शासन का कठोर संदेश पहुंचेगा। इससे होने वाले संभावित हादसों को भी रोका जा सकेगा, ताकि किसी और बच्चे या निर्दोष की जान न जाए।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक ए.के. जैन उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं।)