फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Events Coverage ›   Kanwar Yatra Sanatan Culture Historical Aspect Opinion Article news and updates

विचार: सनातन संस्कृति का अद्भुत मर्म है कांवड़ यात्रा

Mon, 03 Aug 2026 08:03 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र डॉ. शिरीष मिश्र
डॉ. शिरीष मिश्र Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 03 Aug 2026 08:03 PM IST
विज्ञापन
Kanwar Yatra Sanatan Culture Historical Aspect Opinion Article news and updates
कांवड़ यात्रा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
श्रावण मास शुरू हो चुका है और इसी के साथ उत्तर प्रदेश में भगवा वस्त्रधारी कांवड़िए सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। कंधों पर कांवड़, उसमें लटकते गंगाजल के पात्र, ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष से गूंजती सड़कें। भारतीय लोक आस्था का जीवंत दृश्य उपस्थित हो चुका है। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है,  सनातन भावनाओं का संगम है जो शिव को केंद्र में रखकर एकाकार हो उठता है। श्रद्धा-आस्था के इस पर्व का महत्व योगी सरकार समझती है और यही कारण है कि औघड़दानी के इन उपासकों के समक्ष पूरी प्रदेश सरकार नतमस्तक है। ड्रोन निगरानी से लेकर हेलीकॉप्टर से पुष्प-वर्षा तक, अस्थायी अस्पतालों से लेकर हजारों किलोमीटर मार्ग की मरम्मत तक। सत्ता के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, सामाजिक पहचान और जन आस्था प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करने का एक बड़ा मंच है। इसके निहितार्थ भी हैं। इस निहितार्थ को समझने के लिए सबसे पहले इस परंपरा की जड़ों को समझना जरूरी है।
विज्ञापन

कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई, कैसे शुरू हुई इसका उल्लेख किसी एक ग्रंथ, वेद या पुराण में सुसंगठित रूप से नहीं मिलता। यह अनेक पौराणिक आख्यानों और लोक-कथाओं के सम्मिश्रण से विकसित हुई एक सामूहिक आस्था है। सबसे प्रचलित कथा समुद्र मंथन और नीलकंठ की है। पौराणिक आख्यान के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो उसमें हलाहल नामक विष निकला, जिसकी ज्वाला से सृष्टि भस्म होने का संकट खड़ा हो गया। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष स्वयं पी लिया और कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष के प्रभाव से उनका शरीर अत्यंत तप्त हो गया था और मान्यता है कि देवताओं ने उन्हें शीतलता देने के लिए गंगाजल से अभिषेक किया। इसी विश्वास पर श्रावण मास में शिवभक्त गंगा से जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, ताकि विषपान से उत्पन्न ताप शांत किया जा सके। यह भाव भक्ति के साथ-साथ कृतज्ञता का भी प्रतीक है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रावण से जुड़ी एक कथा भी इस परंपरा के प्राचीन स्वरूप की ओर संकेत करती है। लोक-मान्यता है कि परम शिवभक्त रावण ने हरिद्वार से गंगाजल लाकर बागपत के पुरा महादेव में शिवलिंग की स्थापना कर उसका जलाभिषेक किया था। इसे कांवड़ यात्रा का सबसे प्राचीन संदर्भ माना जाता है। इसी तरह भगवान परशुराम की कथा भी जुड़ती है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। श्रवण कुमार की कथा इस यात्रा को मातृ-पितृ भक्ति और सेवा-भाव से जोड़ती है। अपने नेत्रहीन माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर तीर्थयात्रा पर ले जाने और मार्ग में गंगाजल से उनकी सेवा करने की यह कथा भले ही सीधे शिव-अभिषेक से जुड़ी न हो, फिर भी इसने कांवड़ को ‘सेवा और श्रद्धा’ का प्रतीक बना दिया। कंधे पर कांवड़ उठाना केवल जल ढोना नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण की परीक्षा माना गया। इन सभी कथाओं में एक समान सूत्र है गंगाजल की पवित्रता, शिव के प्रति अनन्य भक्ति, और कठिन तप के माध्यम से आध्यात्मिक शुद्धि की कामना।
विज्ञापन

समय के साथ जलाभिषेक की परंपरा एक संगठित सामाजिक-धार्मिक आयोजन का रूप लेती गई। स्वतंत्रता के बाद यह यात्रा सीमित संख्या में साधु-संतों और वृद्ध श्रद्धालुओं तक ही दिखाई देती थी जो शांत भाव से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते थे। सरकारों ने भी इसे एक धार्मिक कर्मकांड के रूप में ही माना। परंतु बीते एक दशक में यह यात्रा सामाजिक पहचान, सामूहिक उत्साह और धार्मिक अस्मिता का पर्याय बन गई है। आज देशभर से करोड़ों श्रद्धालु प्रतिवर्ष इसमें शामिल होते हैं, जिससे यह विश्व की सबसे बड़ी वार्षिक धार्मिक यात्राओं में गिनी जाने लगी है।

इस विशालता के पीछे एक विशिष्ट कारण है और वह यह है कि 2017 में सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे धार्मिक अस्मिता के साथ ही उत्तर प्रदेश के धार्मिक संस्कारों से जोड़ा और अपने दायित्व निर्धारित किए। श्रद्धालुओं की आवाजाही, कानून-व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, स्वास्थ्य सुविधा और सुरक्षा की दृष्टि को सरकार की जिम्मेदारी से जोड़ा। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश सरकार हर वर्ष कांवड़ मार्गों पर ड्रोन व सीसीटीवी निगरानी, अस्थायी चिकित्सा शिविर, पेयजल-शौचालय व्यवस्था, यातायात के वैकल्पिक मार्ग और भारी पुलिस बल की तैनाती जैसे इंतजाम करती है। सफाई व्यवस्था पर भी विशेष बल दिया जाता है, क्योंकि लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही से मार्गों की स्वच्छता बनाए रखना आवश्यक हो जाता है। इस स्तर की व्यवस्था का पहला और सबसे स्पष्ट निहितार्थ प्रशासनिक है। करोड़ों लोगों की जान-माल की सुरक्षा और भगदड़ या दुर्घटना जैसी आशंकाओं को रोकना राज्य का बुनियादी दायित्व है, और इस दायित्व को निभाना किसी भी सरकार के लिए अनिवार्य होता है, चाहे आयोजन धार्मिक हो या अन्य। योगी सरकार ने इस दायित्व को अंगीकार कर रखा है।

इससे आगे एक दूसरा निहितार्थ भी है, जो राजनीतिक-सामाजिक प्रकृति का है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां हिंदू आस्था और सांस्कृतिक पहचान मायने रखते हैं, वहां कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों को व्यापक समर्थन देना सनातन आस्था के संरक्षक की छवि को भी सामने रखता है। यह यात्रा बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक भावनाओं की पहचान है। एक तीसरा निहितार्थ आर्थिक और सामाजिक है। कांवड़ यात्रा मार्ग पर छोटे दुकानदारों, ढाबा संचालकों, सेवा शिविर लगाने वाले स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को इस जनसैलाब से बड़ा लाभ मिलता है। सरकार की व्यवस्थाएं परोक्ष रूप से इस अस्थायी अर्थतंत्र को भी सहारा देती हैं। सामूहिक सेवा-भाव की एक प्रवृत्ति उभरकर सामने आती है जो राज्य की पहचान बनती है।

वस्तुतः कांवड़ यात्रा भारतीय समाज की उस सामूहिक स्मृति का प्रतिबिंब है, जिसमें पौराणिक कथाएं, लोक-विश्वास और सामाजिक एकजुटता एक साथ गुंथी हुई हैं। यह यात्रा भले ही किसी एक ग्रंथ में वर्णित न हो, परंतु समुद्र मंथन से लेकर रावण, परशुराम और श्रवण कुमार तक फैली कथाओं ने इसे एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का रूप दे दिया है जहां आस्था, शासन और राजनीति एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। यहां कांवड़ यात्रा का सामाजिक निहितार्थ है और सनातन संस्कृति का अद्भुत मर्म भी।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ. शिरीष मिश्र, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में वाणिज्य विभाग के प्रोफेसर हैं।)
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed