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विचार: डीजे, रील्स और बदलती कांवड़ यात्रा में आस्था की अनवरत लौ
Wed, 12 Aug 2026 05:34 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
प्रो. रामनारायण द्विवेदी
प्रो. रामनारायण द्विवेदी
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 12 Aug 2026 05:34 PM IST
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कांवड़ लेकर जाते श्रद्धालु
- फोटो : संवाद
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कांवड़ यात्रा आज एक नए कलेवर में हमारे सामने है। परंपराएं वही हैं, हरिद्वार, गोमुख और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर शिवालयों में अर्पित करना और निभाया भी वही जा रहा है, लेकिन परिदृश्य बदला है। डीजे की धुन पर थिरकते युवा, हाईटेक सजावट से लदी कांवड़ें, बाइकों के काफिले और मोबाइल कैमरों में कैद होते पल प्रति पल। यह नया परिदृश्य है। इसे देखकर कुछ लोग यात्रा के नए स्वरूप पर सवाल उठाते हैं। उन्हें यह ठीक नहीं लगता, लेकिन क्या वाकई उनकी आपत्ति सही है? गहराई से देखें तो यह आस्था की अभिव्यक्ति का ऐसा कायाकल्प है जो वर्तमान पीढ़ी को आस्था से जोड़कर कांवड़ यात्रा की नई तस्वीर हमारे सामने रखता है।
शिव महादेव इसलिए हैं, क्योंकि वे समय के हर रूप को आत्मसात करते हैं। वे आदियोगी भी हैं और नटराज भी। संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। जिस देवता का स्वभाव ही परिवर्तनशीलता और सर्वव्यापकता है, उसकी भक्ति का स्वरूप भी हर युग में बदलता रहा है। वैदिक काल में रुद्र की उपासना जिस रूप में होती थी, वह भक्ति काल में शिव भजनों और कीर्तनों में बदल गई। आज इक्कीसवीं सदी में जब डिजिटल तकनीक हमारे जीवन के हर कोने में प्रवेश कर चुकी है, तो भक्ति की अभिव्यक्ति भी उसी माध्यम से हो रही है, जो इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है। डीजे की धुन पर ‘बम भोले’ के जयकारे लगाना दरअसल उसी उल्लास और समर्पण का विस्तार है, जो पहले ढोल-मंजीरों और लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त होता था।
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शिव महादेव इसलिए हैं, क्योंकि वे समय के हर रूप को आत्मसात करते हैं। वे आदियोगी भी हैं और नटराज भी। संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। जिस देवता का स्वभाव ही परिवर्तनशीलता और सर्वव्यापकता है, उसकी भक्ति का स्वरूप भी हर युग में बदलता रहा है। वैदिक काल में रुद्र की उपासना जिस रूप में होती थी, वह भक्ति काल में शिव भजनों और कीर्तनों में बदल गई। आज इक्कीसवीं सदी में जब डिजिटल तकनीक हमारे जीवन के हर कोने में प्रवेश कर चुकी है, तो भक्ति की अभिव्यक्ति भी उसी माध्यम से हो रही है, जो इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है। डीजे की धुन पर ‘बम भोले’ के जयकारे लगाना दरअसल उसी उल्लास और समर्पण का विस्तार है, जो पहले ढोल-मंजीरों और लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त होता था।
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आस्था और उसकी अभिव्यक्ति दो अलग-अलग चीजें हैं। आस्था अंतर्मन का विषय है जो श्रद्धा, समर्पण और विश्वास की शक्ति से एक भक्त को नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चलने का साहस देता है। अभिव्यक्ति समय, समाज और तकनीक के साथ बदलती रहती है। आज हम युवाओं को बाइक पर सवार होकर, सिर पर भगवा पगड़ी बांधे, कांधे पर कांवड़ लिए हुए, सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए देखते हैं। यह आस्था को अपने ढंग से जीने और उसे अपनी पीढ़ी की भाषा में व्यक्त करने का तरीका है। एक युवा जो इंस्टाग्राम रील बनाकर अपनी कांवड़ यात्रा साझा करता है, वह असल में अपने विश्वास को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहा है। यह आत्म-प्रदर्शन के साथ ही आत्म-घोषणा भी है कि ‘मैं शिव भक्त हूं और मुझे इस पर गर्व है।’
पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा में युवाओं की भागीदारी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। इसका गंभीर अध्ययन होना चाहिए। कॉलेज के छात्र, आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवा पेशेवर, यहां तक कि विदेश में बसे प्रवासी भारतीय भी छुट्टियां लेकर इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। यह वह पीढ़ी है जो वैश्वीकरण की उपज है, जिसकी परवरिश स्मार्टफोन और इंटरनेट के बीच हुई है और जो पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव में पली-बढ़ी है। इस पीढ़ी का पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों की ओर आकर्षित होना यह सिद्ध करता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहअस्तित्व में रह सकती हैं। यह पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी हुई नहीं है, बल्कि अपने ढंग से उनसे जुड़ने का रास्ता खोज रही है।
पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा में युवाओं की भागीदारी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। इसका गंभीर अध्ययन होना चाहिए। कॉलेज के छात्र, आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवा पेशेवर, यहां तक कि विदेश में बसे प्रवासी भारतीय भी छुट्टियां लेकर इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। यह वह पीढ़ी है जो वैश्वीकरण की उपज है, जिसकी परवरिश स्मार्टफोन और इंटरनेट के बीच हुई है और जो पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव में पली-बढ़ी है। इस पीढ़ी का पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों की ओर आकर्षित होना यह सिद्ध करता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहअस्तित्व में रह सकती हैं। यह पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी हुई नहीं है, बल्कि अपने ढंग से उनसे जुड़ने का रास्ता खोज रही है।
डीजे कांवड़ की आलोचना अक्सर अत्यधिक शोर, यातायात में बाधा और कभी-कभी होने वाली अव्यवस्था को लेकर होती है और यह चिंता वाजिब भी है। किसी भी सामूहिक धार्मिक आयोजन में अनुशासन और मर्यादा का पालन आवश्यक है, और प्रशासन तथा आयोजकों दोनों का यह दायित्व बनता है कि उत्सव का उल्लास किसी के लिए असुविधा का कारण न बने। परंतु इस व्यावहारिक चुनौती को आस्था के मूल स्वरूप में आए बदलाव से जोड़कर देखना उचित नहीं है। हर बड़े धार्मिक आयोजन में प्रबंधन की चुनौतियां रही हैं। कुंभ मेले में चुनौतियां थीं, रथ यात्रा में होती हैं और अब कांवड़ यात्रा में भी हैं। यह वस्तुतः प्रशासनिक दक्षता का प्रश्न है, आस्था की प्रामाणिकता का नहीं। सरकार ने डीजे कांवड़ के लाउडस्पीकरों की आवाज निर्धारित मानक में रखने का स्पष्ट निर्देश भी दिया है।
काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद वहां का कायाकल्प, और कांवड़ मार्गों पर बेहतर सड़कों, शिविरों, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा सुरक्षा व्यवस्था का विस्तार। यह सब दर्शाता है कि योगी सरकार धार्मिक आस्था को केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाले माध्यम के रूप में भी देख रही है। जब सरकारें धार्मिक यात्राओं को सुगम और सुरक्षित बनाती हैं, तो वे परोक्ष रूप से युवाओं की भागीदारी को भी प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि सुविधा और सुरक्षा का भरोसा ही किसी भी बड़े आयोजन में जन-भागीदारी बढ़ाने का आधार होता है।
काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद वहां का कायाकल्प, और कांवड़ मार्गों पर बेहतर सड़कों, शिविरों, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा सुरक्षा व्यवस्था का विस्तार। यह सब दर्शाता है कि योगी सरकार धार्मिक आस्था को केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाले माध्यम के रूप में भी देख रही है। जब सरकारें धार्मिक यात्राओं को सुगम और सुरक्षित बनाती हैं, तो वे परोक्ष रूप से युवाओं की भागीदारी को भी प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि सुविधा और सुरक्षा का भरोसा ही किसी भी बड़े आयोजन में जन-भागीदारी बढ़ाने का आधार होता है।
सोशल मीडिया के इस युग में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन सामूहिकता के नये स्वरूप में देखने को मिला है। पहले कांवड़ यात्रा गांव या मोहल्ले के परिचित समूहों तक सीमित होती थी। आज यह यात्रा डिजिटल माध्यमों से जुड़कर एक विशाल आभासी समुदाय का रूप ले चुकी है, जहां हजारों किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति भी लाइव स्ट्रीम के माध्यम से यात्रा से जुड़ाव महसूस करता है। यह आस्था के वैश्वीकरण का एक उदाहरण है। जो प्रवासी भारतीय अपने देश और अपनी परंपराओं से भौगोलिक रूप से दूर हैं, उनके लिए सोशल मीडिया एक सेतु का काम करता है, जिससे वे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रह सकते हैं।
यह भी तथ्य है कि कोई भी सामाजिक परिघटना पूर्णतः निष्कलंक नहीं होती। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें असामाजिक तत्वों ने कांवड़ यात्रा में घुसपैठ कर शोर-शराबा, प्रदर्शनकारी व्यवहार या अनुशासनहीनता की घटनाओं को अंजाम दिया, जिन पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी की गई। कुछ आलोचक तर्क देते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रवृत्ति कहीं न कहीं आध्यात्मिक अनुभव की गहराई को कमजोर कर रही है। यह चिंता निराधार नहीं है, और इस पर सामाजिक विमर्श होना भी चाहिए। परंतु हर धार्मिक परंपरा में समय के साथ ऐसे विचलन आते रहे हैं, और समाज स्वयं ही धीरे-धीरे संतुलन स्थापित करता है। भक्ति आंदोलन के समय भी कर्मकांडों की अतिशयता पर प्रश्न उठे थे। फिर भी उस आंदोलन ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया और आध्यात्मिकता को जन-जन तक पहुंचाया।
यह भी तथ्य है कि कोई भी सामाजिक परिघटना पूर्णतः निष्कलंक नहीं होती। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें असामाजिक तत्वों ने कांवड़ यात्रा में घुसपैठ कर शोर-शराबा, प्रदर्शनकारी व्यवहार या अनुशासनहीनता की घटनाओं को अंजाम दिया, जिन पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी की गई। कुछ आलोचक तर्क देते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रवृत्ति कहीं न कहीं आध्यात्मिक अनुभव की गहराई को कमजोर कर रही है। यह चिंता निराधार नहीं है, और इस पर सामाजिक विमर्श होना भी चाहिए। परंतु हर धार्मिक परंपरा में समय के साथ ऐसे विचलन आते रहे हैं, और समाज स्वयं ही धीरे-धीरे संतुलन स्थापित करता है। भक्ति आंदोलन के समय भी कर्मकांडों की अतिशयता पर प्रश्न उठे थे। फिर भी उस आंदोलन ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया और आध्यात्मिकता को जन-जन तक पहुंचाया।
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या डीजे, बाइक और रील्स के इस युग में शिव भक्ति की गहराई कम हुई है, या केवल उसका चोला बदला है। मेरा मानना है कि जब एक युवा चालीस डिग्री की गर्मी में, फटे पैरों के साथ, बिना थके सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गंगाजल लाता है, तो उसके भीतर की श्रद्धा असंदिग्ध है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक प्रो. रामनारायण द्विवेदी श्री काशी विद्वत परिषद के महामंत्री और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर हैं।)
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक प्रो. रामनारायण द्विवेदी श्री काशी विद्वत परिषद के महामंत्री और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर हैं।)