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विचार: 4.5 करोड़ कांवड़ यात्रियों का अकल्पनीय महाप्रबंधन
Sat, 15 Aug 2026 03:59 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
श्रीधरानंद ब्रह्मचारी
श्रीधरानंद ब्रह्मचारी
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 15 Aug 2026 03:59 PM IST
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कांवड़ यात्रा।
- फोटो : संवाद
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इस बार कांवड़ यात्रा में 4.5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अपने आराध्य का जलाभिषेक करने सड़कों पर उतरे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा अब समाप्त हो चली है लेकिन अपने पीछे छोड़ गई है वह स्मृतियां, जो वर्ष-पर्यंत याद की जाएंगी। कंधे पर बांस, बांस पर रंग-बिरंगी सजावट, सजावट के बीच लटकती छोटी-छोटी घंटियां, गंगाजल, डीजे पर बजते भोले के गीत और श्रद्धा-आस्था के इस उत्सव में उत्साहित भक्तों ने ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया जो अद्भुत, अलौकिक और अकल्पनीय होने के साथ ही हृदय पर अंकित हो जाने वाले चित्र हैं। कांवड़ मार्गों पर बढ़ते प्रभु के दीवाने इस बात के प्रतीक थे कि भक्ति जब संगठित संकल्प के साथ मिलती है, तो धरती पर साक्षात कैलाश परिक्रमा की अनुभूति होने लगती है। इस भाव को शब्दों में बांधना मुश्किल है, लेकिन शब्दों में वह यथार्थ जरूर रखा जा सकता है जो योगी सरकार ने इस यात्रा को सुगम, सुचारु और सुरक्षित बनाने के लिए किया।
भगवान शिव सिर्फ संहार के देवता नहीं। वह करुणा और वात्सल्य के भी अधिष्ठाता हैं। वे भोलेनाथ हैं, आशुतोष हैं, जो भक्त की सच्ची पुकार पर तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करते हैं ताकि सृष्टि का कल्याण हो सके। कांवड़ यात्रा की परंपरा उन्हीं नीलकंठ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है। इसी भाव में लाखों कांवड़िए नंगे पांव, कंधों पर कांवड़ लेकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। न धूप की परवाह, न वर्षा की चिंता, बस एक ही लक्ष्य, अपने आराध्य के चरणों में पवित्र जल अर्पित करना। उनकी सेवा भी पुण्य का माध्यम है और यह पुण्य कई स्तरों पर अर्जित होता है। सेवा शिविरों में पूरी तन्मयता से कांवड़ियों की सेवा करते लोग यह पुण्य लाभ हासिल करते हैं तो राज्य की मशीनरी किसी भी भक्त को कोई कष्ट न हो, यह सुनिश्चित करके पुण्य की भागीदार बनती है। पुष्प वर्षा के बीच जब कांवड़ियों का स्वागत होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान शिव के गण स्वयं धरती पर उतर आए हों।
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भगवान शिव सिर्फ संहार के देवता नहीं। वह करुणा और वात्सल्य के भी अधिष्ठाता हैं। वे भोलेनाथ हैं, आशुतोष हैं, जो भक्त की सच्ची पुकार पर तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करते हैं ताकि सृष्टि का कल्याण हो सके। कांवड़ यात्रा की परंपरा उन्हीं नीलकंठ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है। इसी भाव में लाखों कांवड़िए नंगे पांव, कंधों पर कांवड़ लेकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। न धूप की परवाह, न वर्षा की चिंता, बस एक ही लक्ष्य, अपने आराध्य के चरणों में पवित्र जल अर्पित करना। उनकी सेवा भी पुण्य का माध्यम है और यह पुण्य कई स्तरों पर अर्जित होता है। सेवा शिविरों में पूरी तन्मयता से कांवड़ियों की सेवा करते लोग यह पुण्य लाभ हासिल करते हैं तो राज्य की मशीनरी किसी भी भक्त को कोई कष्ट न हो, यह सुनिश्चित करके पुण्य की भागीदार बनती है। पुष्प वर्षा के बीच जब कांवड़ियों का स्वागत होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान शिव के गण स्वयं धरती पर उतर आए हों।
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किसी यात्रा में यदि 4.5 करोड़ से अधिक लोग शामिल हों तो उनके लिए सुरक्षित, सुव्यवस्थित और गरिमामय ढंग से सम्पन्न कराना कोई सरल कार्य नहीं है। सैकड़ों किलोमीटर लंबा मार्ग, अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों का समन्वय, यातायात प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल और स्वच्छता की व्यवस्था। इस चुनौती को प्रदेश सरकार ने जिस सहजता से निभाया और जिस तरह के प्रबंध किए, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। मार्गों की समुचित बैरिकेडिंग, ड्रोन के माध्यम से निगरानी, जगह-जगह चिकित्सा शिविर, महिला कांवड़ियों के लिए पृथक विश्राम स्थल, स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता और सुरक्षा बलों की सजग तैनाती। योगी सरकार की ओर से यह भक्ति का सम्मान था।
कांवड़ यात्रा में जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति का कोई भेद नहीं दिखता। एक मजदूर, एक व्यापारी, एक विद्यार्थी, एक अधिकारी....बम भोले के जयकारों में सबकी आवाज़ एक हो जाती है। यह दृश्य भारत की उस सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जहां आस्था सारे भेदों को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरो देती है।
कांवड़ यात्रा में जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति का कोई भेद नहीं दिखता। एक मजदूर, एक व्यापारी, एक विद्यार्थी, एक अधिकारी....बम भोले के जयकारों में सबकी आवाज़ एक हो जाती है। यह दृश्य भारत की उस सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जहां आस्था सारे भेदों को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरो देती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा खत्म हो गई है लेकिन प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में इसका क्रम बना हुआ है। प्रयागराज से जल लेकर काशी विश्वनाथ या अन्य शिवधामों को जाने वाले कांवड़िए अभी भी दिख रहे हैं। इसके साथ ही राज्य के शिवालयों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। यह सब उत्तर प्रदेश की धार्मिक अस्मिता के पुनरोत्थान की प्रतीक बन चुके हैं जहां आस्था का संयम और समर्पण से संगम है। शिव तप और संयम के प्रतीक हैं और कांवड़िए उन्ही की एक झलक हैं।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार है। लेखक श्रीधरानंद ब्रह्मचारी श्री मनकामेश्वर महादेव मंदिर, प्रयागराज के महंत और द्वारका शारदा पीठ के प्रतिनिधि हैं।)
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार है। लेखक श्रीधरानंद ब्रह्मचारी श्री मनकामेश्वर महादेव मंदिर, प्रयागराज के महंत और द्वारका शारदा पीठ के प्रतिनिधि हैं।)