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विचार: व्यवस्था से विकास का मंत्र

ए.के. जैन Published by: Rahul Kumar Updated Thu, 04 Jun 2026 10:24 PM IST
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Mantra of Development Through System
सीएम योगी आदित्यनाथ - फोटो : संवाद
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चाणक्य सूत्र में कहा गया है- ‘सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यं।’ चाणक्य ने राज्य को अर्थ का मूल कहा, क्योंकि वह जानते थे कि सुदृढ़ शासन से ही धर्म टिकता है, समृद्धि पनपती है और जन-जीवन में स्थायित्व आता है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों की यात्रा इस प्राचीन सूत्र का सबसे सजीव आधुनिक प्रमाण है। सुशासन अर्थात ‘सबका साथ-सबका विकास’ जो आज उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है। वैचारिक धरातल पर उत्तर प्रदेश में सुशासन का तात्पर्य एक ऐसे प्रवाहपूर्ण और समावेशी तंत्र से है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से ऊर्जा लेता हो और वैश्विक मानकों पर खरा उतरता हो। ऐसी ही स्थिति में व्यवस्था केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि जन-कल्याण का साधन बनती है।


 
खोखलेपन से मरती है सभ्यता
किसी भी सभ्यता का अंत तब नहीं होता, जब उस पर बाहर से आक्रमण किया जाए, वे तब मरती हैं, जब भीतर से व्यवस्था खोखली होने लगती है। जब-जब शासन में अनुशासन शिथिल हुआ, जब-जब न्याय की जगह सिफारिश ने ली, जब-जब राज्यसत्ता जनसेवा की बजाय स्वार्थ का साधन बनी, तब-तब समाज की नींव हिली, विश्वास टूटा और विकास की धारा अवरुद्ध होती रही। करीब एक दशक पहले की सरकारों का कार्यकाल देखें तो सामाजिक अराजकता के मूल में यही दिखाई देगा। देश के मानचित्र पर उत्तर प्रदेश के साथ बीमारू राज्य की संज्ञा इसीलिए दिखाई पड़ती थी। 2017 में जब योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी तो उसकी पहली आवश्यकता गहरी प्रशासनिक समझ और अदम्य इच्छाशक्ति की थी और यही सूत्र अंततः बदलाव ले भी आया।
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जब डराने वाले लगे डरने
संगठित अपराध और अपराधियों के समूह पर योगी सरकार के निर्णायक अभियान ने माफिया की कमर तोड़ी तो भय का संतुलन पलटा। जो डराते थे, वे स्वयं भयभीत हुए। अपराधियों के हौसले पस्त होने का सामाजिक प्रभाव इस भाव में स्थापित हुआ कि अब कानून की पकड़ शक्तिशाली से शक्तिशाली अपराधी तक भी पहुंचती है। इसने सामान्य नागरिक के जीवन को नई ऊर्जा दी और निवेश का ऐसा वातावरण तैयार हुआ कि अब किसी भी उद्यमी को यूपी आने में कोई हिचक नहीं।
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नई कार्यसंस्कृति का जन्म
यह भी सत्य है कि दंड व भय से सुरक्षा का भाव तो आता है, पर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन तब होता है जब शासन के अनुरूप अफसरशाही की संस्कृति बदले। प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव लाना सबसे कठिन कार्य है क्योंकि दशकों से जड़ें जमा चुकी आदतों को तोड़ना आसान नहीं। इसके लिए जरूरी था कि समयबद्ध समीक्षाएं हों, अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही हो, विभागों के प्रदर्शन का पारदर्शी मूल्यांकन हो। जब यह सब शुरू हुआ तो एक नई कार्यसंस्कृति की आधारशिला भी तैयार हुई। 

इसका एक महत्वपूर्ण पहलू तकनीक का भी रहा। तकनीक इस युग का वह दर्पण है, जिसमें शासन की सच्चाई सबसे निर्मम स्पष्टता से दिखती है। डीबीटी यानी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने एक ऐतिहासिक सत्य को व्यवहार में सिद्ध किया कि सरकारी योजनाओं का लाभ रिसते-रिसते, कटते-कटते पात्र तक पहुंचने की कोई बाध्यता नहीं, वह सीधे भी दिया जा सकता है, पूरा भी दिया जा सकता है। भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण ने उस पुरानी पीड़ा का उपचार किया जो पीढ़ियों से लोगों को अदालतों के चक्कर काटने को, वकीलों को फीस देने के लिए मजबूर कर रही थी। जब जमीन का रिकॉर्ड पारदर्शी और सुलभ हो तो ग्रामीण क्षेत्रों के मुकदमों की संख्या भी कम होती जाती है।

व्यवस्थागत बदलाव से निकली राह 
व्यवस्था ही निवेश का मार्ग प्रशस्त करती है। करों में छूट, भूमि की सुलभता के साथ ही निवेशक कानून व्यवस्था का पहलू भी देखता है। यह भी देखता है कि कहीं उसकी परियोजना अनुमोदन के लिए फाइलों में तो नहीं पड़ी रहेगी। सिंगल विंडो सिस्टम ने इस प्रक्रिया को न केवल सरल बनाया, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप की संभावना को भी सीमित करके उसे निष्पक्ष बनाया। निवेश परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी ने यह सुनिश्चित किया कि अनुमोदन मिलने के बाद भी परियोजना लालफीताशाही में न उलझे। उत्तर प्रदेश का आज देश की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी से स्थान बनाना इसी व्यवस्थागत परिवर्तन का परिणाम है। उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा बताती है कि व्यवस्था परिवर्तन ही वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत है। जब कानून का राज, पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीक साथ आते हैं, तब विकास गति पकड़ता है।  


(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक ए.के. जैन उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं।)

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