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Hindi News ›   Events Coverage ›   No Discrimination, No Recommendations: Merit Alone Is the Benchmark for Recruitment in Uttar Pradesh

विचार: यूपी में बिना भेदभाव, बिना सिफारिश, केवल योग्यता है भर्ती का पैमाना

Wed, 19 Aug 2026 02:16 PM IST
रिया दुबे हरिशंकर मिश्र
हरिशंकर मिश्र Published by: रिया दुबे Updated Wed, 19 Aug 2026 02:16 PM IST
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No Discrimination, No Recommendations: Merit Alone Is the Benchmark for Recruitment in Uttar Pradesh
अभ्यर्थी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Adobestock

किसी राज्य की नैतिक रीढ़ का पता करना हो तो एक प्रश्न का जवाब खोजिए। क्या किसी गरीब किसान के बेटे और किसी सत्ताधारी नेता के बेटे को एक ही परीक्षा में बैठने पर समानता का अवसर मिलता है? अंतिम सूची में जगह किसको मिलती है? भर्ती कराने वाली संस्था की उस खिड़की से इन प्रश्नों का जवाब मिलेगा और इसी में सरकार की पारदर्शिता, शुचिता की नींव भी दिखाई देगी। इन प्रश्नों के जवाब किसी अकादमिक जिज्ञासा को शांत नहीं करते, बल्कि इससे न्याय और अन्याय के बीच खिंची उस रेखा का पता चलता है जो यह तय करती है कि लोकतंत्र वास्तव में मेधा का सम्मान करता है या केवल निकटता का, भाई-भतीजों का और पैसे वालों का। उत्तर प्रदेश ने पर्ची-खर्ची (सिफारिश और रिश्वतखोरी) की छाया में पलती व्यवस्था से निकल कर, मेरिट को अपनी नियति खुद तय करने का अधिकार लौटाया है।

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2017 में सत्ता संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने जिस सिद्धांत को अपनी भर्ती नीति की आधारशिला बनाया, वह तीन शब्दों में समेटा जा सकता है- बिना भेदभाव, बिना सिफारिश, केवल योग्यता। भर्तियों में ठोस नीतिगत कार्रवाई दिखाई देने लगी। सबसे बड़ा और साहसिक कदम था समूह 'ग' और 'घ' के पदों से साक्षात्कार व्यवस्था को समूल समाप्त कर देना। जिस व्यवस्था ने वर्षों तक भ्रष्टाचार और पक्षपात की गुंजाइश बनाए रखी थी, उसे जड़ से हटाकर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि अब चयन का एकमात्र आधार लिखित परीक्षा में अर्जित अंक होंगे।
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पारदर्शिता को संस्थागत रूप देने के लिए सरकार ने तकनीक का व्यापक सहारा लिया। अभ्यर्थियों का बायोमीट्रिक सत्यापन, परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी से जीवंत निगरानी, प्रश्नपत्रों की डिजिटल कोडिंग और ओएमआर शीट की कंप्यूटरीकृत स्कैनिंग। ये सारे कदम मिलकर एक ऐसी दीवार खड़ी करते हैं, जिसे भेद पाना नकल माफिया और सॉल्वर गैंग के लिए पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। जहां तकनीक की दीवार को भी चुनौती देने का दुस्साहस किया गया, वहां सरकार ने कानून का डंडा उठाने में संकोच नहीं किया। 'उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) कानून' के अंतर्गत पेपर लीक करने वालों के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति कुर्की और एक करोड़ रुपये तक भारी आर्थिक दंड जैसे प्रावधान लागू किए गए। संदेश स्पष्ट था कि जो कोई भी युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करेगा, वह कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएगा।
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भर्ती के बाद की दुनिया, यानी पदोन्नति और स्थानांतरण की प्रक्रिया, भी इसी पारदर्शिता की कसौटी पर कसी गई। 'मानव संपदा पोर्टल' के माध्यम से पूरी प्रक्रिया को डिजिटल कर दिया गया। अब किसी अधिकारी या कर्मचारी की प्रोन्नति उसके दस्तावेजी प्रदर्शन पर निर्भर करती है, न कि किसी गलियारे में की गई सिफारिश पर। यह बदलाव छोटा नहीं है, यह प्रशासनिक संस्कृति के डीएनए में बदलाव है। आंकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। बीते वर्षों में पुलिस विभाग, बेसिक और माध्यमिक शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा अन्य अधीनस्थ सेवाओं में लाखों युवाओं को बिना किसी वित्तीय लेनदेन या सिफारिश के, केवल मेधा के आधार पर नियुक्ति पत्र सौंपे गए हैं। 


व्यवस्था को पूरी तरह चाक-चौबंद बनाना एक सतत प्रक्रिया है, एक बार का काम नहीं। यह प्रक्रिया जारी है। फर्क यह है कि जहां पहले ऐसी घटनाएं व्यवस्था की स्थायी कमजोरी का प्रतीक बन जाती थीं, वहीं अब वे कठोर कानूनी कार्रवाई और और अधिक सख्त सुरक्षा उपायों की शुरुआत बनती हैं। 

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक हरिशंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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