Opinion: ‘लखपति दीदी’ से डिजिटल उद्यमी तक - यूपी में नारी सशक्तिकरण की लिखी जा रही नई कहानी
नारी केवल सृजन की प्रतीक नहीं, बल्कि शक्ति, संस्कार और समृद्धि की आधारशिला है। जब नारी सशक्त होती है, तो परिवार सशक्त होता है, समाज सशक्त होता है और अंततः राष्ट्र सशक्त बनता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति को मानना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि नारी शक्ति राष्ट्र की प्रगति की आधारशिला है और उनकी इस सोच को उत्तर प्रदेश में विस्तार मिलता दिखाई देता है, जहां नारी सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक लक्ष्य नहीं, बल्कि सुशासन और विकास की मूल धारा बन चुका है। लखपति दीदी से लेकर डिजिटल उद्यमी तक डबल इंजन सरकार में विभिन्न प्रयासों में इसकी झलक दिखती है।
विकास की सक्रिय भागीदार बन रही महिलाएं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि ‘आधी आबादी’ केवल कल्याण की पात्र न रहे, बल्कि विकास की सक्रिय भागीदार बने। शिक्षा, सुरक्षा और स्वावलंबन- इन तीन आयामों पर केंद्रित नीतियों ने महिलाओं के जीवन में व्यापक बदलाव तो किया ही है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों से लेकर मिशन शक्ति, स्वयं सहायता समूहों के विस्तार और रोजगार सृजन की योजनाओं तक हर स्तर पर महिलाएं अपनी अलग पहचान बना रही हैं। उत्तर प्रदेश में यह परिवर्तन केवल नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें नारी को ‘शक्ति’ और ‘सहभागिता’ दोनों के रूप में स्वीकार किया गया।
आर्थिक सशक्तिकरण: जब महिला बनती है परिवर्तन की धुरी
एक महिला जब आर्थिक रूप से सशक्त होती है तो उसका प्रभाव सिर्फ उसे आत्मनिर्भर ही नहीं बनाता, बल्कि वह पूरे परिवार के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की शक्ति बन जाती है और समाज और राष्ट्र की समृद्धि का आधार भी बन जाती है। घर की व्यवस्था से लेकर बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की योजना तक- एक आत्मनिर्भर महिला अपने परिवार के हर पहलू को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगती है। इसी सोच से उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिला सशक्तिकरण को विकास के केंद्र में रखा और आज जाने कितनी महिलाएं लखपति दीदी में परिवर्तित होकर नारी स्वाभिमान का प्रतीक बन गई हैं।
आज यह दृश्य किसी भी गांव में देखने को मिल सकता है कि स्मार्ट फोन लिए एक युवती किसी ग्रामीण किसान को उसके बैंक खाते की जानकारी दे रही है। यह पूरे गांव की बैंक है। दादी को पेंशन दिलाती है, बुजुर्ग किसान का पैसा उसके हाथ में पहुंचाती है, और लौटते वक्त अपने मोबाइल पर कमीशन की रसीद देखकर चुपचाप मुस्कुराती है। यह मुस्कान किसी प्रचार की मोहताज नहीं, यह बदलाव की जीती-जागती गवाही है।
सुरक्षा से आत्मविश्वास तक: बदली हुई सामाजिक तस्वीर
कोई भी समाज तब तक प्रगति नहीं कर सकता, जब तक उसकी आधी आबादी डर के साये में जी रही हो। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा एक गंभीर प्रश्नचिह्न था। बेटियां स्कूल छोड़ देती थीं, महिलाएं नौकरी के सपने मन में ही दफन कर देती थीं। सपने थे, हौसला था, काबिलियत भी थी, पर अवसर नहीं थे, और सुरक्षा तो और भी नहीं। इस भय के अंत के बिना महिलाओं का आत्मविश्वास जागृत नहीं किया जा सकता था, इसलिए योगी सरकार ने मिशन शक्ति को एक व्यापक सामाजिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाया। एंटी रोमियो स्क्वॉड ने उन असामाजिक तत्वों पर लगाम लगाई जो बेटियों की राह में रुकावट बनते थे। महिला अपराधों के मामलों में 98.60 प्रतिशत निस्तारण दर के साथ उत्तर प्रदेश पूरे देश में पहले स्थान पर है तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं, यह सुरक्षा का अहसास है।
स्वयं सहायता समूह: गांव बने आर्थिक क्रांति की धुरी
उत्तर प्रदेश के गांवों में एक मूक क्रांति हो रही है। इसकी आवाज कोई नारेबाजी नहीं, बल्कि सिलाई मशीन की घर-घर की आवाज है, मिट्टी के बर्तनों की थाप है और डिजिटल लेनदेन की पिंग है। “लखपति दीदी” जैसी पहल ने इस परिवर्तन को नई दिशा दी है, जिसके तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनकी आय एक लाख रुपये या उससे अधिक तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 96 लाख से अधिक परिवारों की महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों में शामिल किया गया है। ये महिलाएं अब केवल परिवार नहीं चला रहीं, अर्थव्यवस्था बना रही हैं। छोटे-छोटे कामों के सहारे लखपति दीदी बन रही हैं। दो लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी की सूची में हैं। बैंकिंग सखी के रूप में 40 हजार महिलाओं ने अब तक 40 हजार करोड़ से अधिक का लेन-देन गांवों तक पहुंचाया है। सरकार ने कोई एक राह नहीं खोली। जाने कितनी योजनाएं महिलाओं का संबल हैं। कृषि आजीविका सखी तो खेतों में नई चेतना का प्रतीक है। इस रूप में वे नवाचार की वाहक बनी हुई हैं।
प्रशिक्षित होकर वे प्राकृतिक खेती, पोषण वाटिका, पशु पालन, जैविक खेती आदि के बारे में किसानों को जानकारियां बांट रही हैं। सूर्य सखी के रूप में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं तलाश ली हैं और यह साबित किया है कि तकनीकी क्षेत्र में वह पुरुषों की बराबरी करने में सक्षम हैं। सूर्य सखियां ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तिकरण की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके तहत महिलाओं को सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरणों जैसे सोलर लैंप और पैनलों की जानकारी, स्थापना, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जाता है। 57 हजार से अधिक सूर्य सखियां प्रदेश की ग्राम पंचायतों में नई रोशनी होंगी। ड्रोन दीदियों ने तो आत्मविश्वास की वह उड़ान ली है, जो बेमिसाल है। डिजिटल युग में सशक्तिकरण का अर्थ केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार ने महिलाओं को डिजिटल साक्षरता और कौशल विकास से जोड़ने के लिए भी कई पहलें की हैं ताकि आधुनिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप वे स्वयं को तैयार कर सकें।
नीतियां और भविष्य: अवसरों का विस्तार
योगी सरकार ने भविष्य की राह भी तय कर दी है। हाल ही में पेश किए उत्तर प्रदेश के बजट में डिजिटल इंटरप्रेन्योर योजना की बात कही गई है, जिसमें 8000 न्याय पंचायतों में डिजिटल उद्यमी का चयन किया जाएगा। इन उद्यमियों में 50 फीसदी महिलाएं होंगी, जो उसी न्याय पंचायत की बेटी-बहू होंगी। यूपी में स्वयं सहायता समूहों से एक करोड़ महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इनके उत्पादों को न्याय पंचायतों से जोड़ा जाएगा। इसमें 100 फीसदी महिलाएं होंगी। उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही बालिकाओं को स्कूटी उनके आत्मविश्वास का प्रतीक है। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन’ योजना को भी महिला उद्यमिता सशक्तिकरण से जोड़ा जाएगा।
बदलती दिशा, बढ़ता आत्मविश्वास
समाज के इतिहास में ऐसे क्षण कम ही आते हैं जब किसी राज्य की आधी आबादी अपने भीतर छिपी क्षमता को पहचानकर विकास की धारा में पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती है। उत्तर प्रदेश में आज वही परिवर्तन दिखाई दे रहा है। जो महिलाएं कभी सामाजिक और आर्थिक सीमाओं में बंधी थीं, वे अब आत्मनिर्भर बनकर न केवल अपने परिवार का संबल बन रही हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। अवसरों की कमी जो कभी महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा थी, वह धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। निस्संदेह अभी भी चुनौतियां शेष हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों को और व्यापक बनाना होगा, सामाजिक रूढ़ियों को और कमजोर करना होगा और महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में और अधिक भागीदारी देनी होगी। लेकिन, यह भी उतना ही सत्य है कि दिशा बदल चुकी है और यात्रा आगे बढ़ रही है।
(डॉ. श्रद्धा अवस्थी दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू इवनिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)