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विचार: आस्था से अर्थव्यवस्था तक का रोडमैप है कांवड़ यात्रा
Tue, 11 Aug 2026 03:51 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
अजय गुप्ता
अजय गुप्ता
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 11 Aug 2026 03:51 PM IST
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कांवड़ यात्रा।
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भगवा वस्त्रों में लिपटे लाखों कंधे, कंधों पर सजी बांस की कांवड़ें, ‘बोल बम’ के जयघोष के बीच आगे बढ़ता जन सैलाब....वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा, और छोटे-छोटे वे धार्मिक स्थल जो आज धार्मिक पर्यटन के जरिये उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को संबल दे रहे हैं, कांवड़ यात्रा उसी की एक कड़ी है। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस यात्रा को वैश्विक रूप देने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए हैं तो इसके पीछे उनकी उत्तर प्रदेश को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी के लक्ष्य तक ले जाने की सोच है।
लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की 2024 की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, कांवड़ यात्रा उत्तर प्रदेश में लगभग एक हज़ार करोड़ रुपये यानी दस अरब से अधिक का कारोबार उत्पन्न करती है। 2017 के बाद से राज्य में कांवड़ यात्रियों की संख्या में तेज वृद्धि के साथ-साथ होटल, ढाबे, परिवहन, टेंट, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का बाजार भी लगातार आगे बढ़ा है।
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लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की 2024 की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, कांवड़ यात्रा उत्तर प्रदेश में लगभग एक हज़ार करोड़ रुपये यानी दस अरब से अधिक का कारोबार उत्पन्न करती है। 2017 के बाद से राज्य में कांवड़ यात्रियों की संख्या में तेज वृद्धि के साथ-साथ होटल, ढाबे, परिवहन, टेंट, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का बाजार भी लगातार आगे बढ़ा है।
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बाजार सूत्रों के मुताबिक इस सावन कांवड़ यात्रा से लगभग पंद्रह सौ करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि को गति मिलने की संभावना है। यमुनानगर के रेलवे रोड पर दुकान चलाने वाले एक व्यापारी बताते हैं कि लगातार हो रही बारिश के कारण इस मौसम में रेनकोट और चप्पलों की मांग अचानक बढ़ जाती है। साथ ही गर्मी और उमस के चलते बोतलबंद पानी, बर्फ और ग्लूकोज की बिक्री भी बढ़ जाती है। ऐसे ही दवा व फल व्यापारियों और छोटी दुकाने चलाने वालों का अनुभव है। आस्था का यह प्रवाह हर वर्ग के व्यापारी गल्ले तक अपनी बूंदें पहुंचा रहा है।
कांवड़ यात्रा में पूजा-सामग्री और परिधान बाजारों में भी अलग रौनक है। दुकानदारों के अनुसार महादेव से जुड़े संदेशों वाली भगवा टी-शर्ट, गमछे और वाटरप्रूफ मोबाइल कवर की मांग हर वर्ष की तुलना में इस बार अधिक तेजी से बढ़ी है। अस्सी से पांच सौ रुपये तक की कीमत वाली महादेव के स्लोगन वाली टी-शर्ट्स विशेष रूप से युवा कांवड़ियों में लोकप्रिय है। जलाभिषेक में प्रयुक्त होने वाले सजावटी स्टील कलशों की मांग में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ढाबा और खानपान उद्योग को इस यात्रा में सबसे बड़ा लाभ मिल रहा है। सामान्य दिनों में जो श्रमिक छोटी-मोटी दिहाड़ी पर निर्भर रहता है, वही कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करके छह सौ रुपये तक प्रतिदिन कमा लेता है। साथ ही उसे दो वक्त का भरपेट भोजन भी सहज उपलब्ध हो जाता है। परिवहन क्षेत्र भी इसी अनुपात में सक्रिय होता है। मुजफ्फरनगर डिपो से ही हरिद्वार मार्ग पर साठ रोडवेज बसों का नियमित संचालन होता है, और यात्रा के मौसम में इस संख्या को और बढ़ाने की योजना पर काम किया जाता है, ताकि लाखों श्रद्धालुओं को कोई असुविधा न हो। यह पूरा तंत्र दर्शाता है कि एक धार्मिक आयोजन किस तरह परिवहन निगम से लेकर अंतिम पंक्ति के मज़दूर तक, हर स्तर पर रोजगार की एक श्रृंखला खड़ी कर देता है।
कांवड़ यात्रा में पूजा-सामग्री और परिधान बाजारों में भी अलग रौनक है। दुकानदारों के अनुसार महादेव से जुड़े संदेशों वाली भगवा टी-शर्ट, गमछे और वाटरप्रूफ मोबाइल कवर की मांग हर वर्ष की तुलना में इस बार अधिक तेजी से बढ़ी है। अस्सी से पांच सौ रुपये तक की कीमत वाली महादेव के स्लोगन वाली टी-शर्ट्स विशेष रूप से युवा कांवड़ियों में लोकप्रिय है। जलाभिषेक में प्रयुक्त होने वाले सजावटी स्टील कलशों की मांग में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ढाबा और खानपान उद्योग को इस यात्रा में सबसे बड़ा लाभ मिल रहा है। सामान्य दिनों में जो श्रमिक छोटी-मोटी दिहाड़ी पर निर्भर रहता है, वही कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करके छह सौ रुपये तक प्रतिदिन कमा लेता है। साथ ही उसे दो वक्त का भरपेट भोजन भी सहज उपलब्ध हो जाता है। परिवहन क्षेत्र भी इसी अनुपात में सक्रिय होता है। मुजफ्फरनगर डिपो से ही हरिद्वार मार्ग पर साठ रोडवेज बसों का नियमित संचालन होता है, और यात्रा के मौसम में इस संख्या को और बढ़ाने की योजना पर काम किया जाता है, ताकि लाखों श्रद्धालुओं को कोई असुविधा न हो। यह पूरा तंत्र दर्शाता है कि एक धार्मिक आयोजन किस तरह परिवहन निगम से लेकर अंतिम पंक्ति के मज़दूर तक, हर स्तर पर रोजगार की एक श्रृंखला खड़ी कर देता है।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यापार की निरंतरता के बीच एक संतुलित व्यवस्था जरूरी है। सरकार का सुनियोजित माइक्रो प्लान इस विशाल अस्थायी अर्थव्यवस्था को दिशा देने का काम करता है। यह एक ऐसा खाका है जो आस्था और आर्थिकी दोनों को साथ लेकर चलता है। अब कांवड़ यात्रा एक संगठित, सुरक्षित और आर्थिक रूप से उत्पादक आयोजन के रूप में बदला सुनियोजित मॉडल है। यह मॉडल उत्तर प्रदेश सरकार के उस व्यापक धार्मिक पर्यटन दृष्टिकोण का ही एक विस्तार है, जिसके अंतर्गत 'विजिट माय स्टेट' अभियान के तहत सुगम दर्शन योजना जैसी पहल के माध्यम से अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट और विंध्याचल जैसे धार्मिक केंद्रों को नियमित वीकेंड यात्रा पैकेजों से जोड़ा गया है।
कांवड़ यात्रा के साथ ही उत्तर प्रदेश उस बड़े लक्ष्य से भी गहराई से जुड़ता है, जिसके तहत राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लिया गया है। कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों से बिना किसी बड़े पूंजीगत निवेश के, केवल जन आस्था और सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र के बल पर भी हज़ारों करोड़ रुपये का आर्थिक चक्र गतिमान किया जा सकता है। छोटे दुकानदार, फुटकर विक्रेता, ढाबा मालिक, परिवहन संचालक और असंगठित क्षेत्र के मजदूर, इन सभी तक यह लाभ पहुंचता है। जब सरकार का सुव्यवस्थित माइक्रो प्लान आस्था को सुरक्षा और सुविधा का संबल देता है, तो यह प्रवाह और भी शक्तिशाली होकर समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक अजय गुप्ता संयुक्त व्यापार संघ, मेरठ के अध्यक्ष हैं।)
कांवड़ यात्रा के साथ ही उत्तर प्रदेश उस बड़े लक्ष्य से भी गहराई से जुड़ता है, जिसके तहत राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लिया गया है। कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों से बिना किसी बड़े पूंजीगत निवेश के, केवल जन आस्था और सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र के बल पर भी हज़ारों करोड़ रुपये का आर्थिक चक्र गतिमान किया जा सकता है। छोटे दुकानदार, फुटकर विक्रेता, ढाबा मालिक, परिवहन संचालक और असंगठित क्षेत्र के मजदूर, इन सभी तक यह लाभ पहुंचता है। जब सरकार का सुव्यवस्थित माइक्रो प्लान आस्था को सुरक्षा और सुविधा का संबल देता है, तो यह प्रवाह और भी शक्तिशाली होकर समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक अजय गुप्ता संयुक्त व्यापार संघ, मेरठ के अध्यक्ष हैं।)