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नोएडा हिंसा: विकास की राह में षड्यंत्र का जाल

के.पी. सिंह Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 23 Apr 2026 08:08 PM IST
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Uttar Pradesh Noida Violence Labours KP Singh Ex DGP Development and Industries UP
नोएडा में उग्र प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला
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कोई राज्य जब प्रगति की राह पर तेजी से आगे बढ़ने लगता है, तो कुछ ताकतें उसकी रफ्तार रोकने के लिए सक्रिय हो जाती हैं। आज उत्तर प्रदेश, और विशेष रूप से नोएडा, इसी षड्यंत्र का शिकार होता दिख रहा है। सवाल उठता है, क्या यह महज संयोग है या एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा? इसके लिए यूपी की बढ़ती आर्थिकी को केंद्र में लाना होगा। उत्तर प्रदेश के आसमान में इस वक्त दो चीजें एक साथ उड़ान भर रही हैं, एक है जेवर की धरती से आकार ले रहा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और दूसरा है गंगा एक्सप्रेसवे जो निवेशकों के लिए उद्योगों की राह प्रशस्त करने जा रहा है। यक्ष प्रश्न यह है कि नोएडा में श्रमिकों का असंतोष ऐसे ही समय में मुखर क्यों हुआ? क्या यह अचानक उबले गुस्से की परिणति थी? इसकी पृष्ठभूमि बताती है कि ऐसा नहीं। यह एक सोची-समझी, बहुस्तरीय और वर्षों से पकाई जा रही साजिश का हिस्सा थी, जिसका एकमात्र लक्ष्य था उत्तर प्रदेश की छलांग लगाती अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारना।
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 'मजदूर बिगुल' जैसे संगठनों की भूमिका गंभीरता से देखी जानी चाहिए। यह संगठन किन विचारधाराओं से जुड़ा है? इसके तार किन राज्यों तक जाते हैं? ये सवाल केवल राजनीतिक जिज्ञासा से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। जब जेवर हवाई अड्डे के निर्माण स्थल के पास असंतोष फैलाने वाले लोगों का पश्चिम बंगाल से कनेक्शन सामने आता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है-‘क्या यह आंदोलन सहज है, क्या इसे किसी ने बाहर से हवा दी है?’
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पहले भी, जब-जब प्रदेश में बड़े निवेश की बात हुई, तब-तब कोई न कोई विवाद खड़ा किया गया। नारे अलग-अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक ही था,  निवेशकों में भय पैदा करना, उद्योगों को रोकना और सरकार को कठघरे में खड़ा करना। षड्यंत्र की इस पूरी परतों को समझने के लिए कुछ बिंदुओं पर गौर करना जरूरी है। पहला है टाइमिंग...जब भी प्रदेश में कोई बड़ा निवेश सम्मेलन हो, या कोई अंतरराष्ट्रीय परियोजना पर हस्ताक्षर होने वाले हों, ठीक उसी समय कोई न कोई 'घटना' नोएडा में क्यों होती है?  दूसरा है इसमें लिप्त संगठन। जो लोग यह असंतोष फैला रहे हैं, उनके पास संसाधन कहां से आते हैं? एक गरीब मजदूर के नाम पर जो आंदोलन खड़ा होता है, उसमें प्रिंटेड बैनर, सोशल मीडिया अभियान और मीडिया कवरेज इतनी तत्परता से कैसे मिलती है? तीसरा है राजनीतिक कनेक्शन। इन सवालों के जवाब अहम हैं। 

यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है, डेटा की राजनीति। आजकल झूठे या भ्रामक आंकड़ों का इस्तेमाल करके माहौल बनाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कहां से शुरुआत हुई, किसने पहला पत्थर फेंका, यह पता करना कठिन होता है लेकिन, असंभव नहीं है। जांच में सामने आया कि मुख्य आरोपित आदित्य आनंद जिसे तमिलनाडु से गिरफ्तार किया गया, वह पिछले पांच वर्षों से इस षड्यंत्र की नींव रख रहा था। वर्ष 2022 में वह 'मजदूर बिगुल दस्ता' नामक कट्टर वामपंथी संगठन से जुड़ा और उसके बाद से फैक्टरियों का डेटा, मजदूरों के ठिकाने, श्रमिक बस्तियों की मानचित्र-रेखाएं,  सब कुछ व्यवस्थित रूप से इकट्ठा करता रहा। 17 से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए, अफवाहें फैलाई गईं। उकसावे के संदेश वायरल किए गए। साफ है कि यह कोई सड़क का आंदोलन नहीं था, यह एक ऑपरेशन था।

उत्तर प्रदेश के 'आर्थिक प्रवेश द्वार' नोएडा में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर राज्य की निवेश छवि पर पड़ता है। जेवर एयरपोर्ट, फिल्म सिटी, डेटा सेंटर हब और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर,  इन सबके मिलने से उत्तर प्रदेश विश्व के निवेश मानचित्र पर एक नई और दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है। सैमसंग, विवो, माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक कंपनियां यहां अरबों रुपये लगा रही हैं। विचार कीजिए अगर निवेशकों में हिचक पैदा होती है, तो सबसे पहले नुकसान किसे होगा? उसी मजदूर को जिसके नाम पर यह खेल खेला जा रहा है। 

अब एक बड़ा प्रश्न- क्या इस सबके पीछे अंतरराष्ट्रीय हाथ हो सकता है? यह सुनने में अतिरंजित लग सकता है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा का खेल बहुत जटिल होता है। कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनसे जुड़े 'एनजीओ' और 'थिंक टैंक' उन देशों और राज्यों में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करते हैं जो उनके व्यापारिक हितों के लिए खतरा बन सकते हैं। इतिहास से सबक लिया जाना चाहिए। जब 1970 और 80 के दशक में पश्चिम बंगाल में इसी तरह के 'घेराव' और 'उग्र आंदोलन' चले, तो टाटा और बिड़ला जैसे दिग्गज उद्योग घराने बंगाल छोड़कर चले गए। आज वह राज्य उस औद्योगिक पतन की कीमत अभी भी चुका रहा है। कानपुर का उदाहरण भी सामने है जो कभी पूरब का मैनचेस्टर था, ऐसे ही आंदोलनों से अपनी छवि खो बैठा। 

यहां यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि असली मजदूरों की समस्याएं वास्तविक हैं और उन्हें नजरअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर किसी श्रमिक के साथ अन्याय हो रहा है, तो सरकार का दायित्व है कि वह उसका निवारण करे। लेकिन, जब किसी 'आंदोलन' में असली मजदूर कम और पेशेवर 'आंदोलनकारी' ज्यादा हों, जब उसकी फंडिंग संदिग्ध स्रोतों से हो, जब उसकी टाइमिंग राजनीतिक रूप से संदेहास्पद हो, तब समाज को सावधान रहना चाहिए। हर नागरिक को यह पूछना चाहिए, जो मेरे नाम पर आंदोलन कर रहा है, वह वास्तव में मेरा हितैषी है या किसी और का एजेंट?

सरकार का भी दायित्व है। केवल विकास करना पर्याप्त नहीं- विकास की कहानी को सही तरीके से समाज तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। षड्यंत्रों का जवाब पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। जांच एजेंसियों को उन संगठनों और व्यक्तियों के तार खोलने चाहिए जो राज्य की आर्थिक प्रगति में बाधा डालने का काम कर रहे हैं। कानून के दायरे में रहते हुए ऐसे तत्वों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अंत में, एक बुनियादी सवाल....क्या हम एक ऐसे समाज और राष्ट्र के रूप में परिपक्व हो रहे हैं जो विकास और षड्यंत्र के बीच फर्क कर सके? इसका जवाब अपने भीतर ही खोजना होगा।

(यह लेखक केपी सिंह के निजी विचार हैं। लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक हैं।)
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