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ओपिनियन: भ्रष्टाचार और कुशासन की देन है मेरठ सेंट्रल मार्केट का ध्वस्तीकरण

इवेंट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 22 Apr 2026 01:39 PM IST
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Uttar Pradesh Meerut Central Market Property Demolition Shopping Complex to Hospital and Banks Case Complaints
मेरठ का सेंट्रल मार्केट का वह कांप्लेक्स, जिसे लेकर इस विवाद की शुरुआत हुई थी। - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ का शास्त्री नगर स्थित सेंट्रल मार्केट एक समय शहर का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र रहा, लेकिन आज यह अवैध निर्माणों, राजनीतिक संरक्षण और लंबे कानूनी विवाद का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद यहां 44 अवैध व्यावसायिक इकाइयों की सीलिंग और सैकड़ों अन्य संपत्तियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई तेज हो गई है। यह कार्रवाई कोई अचानक फैसला नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की परिणति है।
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1980 के दशक के अंत में आवास विकास विभाग ने इस क्षेत्र में आवासीय प्लॉट आवंटित किए थे। लेकिन कुछ ही वर्षों में इन प्लॉटों पर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक निर्माण शुरू हो गए-दुकानें, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, अस्पताल, स्कूल और बैंक तक बन गए। 1990 के आसपास ही शिकायतें और मुकदमे शुरू हुए, लेकिन उस समय की सरकारों ने इन अनियमितताओं पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
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योगी सरकार के दिए विकल्पों पर नहीं बनी सहमति
योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रभावित व्यापारियों से मुलाकात कर तीन विकल्प प्रस्तुत किए। 

1. सरकार के साथ पक्षकार बनकर न्यायालय में मजबूत लड़ाई लड़ना।
2. आवास विकास विभाग के निर्धारित कंपाउंडिंग शुल्क जमा कर नियमितीकरण का रास्ता अपनाना।
3. सुप्रीम कोर्ट के संभावित रुख को देखते हुए बाजार छोड़कर सरकार की पुनर्वास योजना स्वीकार करना, जिसमें राज्य सरकार पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार थी।

इन विकल्पों पर सहमति नहीं बन सकी। व्यापारियों और अन्य पक्षों में मतभेद रहे, जिससे मामला पूरी तरह अदालत पर निर्भर हो गया।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख 
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार 'रूल ऑफ लॉ' पर जोर देते हुए अवैध निर्माण हटाने और सेटबैक क्षेत्र साफ करने का आदेश दिया। अदालत ने अधिकारियों को फटकार लगाई जब उन्होंने 'जन आक्रोश' या मास्टर प्लान संशोधन के बहाने कार्रवाई रोकी। 2025-2026 में सुनवाइयों के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अवैध निर्माण कितने भी पुराने हों, उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता। ऐसे में योगी सरकार के सामने कानूनी आदेश का पालन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। सरकार ने स्पष्ट किया कि वह कानून का सम्मान करती है, लेकिन प्रभावित व्यापारियों को अधिकतम राहत देने के लिए प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर हर संभव प्रयास जारी रखे हुए है। सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अब अनिवार्य हो गई है।

भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा ढांचा टिक नहीं सकता 
यह पूरा प्रकरण कानून के शासन की जीत है, लेकिन साथ ही पूर्ववर्ती सरकारों के कुशासन का दर्दनाक उदाहरण भी। सरकार की चुनौती अब प्रभावितों को वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराते हुए सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को कम करने की है, ताकि मेरठ का यह क्षेत्र पुनः कानूनी ढांचे के अनुरूप विकसित हो सके। योगी सरकार का रुख साफ है— कानून सर्वोपरि, लेकिन जनहित की उपेक्षा नहीं।

 
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकील हैं। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर निरंतर लेखन करते हैं।)
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