दुग्ध क्रांति से कीर्तिमान रचता उत्तर प्रदेश: मेहनत, नीति और नारी शक्ति का संगम
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जब एकात्म मानवदर्शन की अवधारणा सामने रखी थी, तब उनका आग्रह था कि भारतीय अर्थनीति को पश्चिम के अंधानुकरण से नहीं, बल्कि भारत की अपनी जड़ों से ग्राम, कृषि और पशुधन से ऊर्जा ग्रहण करनी चाहिए। उनका मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी संस्कृति की उपेक्षा की, उसने अपनी आत्मा खो दी। उत्तर प्रदेश का दुग्ध क्षेत्र दीनदयाल जी के उसी दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, जहां परंपरा और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इस संयोग ने यूपी को दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में अग्रणी बना दिया और ग्रामीण महिलाएं इसके केंद्र में हैं।
उत्तर प्रदेश के सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहने वाली महिलाओं ने राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से दुध संग्रहण के आंकड़े को प्रतिदिन दस लाख लीटर तक पहुंचा दिया। ये महिलाएं अब तक लगभग पांच हजार करोड़ का कारोबार कर चुकी हैं। दुग्ध क्रांति की इस उपलब्धि के पीछे लाखों महिलाओं के प्रतिदिन के परिश्रम, उनकी भोर की दिनचर्या, दूध के बर्तनों की खनखनाहट, उनके आत्मविश्वास की बढ़ती आभा और वह सोच है जो महिलाओं को हर क्षेत्र में अवसर देने में विश्वास रखती है।
भारत की परंपरा में गाय पूज्य ही नहीं, अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी रही है और संस्कृति का प्रतीक भी। यदि आज उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे परंपरागत रूप से सशक्त दुग्ध उत्पादक राज्यों से आगे आकर खड़ा हो गया है, तो यह केवल कृषि नीति की सफलता नहीं है, यह उस समाज की जीवनशक्ति का पुनर्जागरण है जो गाय, गोबर और गोरस की संस्कृति में जीता आया है। 2017 में उत्तर प्रदेश का दुग्ध उत्पादन लगभग 277 लाख मीट्रिक टन था, जो 2024-25 तक आते-आते 388 लाख मीट्रिक टन के पार निकल गया। मतलब, लगभग आठ वर्षों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि। यह नीतिगत दृढ़ता और जमीनी क्रियान्वयन का संयुक्त परिणाम है। आज देश के कुल दुग्ध उत्पादन में पांच अग्रणी राज्यों की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत है और इसमें अकेले उत्तर प्रदेश का योगदान 16 प्रतिशत तक पहुंच गया है। गुजरात ने अमूल के माध्यम से जो सहकारी दुग्ध क्रांति की थी, वह पूरे देश के लिए प्रेरणा बनी किंतु उत्तर प्रदेश की यात्रा उससे भी अधिक जटिल थी, क्योंकि यहां भौगोलिक विविधता, सामाजिक संरचना के साथ कई प्रशासनिक चुनौतियां थीं। यहां जो प्रयोग हुआ, वह बहुस्तरीय, बहुआयामी और बहुजनोन्मुखी था, जिसके परिणाम सार्थक निकले।
यह बहुआयामी प्रयोग कई राज्यों के लिए प्रेरणा बनेगा, जिसकी नींव यूपी की चार लाख महिलाएं हैं, जो पांच उत्पादक कंपनियों से जुड़ी हैं। बुंदेलखंड में 'बलिनी एमपीसीएल' , पूर्वांचल में 'काशी एमपीसीएल', अवध क्षेत्र में 'सामर्थ्य एमपीसीएल', गोरखपुर मंडल में 'श्री बाबा गोरखनाथ कृपा एमपीसीएल' और तराई क्षेत्र में 'सृजन एमपीसीएल'। ये केवल कंपनियों के नाम नहीं हैं, ये उन क्षेत्रों की उम्मीदों के नाम हैं, जहां कभी पलायन सबसे बड़ी नियति हुआ करती थी। बुंदेलखंड का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसकी चर्चा दशकों से अकाल, पलायन और किसान आत्महत्याओं के संदर्भ में होती आई थी। वहां महिलाएं डेयरी गतिविधियों से जुड़ीं, तो उन्होंने न केवल अपनी आजीविका का एक स्थिर आधार खोजा बल्कि उस पूरे क्षेत्र की आर्थिक आत्मा को एक नई सांस दी। दूध एक ऐसा उत्पाद है जो प्रतिदिन बिकता है, प्रतिदिन आय देता है और यही दैनिक आय ग्रामीण जीवन की अनिश्चितता को थामने का सबसे विश्वसनीय उपाय है।
उत्तर प्रदेश में पशुपालन के प्रति मौजूदा सरकार की एक सुसंगत और प्रतिबद्ध नीतिगत दृष्टि रही है। अवैध बूचड़खानों पर नकेल, गोवंश संरक्षण के प्रयास, पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार, दूध संग्रहण के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण, इन सबने मिलकर ऐसा वातावरण बनाया, जिसमें डेयरी उद्योग फल-फूल सके। दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में 40 प्रतिशत की वृद्धि सामान्य उपलब्धि नहीं है। 388 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन प्रशंसनीय है, किंतु दूध के मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण क्षमता, ब्रांडिंग और निर्यात की संभावनाओं के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना है।
ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण समाज के रूपांतरण का सबसे गहरा और टिकाऊ मार्ग है। उत्तर प्रदेश में दुग्ध क्षेत्र के माध्यम से जो हो रहा है, वह इसी दिशा में एक निर्णायक प्रयोग है। जब एक ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से दूध बेचकर प्रतिमाह रुपये कमाती है, तो वह केवल अपनी आर्थिक स्थिति नहीं बदलती, वह अपने घर में अपनी स्थिति बदलती है, अपने बच्चों की शिक्षा की संभावनाएं बदलती है, अपने गांव में अपनी भूमिका बदलती है। जब ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से सक्रिय होती हैं, तो उनके परिवारों की पोषण स्थिति सुधरती है, बच्चों की स्कूली शिक्षा में निरंतरता आती है और घरेलू हिंसा की दर में कमी आती है यह समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों दोनों का सुस्थापित निष्कर्ष है।
उत्तर प्रदेश आज भारतीय अर्थव्यवस्था के मानचित्र पर एक निर्णायक उभार का प्रतीक बनकर उभर रहा है। यह उन्नति केवल शहरी निवेश, आधारभूत संरचना या औद्योगिक विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें गहराई तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैठ बना रही हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में दुग्ध उत्पादन का क्षेत्र एक सशक्त स्तंभ के रूप में उभरा है जहां विकास का केंद्र केवल उत्पादन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन भी है। दूध की हर बूंद में आज उत्तर प्रदेश की मेहनत, नीति और नारीशक्ति का संगम दिखाई देता है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक मैत्रेयी माइक्रो प्रोडक्ट मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड की प्रबंध निदेशक हैं।)

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