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हर परिस्थिति में परमात्मा के प्रेम में स्थिर रहना ही सच्ची जागृति : सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 27 Oct 2026 03:03 AM IST
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Remaining steadfast in the love of the Divine under all circumstances is true awakening: Satguru Mata Sudiksha Maharaj
79वें निरंकारी संत समागम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, 10 लाख से अधिक श्रद्धालु आने का दावा
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-भोड़वाल माजरी में चार दिवसीय वार्षिक निरंकारी संत समागम का भक्तिमय वातावरण में हुआ समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
समालखा (पानीपत)। भोड़वाल माजरी स्थित निरंकारी आध्यात्मिक स्थल पर 79वें वार्षिक निरंकारी संत समागम का सोमवार को समापन हो गया। चार दिवसीय समागम में देश-विदेश से 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने का दावा किया है। समारोह में मंच से प्रेम, श्रद्धा और एकत्व का अनुपम दृश्य प्रस्तुत किया। समागम परिसर भक्ति, समर्पण एवं आत्मिक आनंद से गुंजायमान हो उठा।

सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज ने श्रद्धालु भक्तों को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि आत्मा का परमात्मा से मिलन और हर पल निराकार प्रभु का अनुभव ही आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक सार है। परमात्मा ही एकमात्र अटल सत्य है, जबकि संसार की परिस्थितियां और हमारी इच्छाएं निरंतर परिवर्तित होती रहती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ईश्वर पर आस्था बनाए रखना बेहद सरल होता है, लेकिन सच्ची भक्ति वही है जो जीवन के हर उतार-चढ़ाव और हर परिस्थिति में अडिग बनी रहे।
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व्यवहार में झलकनी चाहिए ब्रह्मज्ञान की जागृति

सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज ने कहा कि ब्रह्मज्ञान से प्राप्त जागृति मनुष्य को जीवनभर सजग और सचेत रहने की प्रेरणा देती है। यह आत्मिक जागृति केवल विचारों तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक व्यवहार, निर्णयों और सामाजिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होनी चाहिए।
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उन्होंने कहा कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होते समय हमें अपने उद्देश्य की आत्म-समीक्षा अवश्य करनी चाहिए। विचारों में भिन्नता होने के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति में निराकार परमात्मा का अंश देखकर उसे सहजता से अपनाना ही निष्काम प्रेम की सच्ची पहचान है।

आत्मा की वास्तविक प्यास को पहचानना जरूरी : राजपिता रमित

निरंकारी राजपिता रमित ने कहा कि जीवन में जहां सकारात्मक बदलाव संभव हो, वहां निरंतर प्रयास करने चाहिए। अगर कहीं परिवर्तन संभव न हो तो वहां परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज का इन्सान सांसारिक आवश्यकताओं और भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति तो बहुत सजग रहता है, लेकिन अपनी आत्मा की वास्तविक प्यास को अनदेखा कर देता है। सर्वव्यापक परमात्मा के प्रेम को पहचानना, अहंकार का त्याग करना और सच्ची जिज्ञासा व समर्पण के साथ जीवन बिताना ही वास्तविक आध्यात्मिक जागृति है।
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