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Rampur Bushahar News: ऊपरी शिमला में सेब की फसल पर माइट का खतरा बढ़ा
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गर्म और शुष्क मौसम के कारण बागानों में माइट की संख्या में वृद्धि हुई
रोकथाम के लिए सरकारी केंद्रों पर अब अनुदान पर दवा की उपलब्धता नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
ऊपरी शिमला के सेब उत्पादक क्षेत्रों में इन दिनों माइट का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। लगातार गर्म और शुष्क मौसम के कारण बगीचों में माइट की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे सेब की फसल पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। बागवानों को माइट की रोकथाम के लिए महंगी दवाइयां बाजार से पूरी कीमत पर खरीदनी पड़ रही हैं, क्योंकि सरकारी केंद्रों पर अब अनुदान पर इनकी उपलब्धता नहीं है। यह स्थिति छोटे और मध्यम वर्ग के बागवानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गई है। सेब उत्पादन की लागत पहले ही खाद, मजदूरी, पैकिंग और परिवहन के कारण लगातार बढ़ रही है। अब माइट नियंत्रण पर हजारों रुपये का अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। बागवानों का कहना है कि इस साल फसल भी बहुत कम है। यदि समय पर माइट पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बुरी तरह प्रभावित होंगे। बागवानी विशेषज्ञ और कृषि विज्ञान केंद्र सड़क के प्रभारी डॉक्टर उषा शर्मा ने बताया कि माइट एक सूक्ष्म कीट-सदृश जीव है। यह पत्तियों की निचली सतह से रस चूसता है, जिससे पत्तियां पहले हल्की पीली और फिर कांस्य रंग की हो जाती हैं। इससे प्रकाश संश्लेषण कम होता है और पेड़ कमजोर पड़ने लगता है। अधिक प्रकोप होने पर फल का आकार छोटा रह जाता है, रंग प्रभावित होता है और अगले वर्ष बनने वाली फल कलियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
माइट फैलने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, मई से अगस्त के बीच, खासकर जून और जुलाई में गर्म और शुष्क मौसम व कम वर्षा होने पर माइट तेजी से फैलता है। 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और कम नमी इसकी वृद्धि के लिए अनुकूल मानी जाती है। बगीचों में धूल की अधिकता भी माइट के प्रकोप को बढ़ाती है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से इसके प्राकृतिक शत्रु नष्ट हो जाते हैं, जिससे माइट की संख्या और बढ़ जाती है।
बचाव और नियंत्रण के उपाय
बागवानी विभाग बागवानों को नियमित रूप से पत्तियों का निरीक्षण करने की सलाह दे रहा है। प्रारंभिक अवस्था में ही प्रकोप की पहचान करना महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों की सलाह पर ही अनुशंसित माइटनाशी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। विभाग ने बागों में संतुलित सिंचाई, पोषक तत्वों का उचित प्रबंधन और साफ-सफाई बनाए रखने पर भी जोर दिया है। अंधाधुंध कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए ताकि माइट के प्राकृतिक शत्रु सुरक्षित रहें।
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रोकथाम के लिए सरकारी केंद्रों पर अब अनुदान पर दवा की उपलब्धता नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
ऊपरी शिमला के सेब उत्पादक क्षेत्रों में इन दिनों माइट का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। लगातार गर्म और शुष्क मौसम के कारण बगीचों में माइट की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे सेब की फसल पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। बागवानों को माइट की रोकथाम के लिए महंगी दवाइयां बाजार से पूरी कीमत पर खरीदनी पड़ रही हैं, क्योंकि सरकारी केंद्रों पर अब अनुदान पर इनकी उपलब्धता नहीं है। यह स्थिति छोटे और मध्यम वर्ग के बागवानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गई है। सेब उत्पादन की लागत पहले ही खाद, मजदूरी, पैकिंग और परिवहन के कारण लगातार बढ़ रही है। अब माइट नियंत्रण पर हजारों रुपये का अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। बागवानों का कहना है कि इस साल फसल भी बहुत कम है। यदि समय पर माइट पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बुरी तरह प्रभावित होंगे। बागवानी विशेषज्ञ और कृषि विज्ञान केंद्र सड़क के प्रभारी डॉक्टर उषा शर्मा ने बताया कि माइट एक सूक्ष्म कीट-सदृश जीव है। यह पत्तियों की निचली सतह से रस चूसता है, जिससे पत्तियां पहले हल्की पीली और फिर कांस्य रंग की हो जाती हैं। इससे प्रकाश संश्लेषण कम होता है और पेड़ कमजोर पड़ने लगता है। अधिक प्रकोप होने पर फल का आकार छोटा रह जाता है, रंग प्रभावित होता है और अगले वर्ष बनने वाली फल कलियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
माइट फैलने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, मई से अगस्त के बीच, खासकर जून और जुलाई में गर्म और शुष्क मौसम व कम वर्षा होने पर माइट तेजी से फैलता है। 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और कम नमी इसकी वृद्धि के लिए अनुकूल मानी जाती है। बगीचों में धूल की अधिकता भी माइट के प्रकोप को बढ़ाती है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से इसके प्राकृतिक शत्रु नष्ट हो जाते हैं, जिससे माइट की संख्या और बढ़ जाती है।
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बचाव और नियंत्रण के उपाय
बागवानी विभाग बागवानों को नियमित रूप से पत्तियों का निरीक्षण करने की सलाह दे रहा है। प्रारंभिक अवस्था में ही प्रकोप की पहचान करना महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों की सलाह पर ही अनुशंसित माइटनाशी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। विभाग ने बागों में संतुलित सिंचाई, पोषक तत्वों का उचित प्रबंधन और साफ-सफाई बनाए रखने पर भी जोर दिया है। अंधाधुंध कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए ताकि माइट के प्राकृतिक शत्रु सुरक्षित रहें।
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