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Lipid Test: 9-11 साल की उम्र में एक बार कोलेस्ट्रॉल जांच जरूरी, अमेरिकी संस्थानों ने क्यों बदली गाइडलाइन?
सार
अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की नई गाइडलाइन में दिल की बीमारियों की रोकथाम के लिए शुरुआती जांच पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत 9 से 11 वर्ष के सभी बच्चों की कम-से-कम एक बार कोलेस्ट्रॉल जांच और 19 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की नियमित लिपिड प्रोफाइल कराने की सलाह दी गई है।
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कोलेस्ट्रॉल बना बड़ा खतरा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
दुनिया के दो प्रमुख हृदय संस्थानों अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी (एसीसी) और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (एएचए) ने 2026 की नई डिस्लिपिडेमिया (कोलेस्ट्रॉल) गाइडलाइन जारी कर बड़ा बदलाव किया है। अब 9 से 11 वर्ष की आयु के हर बच्चे की कम-से-कम एक बार कोलेस्ट्रॉल जांच कराने की सिफारिश की गई है।
वहीं ,19 वर्ष या उससे अधिक उम्र के सभी लोगों को नियमित रूप से लिपिड प्रोफाइल जांच कराने की सलाह दी गई है, ताकि हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को समय रहते रोका जा सके। गाइडलाइन में कहा गया है, आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, जंक फूड, मोटापा, धूम्रपान, शराब, तनाव और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण दिल की बीमारियां पहले की तुलना में काफी कम उम्र में सामने आ रही हैं। यही कारण है कि नई गाइडलाइन में हार्ट अटैक की रोकथाम अस्पताल में नहीं, बल्कि बचपन से शुरू करने की बात कही गई है।
शुरुआती जांच में पकड़ में आएगी बीमारी
नई गाइडलाइन के मुताबिक, धमनियों में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया कई लोगों में बचपन या किशोरावस्था से ही शुरू हो सकती है। अगर किसी बच्चे में जन्मजात हाई कोलेस्ट्रॉल या अन्य लिपिड विकार हैं, तो शुरुआती जांच से उनकी पहचान कर भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा काफी कम किया जा सकता है।
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तीन नई जांचों पर भी पहली बार खास जोर
नई गाइडलाइन में सिर्फ पारंपरिक लिपिड प्रोफाइल ही नहीं, बल्कि तीन महत्वपूर्ण जांचों को भी प्रमुखता दी गई है। हर वयस्क को लिपोप्रोटीन (ए) जीवन में कम-से-कम एक बार यह जांच कराने की सलाह दी गई है। इससे आनुवंशिक जोखिम का पता चलता है और सामान्य कोलेस्ट्रॉल होने पर भी हार्ट अटैक की आशंका का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसके अलावा एपोलिपोप्रोटीन-बी जो मधुमेह, मेटाबॉलिक सिंड्रोम या हाई ट्राइग्लिसराइड वाले लोगों में वास्तविक जोखिम का बेहतर आकलन करने के लिए यह जांच उपयोगी मानी गई है। तीसरा कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम (सीएसी) स्कैन शामिल है। जिन लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम स्पष्ट नहीं है, उनके लिए यह स्कैन यह तय करने में मदद करेगा कि दवा शुरू करनी चाहिए या नहीं।
युवाओं में हार्ट अटैक क्यों बढ़ रहे हैं?
जीवनशैली के कारण युवाओं में दिल की बीमारी का खतरा बढ़ रहा है। लंबे समय तक बैठे रहना, जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मोटापा, धूम्रपान और तंबाकू, शराब का सेवन, तनाव और चिंता कम नींद और शारीरिक गतिविधि की कमी सबसे बड़ा खतरा है।
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वहीं ,19 वर्ष या उससे अधिक उम्र के सभी लोगों को नियमित रूप से लिपिड प्रोफाइल जांच कराने की सलाह दी गई है, ताकि हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को समय रहते रोका जा सके। गाइडलाइन में कहा गया है, आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, जंक फूड, मोटापा, धूम्रपान, शराब, तनाव और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण दिल की बीमारियां पहले की तुलना में काफी कम उम्र में सामने आ रही हैं। यही कारण है कि नई गाइडलाइन में हार्ट अटैक की रोकथाम अस्पताल में नहीं, बल्कि बचपन से शुरू करने की बात कही गई है।
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शुरुआती जांच में पकड़ में आएगी बीमारी
नई गाइडलाइन के मुताबिक, धमनियों में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया कई लोगों में बचपन या किशोरावस्था से ही शुरू हो सकती है। अगर किसी बच्चे में जन्मजात हाई कोलेस्ट्रॉल या अन्य लिपिड विकार हैं, तो शुरुआती जांच से उनकी पहचान कर भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा काफी कम किया जा सकता है।
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तीन नई जांचों पर भी पहली बार खास जोर
नई गाइडलाइन में सिर्फ पारंपरिक लिपिड प्रोफाइल ही नहीं, बल्कि तीन महत्वपूर्ण जांचों को भी प्रमुखता दी गई है। हर वयस्क को लिपोप्रोटीन (ए) जीवन में कम-से-कम एक बार यह जांच कराने की सलाह दी गई है। इससे आनुवंशिक जोखिम का पता चलता है और सामान्य कोलेस्ट्रॉल होने पर भी हार्ट अटैक की आशंका का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसके अलावा एपोलिपोप्रोटीन-बी जो मधुमेह, मेटाबॉलिक सिंड्रोम या हाई ट्राइग्लिसराइड वाले लोगों में वास्तविक जोखिम का बेहतर आकलन करने के लिए यह जांच उपयोगी मानी गई है। तीसरा कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम (सीएसी) स्कैन शामिल है। जिन लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम स्पष्ट नहीं है, उनके लिए यह स्कैन यह तय करने में मदद करेगा कि दवा शुरू करनी चाहिए या नहीं।
युवाओं में हार्ट अटैक क्यों बढ़ रहे हैं?
जीवनशैली के कारण युवाओं में दिल की बीमारी का खतरा बढ़ रहा है। लंबे समय तक बैठे रहना, जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मोटापा, धूम्रपान और तंबाकू, शराब का सेवन, तनाव और चिंता कम नींद और शारीरिक गतिविधि की कमी सबसे बड़ा खतरा है।