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2008 अहमदाबाद धमाके: इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य की फांसी पर रोक, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा
Thu, 01 Oct 2026 02:45 PM IST
नितिन गौतम
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 01 Oct 2026 02:45 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए 2008 के अहमदाबाद बम धमाके में दोषी पाए गए एक व्यक्ति की फांसी की सजा पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से रिकॉर्ड तलब किए हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2008 के अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के एक सदस्य की मौत की सजा पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश दिया है। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी की याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। बावा ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें निचली अदालत द्वारा उसे सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। शीर्ष अदालत ने मामले में निचली अदालत का रिकॉर्ड भी तलब किया है।
38 दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखी थी हाईकोर्ट ने
7 जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। अदालत ने बड़ी संख्या में लोगों की मौत, हमले की साजिश रचने और आतंक फैलाने का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने 11 अन्य दोषियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी थी। अदालत ने कहा था कि गुजरात और केरल में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में उनकी भूमिका और साजिश के लिए रसद संबंधी सहायता मुहैया कराने की बात अभियोजन पक्ष ने साबित की है।
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जुलाई 2008 में हुए धमाकों में गई थी 56 लोगों की जान
26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद के अलग-अलग इलाकों में करीब 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाके उन अस्पतालों में भी हुए थे जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। यह भारत में किसी आतंकवादी हमले के दौरान चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाए जाने की पहली ऐसी घटनाओं में से एक थी।
हाईकोर्ट ने दोषियों की सभी अपीलें खारिज करते हुए विशेष अदालत के फरवरी 2022 के फैसले को बरकरार रखा था। विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार ने भी दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि कुछ दोषियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और किसी ने पश्चाताप नहीं दिखाया। जेल में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने का भी अदालत ने उल्लेख किया था। अदालत ने कहा था कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके आधार पर सजा में नरमी बरती जा सके। हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा था कि अपराध की गंभीरता, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और बड़े पैमाने पर हुई मौतों तथा लोगों के घायल होने को देखते हुए ये जुर्माने उचित हैं।
अदालत ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया था कि वह 30 मार्च, 2027 से पहले मृतकों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा दे। दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के पूर्व नेता सफदर नागौरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल तथा उत्तर प्रदेश समेत 11 राज्यों से जुड़े उसके सहयोगी शामिल हैं।
78 लोगों पर चला था मुकदमा
इस मामले में 78 लोगों के खिलाफ मुकदमा चला था। अहमदाबाद धमाकों से संबंधित 20 एफआईआर और सूरत में बरामद नहीं फटे बमों से जुड़ी 15 एफआईआर समेत कुल 35 पुलिस मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया था। विशेष अदालत ने इनमें से 49 लोगों को दोषी ठहराया था।
फरवरी 2022 में विशेष अदालत का फैसला किसी एक मामले में एक साथ 38 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने का पहला मामला था। इससे पहले जनवरी 1998 में तमिलनाडु की एक टाडा अदालत ने 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सभी 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी।
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38 दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखी थी हाईकोर्ट ने
7 जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। अदालत ने बड़ी संख्या में लोगों की मौत, हमले की साजिश रचने और आतंक फैलाने का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
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हाईकोर्ट ने 11 अन्य दोषियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी थी। अदालत ने कहा था कि गुजरात और केरल में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में उनकी भूमिका और साजिश के लिए रसद संबंधी सहायता मुहैया कराने की बात अभियोजन पक्ष ने साबित की है।
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जुलाई 2008 में हुए धमाकों में गई थी 56 लोगों की जान
26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद के अलग-अलग इलाकों में करीब 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाके उन अस्पतालों में भी हुए थे जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। यह भारत में किसी आतंकवादी हमले के दौरान चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाए जाने की पहली ऐसी घटनाओं में से एक थी।
हाईकोर्ट ने दोषियों की सभी अपीलें खारिज करते हुए विशेष अदालत के फरवरी 2022 के फैसले को बरकरार रखा था। विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार ने भी दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि कुछ दोषियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और किसी ने पश्चाताप नहीं दिखाया। जेल में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने का भी अदालत ने उल्लेख किया था। अदालत ने कहा था कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके आधार पर सजा में नरमी बरती जा सके। हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा था कि अपराध की गंभीरता, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और बड़े पैमाने पर हुई मौतों तथा लोगों के घायल होने को देखते हुए ये जुर्माने उचित हैं।
अदालत ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया था कि वह 30 मार्च, 2027 से पहले मृतकों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा दे। दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के पूर्व नेता सफदर नागौरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल तथा उत्तर प्रदेश समेत 11 राज्यों से जुड़े उसके सहयोगी शामिल हैं।
78 लोगों पर चला था मुकदमा
इस मामले में 78 लोगों के खिलाफ मुकदमा चला था। अहमदाबाद धमाकों से संबंधित 20 एफआईआर और सूरत में बरामद नहीं फटे बमों से जुड़ी 15 एफआईआर समेत कुल 35 पुलिस मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया था। विशेष अदालत ने इनमें से 49 लोगों को दोषी ठहराया था।
फरवरी 2022 में विशेष अदालत का फैसला किसी एक मामले में एक साथ 38 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने का पहला मामला था। इससे पहले जनवरी 1998 में तमिलनाडु की एक टाडा अदालत ने 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सभी 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी।