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मानव विशेषज्ञों ने बनाई बढ़त: एआई मॉडल्स को दिए गए अनदेखे गणितीय प्रश्न, कई का समाधान नहीं खोज सके सिस्टम

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 18 Jun 2026 06:27 AM IST
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सार

एआई की बढ़ती क्षमता के बावजूद शोध स्तर की जटिल गणितीय समस्याओं पर उसकी सीमाएं सामने आई हैं।'फर्स्ट प्रूफ' नामक परीक्षण में यह पाया गया कि शीर्ष एआई मॉडल अनुभवी गणितज्ञों की बराबरी नहीं कर सके। इस अध्ययन में पहली बार उपयोग किए गए कठिन प्रश्नों पर मानव विशेषज्ञों ने बेहतर प्रदर्शन किया। पढ़िए रिपोर्ट-

ai models fail to solve many unseen math problems human experts take lead
गणित की परीक्षा में एआई अब भी पीछे - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने हाल के वर्षों में गणितीय समस्याओं को हल करने की अपनी क्षमता से दुनिया को चौंकाया है, लेकिन शोध स्तर की कठिन गणितीय चुनौतियों पर उसकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। एक अत्यंत कठोर परीक्षण में शीर्ष एआई प्रणालियां अनुभवी गणितज्ञों के प्रदर्शन की बराबरी नहीं कर सकीं।


फर्स्ट प्रूफ नामक इस पहल के तहत एआई मॉडल्स को ऐसे गणितीय प्रश्न दिए गए जो पहले कभी प्रकाशित नहीं हुए थे और जिनका मूल्यांकन संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ गणितज्ञों ने किया। परिणामों में दिखा कि एआई में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद मानव विशेषज्ञता अभी भी बढ़त बनाए हुए है। विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार फर्स्ट प्रूफ परियोजना का उद्देश्य यह परखना है कि एआई जटिल और शोध-स्तरीय गणितीय समस्याओं को किस हद तक हल कर सकता है।
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शोध में एआई की क्षमताएं सीमित
यह अध्ययन ऐसे समय सामने आया है जब एआई गणित में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज कर चुका है। हाल ही में ओपनएआई के एक चैटबॉट ने प्रसिद्ध गणितज्ञ पॉल एर्डोश द्वारा प्रस्तावित लगभग 80 वर्ष पुरानी गणितीय चुनौती का समाधान खोजकर शोध समुदाय का ध्यान आकर्षित किया था। इसके बावजूद फर्स्ट प्रूफ के नतीजे बताते हैं कि शोध स्तर पर एआई की क्षमता अभी भी असमान है। परियोजना से जुड़े शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में ऐसे परीक्षण यह समझने में मदद करेंगे कि गणितज्ञों के लिए एआई कितना उपयोगी सहायक बन सकता है।
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तथ्यों और संदर्भों को लेकर दिखीं गलतियां
अध्ययन ने एआई की एक पुरानी कमजोरी को भी उजागर किया। कई प्रणालियों ने तथ्यों या संदर्भों को लेकर गलतियां कीं और कुछ मामलों में तथाकथित ‘हैलुसिनेशन’ देखने को मिले। शोधकर्ताओं ने पाया कि कई मॉडल पूर्व प्रकाशित शोधपत्रों की भाषा, संकेतों और शब्दावली का उपयोग कर रहे थे, लेकिन उन्होंने उन स्रोतों का उचित उल्लेख नहीं किया। लॉरेन विलियम्स के अनुसार संदर्भ देने में एआई मॉडल्स की कमी आश्चर्यजनक थी। कुछ उत्तरों में पूर्व शोध से मिलते-जुलते अंश दिखाई दिए, फिर भी संबंधित शोधपत्रों का कहीं उल्लेख नहीं था।
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